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धर्मलेख

धर्मशास्त्रों के अनुसार दिन में ही करें विवाह

अशोक कुमार मिश्र

धर्मशास्त्रों के अनुसार सनातन धर्मावलंबियों को दिन में विवाह करना चाहिए। हिंदू धर्म में 16 संस्कारों का उल्लेख है। इसमें विवाह सबसे प्रमुख संस्कार है, जो धूमधाम से मनाया जाता है। उत्तर भारत में इस प्रमुख संस्कार को ज्यादातर लोग दिन में आयोजित न कर रात्रि के निशाचर बेला में आयोजित करते है। धर्मशास्त्रों में विवाह के लिए दिन के समय को श्रेष्ठ बताया गया है।मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति तथा अन्य धर्मग्रंथों में विवाह के लिए सूर्योदय से सूर्यास्त तक का समय उचित माना गया है। विवाह को एक यज्ञ की भांति माना जाता है। जैसे यज्ञ में अग्नि के समक्ष आहुति दी जाती है, वैसे ही विवाह में अग्नि को साक्षी मानकर सप्तपदी होती है। चूंकि यज्ञ रात्रि में नहीं होता, इसलिए विवाह भी रात्रि में नहीं होना चाहिए। विवाह के लिए शुभ मुहूर्त, तिथि, नक्षत्र और लग्न की गणना की जाती है, जो सामान्यतः दिन के समय ही मिलती हैं। रात्रि के समय तामसिक शक्तियों की प्रधानता मानी जाती है, जो किसी भी मांगलिक कार्य के लिए प्रतिकूल मानी जाती हैं। कर्मकांड के कई विद्वानों के साथ ज्योतिष के जानकारों का भी कहना है कि विवाह का मुहूर्त दिन में ही होता है।

हिंदू धर्म एक प्राचीन और गूढ़ परंपराओं वाला धर्म है, जिसमें हर कर्म और संस्कार का एक निश्चित विधान, समय और विधि निर्धारित की गई है। विवाह संस्कार का भी इसी प्रकार विशेष महत्त्व है, जिसमें शुभ मुहूर्त, नक्षत्र, तिथि और समय का बड़ा ध्यान रखा जाता है। इन्हीं परंपराओं के अंतर्गत रात्रि विवाह को परंपरागत रूप से वर्जित या अशुभ माना गया है। विवाह एक आत्मिक मिलन है। दिन के समय वातावरण सत्त्वगुणी होता है, जबकि रात्रि में रजोगुण और तमोगुण का प्रभाव बढ़ जाता है। दिन में देवता जागृत रहते हैं, जबकि रात्रि में विश्राम करते है। मांगलिक कार्य देवताओं की उपस्थिति में ही करने की परंपरा रही है। विवाह एक सामाजिक उत्सव है, जिसमें आस-पड़ोस, कुटुंब और समाज के लोग भाग लेते है। दिन में सभी लोग सरलता से भाग ले सकते थे, जबकि रात में यात्रा करना कठिन होता है साथ ही सुरक्षा का भी संकट बना रहता है।

सनातन धर्म मानने वालों को इस बात पर विचार करना चाहिए कि जब मुंडन, यज्ञोपवीत व गृह प्रवेश आदि सभी शुभ संस्कार दिन में होते हैं तो विवाह जैसा महत्वपूर्ण संस्कार निशाचरी बेला में क्यों।अन्य संस्कारों की तरह विवाह भी दिन में ही उचित है, रात्रि में नहीं। रात को निशाचर का समय कहां जाता है। विवाह अत्यंत महत्वपूर्ण संस्कार है। यह दो आत्माओं का पवित्र बन्धन है। अग्नि के सात फेरे लेकर व सूर्य भगवान को साक्षी मानकर वर व कन्या एक पवित्र बंधन में बंधते हैं।

