
राष्ट्रव्यापी घटनाएँ, अंतरराष्ट्रीय संकेत और संवैधानिक संकट
डा. संतोष सिंह
राष्ट्रीय अध्यक्ष, विश्व वैदिक सनातन न्यास
भारत की सनातन संस्कृति केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि इस राष्ट्र की सभ्यतागत आत्मा है।सहिष्णुता, सह-अस्तित्व और समरसता पर आधारित यह परंपरा आज गंभीर संकट के दौर से गुजर रही है। देश के विभिन्न राज्यों, सीमावर्ती क्षेत्रों और अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों पर दृष्टि डालें, तो यह स्पष्ट होता है कि सनातनी हिंदुओं की आस्था, मंदिरों और सांस्कृतिक अधिकारों को कमजोर करने की प्रवृत्ति अब बिखरी हुई नहीं, बल्कि संगठित और राष्ट्रव्यापी स्वरूप ले चुकी है।
पश्चिम बंगाल में बार-बार मंदिरों पर हमले, मूर्तियों का खंडन, धार्मिक आयोजनों के दौरान हिंसा और पलायन जैसी स्थितियाँ सामने आई हैं। अनेक मामलों में पीड़ित सनातनी समाज को न्याय के लिए लंबा संघर्ष करना पड़ा, जबकि कट्टर तत्वों पर कार्रवाई की गति पर प्रश्नचिह्न लगे।
राजस्थान में अवैध एवं छलपूर्वक धर्मांतरण, विशेषकर सामाजिक रूप से कमजोर वर्गों को निशाना बनाए जाने के आरोप, प्रशासनिक शिथिलता की ओर संकेत करते हैं। दिल्ली, जो देश की राजधानी है, वहाँ दंगों, धार्मिक स्थलों से जुड़े विवादों और आस्था के प्रतीकों को निशाना बनाए जाने की घटनाएँ यह दर्शाती हैं कि समस्या किसी एक राज्य तक सीमित नहीं रही।
सीमावर्ती क्षेत्रों—विशेषकर बांग्लादेश, म्यांमार और पाकिस्तान से सटे इलाकों—में अवैध घुसपैठ, जनसांख्यिकीय असंतुलन और उससे उत्पन्न सामाजिक तनाव अब केवल सुरक्षा का नहीं, बल्कि सांस्कृतिक अस्तित्व का प्रश्न बन चुका है। यह तथ्य अनदेखा नहीं किया जा सकता कि इन परिवर्तनों का सीधा प्रभाव स्थानीय सनातनी समाज की धार्मिक स्वतंत्रता और सामाजिक संरचना पर पड़ रहा है। अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य भी चेतावनी देता है।
पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान में हिंदू अल्पसंख्यकों पर अत्याचार, मंदिरों का विध्वंस, जबरन धर्मांतरण और नागरिक अधिकारों का हनन वैश्विक मंचों पर दर्ज वास्तविकताएँ हैं। ऐसे में भारत में सनातनी समाज की चिंताओं को अतिशयोक्ति” कहकर खारिज करना न केवल संवेदनहीनता है, बल्कि भविष्य के लिए खतरनाक संकेत भी। संविधान का अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता और अनुच्छेद 25 से 28 धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देते हैं। किंतु जब समान परिस्थितियों में अलग-अलग धार्मिक मानक अपनाए जाते हैं, जब मंदिरों पर कार्रवाई होती है पर अन्य मामलों में ढिलाई बरती जाती है, तब यह संवैधानिक भावना की स्पष्ट अवहेलना है। अनुच्छेद 21 के अंतर्गत प्रदत्त गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार तब अर्थहीन हो जाता है, जब नागरिक अपनी आस्था के कारण असुरक्षित महसूस करे। यह स्पष्ट किया जाना आवश्यक है कि यह विमर्श किसी धर्म या समुदाय के विरुद्ध नहीं, बल्कि कट्टरता, अवैध गतिविधियों और तुष्टिकरण की राजनीति के विरुद्ध है। अपने मंदिरों, परंपराओं और सांस्कृतिक अधिकारों की रक्षा की मांग करना न तो असहिष्णुता है और न ही अपराध।
आक्रोश स्वाभाविक है, पर समाधान हिंसा में नहीं। समाधान है। मंदिरों से अवैध अतिक्रमण हटाने की त्वरित कार्रवाई। जबरन या छलपूर्वक धर्मांतरण पर शून्य-सहनशीलता, सीमावर्ती क्षेत्रों में सख्त निगरानी, और सभी धर्मों के लिए समान प्रशासनिक व कानूनी मानक।मीडिया, सरकार और न्यायपालिका को यह समझना होगा कि सनातन आस्था को कमजोर करना सामाजिक सौहार्द नहीं, बल्कि राष्ट्रीय एकता को चोट पहुँचाता है। भारत की पहचान उसकी सनातन आत्मा से है,और उसकी रक्षा करना केवल एक समुदाय का नहीं, बल्कि राष्ट्र का दायित्व है।




