गाज़ीपुर : वरिष्ठ साहित्यकार जगदीश बरनवाल ‘कुंद’ चेतना सम्मान से सम्मानित

साहित्य चेतना समाज का 40वाॅं स्थापना दिवस, समारोह पूर्वक सम्पन्न
गाज़ीपुर।साहित्य चेतना समाज’ के 40वें स्थापना-दिवस पर नगर के वंशी बाजर-स्थित रघुवंशी पैलेस के सभागार में कवि-सम्मेलन का आयोजन किया गया। आजमगढ़ के वरिष्ठ साहित्यकार जगदीश बरनवाल ‘कुंद’ को ‘चेतना सम्मान’ से सम्मानित किया गया। अध्यक्षता वरिष्ठ गीतकार डाॅ.ईश्वरचन्द्र त्रिपाठी और मुख्य अतिथि शासकीय अफीम एवं क्षारोद कारखाना, गाजीपुर के महाप्रबन्धक दौलत कुमार रहे। कार्यक्रम का शुभारम्भ माॅं बागेश्वरी,विद्या की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती के पूजन-अर्चन एवं दीप-प्रज्वलन से हुआ। चंदौली से पधारीं कवयित्री रीना तिवारी की सरस्वती वन्दना के उपरान्त संस्था के संस्थापक अमरनाथ तिवारी ‘अमर’ ने आगंतुकों का वाचिक स्वागत किया। संस्था के 40 वर्षों की सुदीर्घ-सार्थक यात्रा पर प्रकाश डाला। मंचस्थ साहित्यिक विभूतियों एवं कविगण का माल्य, अंगवस्त्रम् एवं सम्मान-पत्र के द्वारा स्वागत किया गया। चेतना सम्मान’ से सम्मान से सम्मानित जगदीश बरनवाल ‘कुंद’ ने अपने वक्तव्य में साहित्य, संस्कृति, समाज एवं राष्ट्र की, समर्पण भाव से निस्पृह सेवा करने वाली इस संस्था की भूरिश: प्रशंसा की। मुख्य अतिथि दौलत कुमार ने कहा कि “साहित्य चेतना समाज के इस महनीय कार्य को आने वाला समय स्वर्णाक्षरों में रेखांकित करेगा। कवि-सम्मेलन में श्रोताओं को काव्य-रस से आप्लावित किया।
चंदौली से पधारे कवि कृष्णा मिश्रा के मुक्तकों को श्रोताओं ने खूब प्रशंसित किया “अपनो से कभी जीत करके हारना भी है/फिर हार करके जीतने का नाम ज़िन्दगी”। चंदौली की गीत की कवयित्री रीना तिवारी ने “यूॅं तो दुनिया में अपने बहुत हैं मगर/माॅं से बढ़कर जमाने में कोई नहीं” सुनाकर अतिशय प्रशंसा अर्जित की। इसी क्रम है देवरिया के हास्य-व्यंग्य के युवा कवि रुद्रनाथ त्रिपाठी ‘पुंज’ ने अपनी कविता “जय हो पत्नी,जय हो पत्नी/मेरे बच्चों की माता” सुनाकर ख़ूब वाहवाही बटोरी। वाराणसी की कवयित्री विदुषी साहाना ने अपना गीत “उन्मुक्त नयन के दर्पण में मैंने तेरी छवि उतार ली” प्रस्तुत कर श्रोताओं को रससिक्त कर दिया। बेगूसराय के श्रेष्ठ ग़ज़ल-गो मासूम राशदी ने अपनी ग़ज़ल “ये हमसे पूछिए क्या-क्या फ़रोख़्त करना पड़ा/बड़े से शहर में छोटे से एक घर के लिए” सुनाकर अतीव प्रशंसित रहे। बलिया के कवि शशिप्रेमदेव ने अपनी ग़ज़ल “घर में आज भले ही मेरे जगह ना हो उसकी कोई/मेरे अन्दर लेकिन अब भी पहले से ज्यादा है वो” प्रस्तुत कर खूब तालियाॅं अर्जित की।
बलिया के कवि श्वेतांक सिंह, डॉ.नवचन्द्र तिवारी, वाराणसी के कवि राजकुमार ‘आशीर्वाद’ ने अपने काव्यपाठ से श्रोताओं को भावविभोर कर दिया।अन्त में अध्यक्षीय काव्यपाठ करते हुए आजमगढ़ के वरिष्ठ गीतकार डॉ.ईश्वरचन्द्र त्रिपाठी ने अपने मुक्तकों एवं गीतों के सस्वर पाठ से श्रोताओं मंत्रमुग्ध कर दिया। बतौर बानगी- “सिकन्दर बन के जो इन बस्तियों पर कहर बरपाये/उन्हें सुकरात कहता हूॅं, मुझे कुछ हो गया है क्या”। संचालन नवगीतकार डॉ.अक्षय पाण्डेय ने एवं कवि-सम्मेलन का सफल संचालन हास्य-व्यंग्यकार डॉ.नागेश शाण्डिल्य ने किया। अन्त में संस्था के संगठन सचिव प्रभाकर त्रिपाठी ने धन्यवाद ज्ञापित करते हुए कार्यक्रम के स्थगन की घोषणा की।




