
जन्म जयंती पर विशेष
अशोक कुमार मिश्र
लोकमाता अहिल्याबाई होल्कर के जन्म को आज 300 वर्ष पूरे हो रहे हैं। उनका कालखंड भारतीय नारी शक्ति, सामाजिक न्याय और लोककल्याण की जीती-जागती मिसाल है। शासन, युद्ध और जनकल्याण में उनकी सक्रिय भागीदारी रही। आठ वर्ष की आयु में विवाह, 70 वर्ष का जीवन, अनगिनत युद्ध और सभी में विजय, यह अद्भुत प्रेरणादायक है। उनका जन्म 31 मई 1725 को हुआ था। पति की मृत्यु के बाद 1767 में राज्य की बागडोर संभाली और 28 वर्ष तक राज्य का कुशल नेतृत्व किया।
देवी अहिल्याबाई होलकर का जन्म महाराष्ट्र के अहमदनगर के जामखेड़ा स्थित चाँडी गाँव में हुआ था। उनके पिता का नाम मानकोजी शिंदे था, जो मराठा साम्राज्य में पाटिल के पद पर कार्यरत थे। देवी अहिल्याबाई का विवाह मालवा में होलकर राज्य के संस्थापक मल्हारराव होलकर के पुत्र खांडेराव से हुआ था। साल 1745 में अहिल्याबाई के बेटे मालेराव का जन्म हुआ व 3 साल बाद बेटी मुक्ताबाई ने जन्म लिया।
देवी अहिल्याबाई का जीवन संघर्षों से भरा रहा। उनके विवाह के कुछ वर्ष बाद ही 1754 में उनके पति खांडेराव का भरतपुर (राजस्थान) के समीप कुम्हेर में युद्ध के दौरान निधन हो गया। साल 1766 में ससुर मल्हारराव भी चल बसे। इसी बीच रानी ने अपने एकमात्र बेटे मालेराव को भी खो दिया। अंततः देवी अहिल्याबाई को राज्य का शासन अपने हाथों में लेना पड़ा। अपनों को खोने और प्रारंभिक जीवन के संघर्ष के बाद भी रानी ने बड़ी कुशलता से राजकाज सँभाल लिया। कुशल कूटनीति के दम पर उन्होंने न सिर्फ विरोधियों को पस्त किया बल्कि जीवनपर्यंत सामाजिक एवं धार्मिक कार्यों में जुटी रहीं।ऋषिकेश में श्रीनाथ जी के मंदिर, वृंदावन, पुरी, प्रयाग, श्रीशैलम, नासिक, पंढरपुर आदि में मंदिरों का निर्माण, गंगोत्री, हरिद्वार आदि में धर्मशालाएँ और सराय, वाराणसी में काशी विश्वनाथ मन्दिर, वाराणसी में गंगा के किनारे घाट, हरिद्वार में अहिल्या घाट, अयोध्या में सरयू के किनारे घाट, मध्य प्रदेश में शिप्रा नदी पर, नासिक में गोदावरी, मथुरा में यमुना आदि पर 13 घाटों का निर्माण, वाराणसी में प्रसिद्ध मणिकर्णिका घाट और दशाश्वमेध घाट, शीतला घाट आदि घाटों का जीर्णोद्धार कराया। वह एक न्यायप्रिय शासक थीं। अपने शासनकाल में उन्होंने किसी को अन्याय नहीं करने दिया। जिसने भी अन्याय किया, चाहे वह उनका निकट सहयोगी ही क्यों न रहा हो, उसे कड़ी सजा दी। मुगलों द्वारा मंदिरों को तोड़े जाने से वह बहुत आहत थीं। ऐसे कई मंदिरों का उन्होंने पुनरुद्धार कराया। एक बार एक विधवा ने अपनी संपत्ति राज्य को दान करने की इच्छा जताई तो अहिल्याबाई ने यह कहते हुए उसे स्वीकार करने से मना कर दिया कि यह उसकी व्यक्तिगत संपत्ति है और राज्य उसे नहीं ले सकता। यदि वह दान में देना ही चाहती हैं तो इसे धर्म-कर्म में लगा दें। अनन्य शिवभक्त अहिल्याबाई ने राज्य की संपूर्ण संपत्ति पर तुलसीदल रखकर होल्कर राज्य को शिव को अर्पित करने के बाद शासन की बागडोर सँभाली थी। इसलिए उनके राज्य के आदेश “हुजूर श्री शंकर आदेश” नाम से जारी होते थे।
गुजरात के सोमनाथ मंदिर को महमूद गजनवी ने 1026 ई. और औरंगजेब ने 1665 ई. में तोड़ा। अहिल्याबाई ने 1782 ई. में पुनरुद्धार कराया। उत्तर प्रदेश के वाराणसी स्थित विश्वनाथ मंदिर को 1669 में औरंगजेब ने नष्ट कर दिया था। 1776 में राजमाता ने फिर से बनवाया। मध्य प्रदेश के उज्जैन स्थित महाकालेश्वर मंदिर को औरंगजेब ने 1690 में तोड़ा।अहिल्याबाई ने 1736 में पुनः बनवाया। ओंकारेश्वर स्थिति ओंकारेश्वर मंदिर को औरंगजेब ने 1690 में नष्ट किया। अहिल्याबाई ने 1736 में पुनर्निर्माण कराया। भीमाशंकर मंदिर को औरंगजेब ने 1682 में तोड़ा। अहिल्याबाई ने 1736 में पुनः बनवाया। रामेश्वर मंदिर (रामेश्वरम, तमिलनाडु) को मुगल सेना ने 1680 में तोड़ा। अहिल्याबाई ने 1736 में बनवाया।गोकर्ण शिव मंदिर (कर्नाटक) को मुगल सेना ने 1680 में तोड़ा। अहिल्याबाई ने 1736 में पुनः बनवाया। इसके साथ अयोध्या एवं नैमिषारण्य में मंदिरों एवं घाटों का निर्माण एवं जीर्णोद्धार कराया। जनता पर स्नेह बरसाने वाली लोकमाता का सैनिकों पर भी अधिक ध्यान रहता था। युद्ध सामग्री से उनका भंडार हमेशा भरा रहता और वह सैनिकों की आवश्यकताओं का पूरा ध्यान रखतीं। इसके अतिरिक्त जब भी कोई सैनिक युद्ध में वीरगति को प्राप्त होता तो उसके परिवार का सारा खर्च राज्य वहन करता था।
महेश्वरी साड़ियों का इतिहास लगभग 250 वर्ष पुराना है। होल्कर वंश की महान शासक देवी अहिल्याबाई होल्कर ने महेश्वर में सन 1767 में कुटीर उद्योग स्थापित करवाया था। गुजरात एवं भारत के अन्य शहरों से बुनकरों के परिवारों को उन्होंने यहाँ लाकर बसाया तथा उन्हें घर, व्यापार आदि की सुविधाएँ प्रदान कीं। पहले केवल सूती साड़ियाँ ही बनाई जाती थीं, परन्तु बाद के समय में सुधार आता गया तथा उच्च गुणवत्ता वाली रेशमी तथा सोने व चाँदी के धागों से बनी साड़ियाँ भी बनाई जाने लगीं।
बड़े-बड़े इतिहासकारों ने अहिल्याबाई होल्कर को रानी, लोकमाता, लोकमंगल, प्रजावत्सला के बाद पुण्यश्लोक भी लिखा। उनको आज मिजोरम, मेघालय से लेकर कर्नाटक, अंडमान निकोबार, केरल तक लोग याद कर रहे हैं। देश में कई स्थानों पर उनकी प्रतिमा भी स्थापित हुई है।
आठ वर्ष की आयु में उनका विवाह हुआ। अल्पायु में ही पति, ससुर, बेटे, बेटी, दामाद को खोने के बाद उन्होंने खुद को संभाला। अपने आप को संभालते हुए नर्मदा तट पर महेश्वर को राजधानी बनाई। सिंचाई, सेना, पड़ोसी राज्यों के संबंध में उनके द्वारा किए गए कार्य अतुलनीय है। जिनके पास जमीन नहीं थी, अहिल्याबाई होल्कर उन्हें अपने राज्य में इस शर्त के साथ कि वह वृक्षारोपण करेगा, जमीन देती थीं। उन्होंने किसानों की सुरक्षा, समृद्धि के लिए बहुत कार्य किया। वे पड़ोसी राज्यों के साथ अच्छे संबंध रखती थीं। महिला कल्याण, विधवाओं के लिए उन्होंने अनेक प्रशंसनीय कार्य किया। अहिल्याबाई की साथी रेणुका देवी विधवा थी, उन्होंने उनकी शादी कराई। विधवा महिला किसी को गोद ले सकतीं, संपत्ति को किसी को दे सकती हैं। अहिल्याबाई होल्कर ने शासन के लिए उस समय सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय की बात कही थी। बिना कर बढ़ाए राज्य का राजस्व 75 लाख से बढ़ाकर सवा करोड़ तक पहुंचाया। युद्धकौशल के लिए अनेक कदम उठाए। सांस्कृतिक क्षेत्र में भी उनका बड़ा योगदान है। 25 अगस्त 1996 में उनकी याद में भारत सरकार ने डाक टिकट जारी किया था। उनका जीवन हमारे लिए प्रेरणास्रोत है।