भारत में सभी उत्सव एवं संस्कार दिन में ही किये जाते है। यह सनातनी परम्परा है। सीता और द्रौपदी का स्वयंवर भी दिन में ही हुआ था। प्राचीन काल से लेकर मुगलों के आने तक भारत में विवाह दिन में ही हुआ करते थे। मुस्लिम आक्रमणकारियों के भारत पर हमला करने के बाद ही, हिन्दुओं को अपनी कई प्राचीन परम्पराएं तोड़ने को विवश होना पड़ा था। मुस्लिम आक्रमणकारियों द्वारा भारत पर अतिक्रमण करने के बाद भारतीयों पर बहुत अत्याचार किये गये। यह आक्रमणकारी हिन्दुओं के विवाह के समय वहां पहुंचकर लूटपाट मचाते थे व लड़की को उठाकर ले जाते थे। मुगल शासन काल में जब अत्याचार चरम सीमा पर था तब मुग़ल सैनिक हिन्दू लड़कियों को बलपूर्वक उठा लेते थे और उन्हें अपने आकाओं को सौंप देते थे। इसी डर से रात के अंधेरे में विवाह संस्कार होने लगे। पहली बार रात्रि में विवाह सुन्दरी और मुंदरी नाम की दो ब्राह्मण बहनों का हुआ था। यह विवाह दुल्ला भट्टी ने अपने संरक्षण में ब्राह्मण युवकों से कराया था। उस समय दुल्ला भट्टी ने अत्याचार के खिलाफ हथियार उठाये थे। दुल्ला भट्टी ने ऐसी अनेकों लड़कियों को मुगलों से छुड़ाकर, उनका हिन्दू लड़कों से विवाह कराया। उसके बाद मुस्लिम आक्रमणकारियों के आतंक से बचने के लिए हिन्दू रात के अँधेरे में विवाह करने पर मजबूर हुए। विवाह करते समय भी यह ध्यान रखा जाता है कि नाचना-गाना, दावत, जयमाला, आदि भले ही रात्रि में हो, पर विवाह के फेरे वैदिक मन्त्रों के साथ भोर में ही लिए जाएं।

रात्रि विवाह की इस परंपरा को सबसे पहले पंजाब में समाप्त किया गया। फिल्लौर से लेकर काबुल तक महाराजा रंजीत सिंह का राज हो जाने के बाद उनके सेनापति हरीसिंह नलवा ने सनातन वैदिक परम्परा अनुसार दिन में खुले आम विवाह करने और उनको सुरक्षा देने की घोषणा की। हरीसिंह नलवा के संरक्षण में हिन्दुओं ने दिन में बैंडबाजे के साथ विवाह शुरू किये। तब से पंजाब में दिन में विवाह का प्रचालन शुरू हुआ। पंजाब में अधिकांश विवाह आज भी दिन में ही होते हैं। महाराष्ट्र, तमिलनाडु, आंध्र, कर्नाटक, केरल, असम, मणिपुर, नागालैंड, त्रिपुरा एवम् अन्य राज्य भी धीरे धीरे अपनी जड़ों की ओर लोटने लगे हैं। अतः इन प्रदेशों में दिन में विवाह होते हैं। हरीसिंह नलवा ने मुसलमान बने हिन्दुओं की घर वापसी कराई, मुसलमानों पर जजिया कर लगाया, हिन्दू धर्म की परम्पराओं को फिर से स्थापित किया।

पहले विवाह में सूर्य को साक्षी माना जाता था लेकिन बाद में रात्रि में ध्रुव तारा को मान लिया गया। साक्षी सूर्य के प्रतीक स्वरूप अग्नि को ही माना जाता है। इसीलिए अग्नि के ही चारों ओर फेरे लिए जाने की विधि है।भारतीय सनातन धर्म, वेद पुराणों आदि ग्रंथों में दिन में ही विवाह करने का विधान है। भारत, खासकर उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश एवं बिहार के लोग, 400 साल हो गए मुगल यहां से चले गए, किन्तु आज भी परंपरा मानकर उसे चला रहे हैं। गुलामी की मानसिकता से अब उबरना चाहिए। राजधानी लखनऊ के प्रकांड ज्योतिषाचार्य व कर्मकांड विशेषज्ञ आचार्य अशोक तिवारी कहते हैं कि शुभ कार्य दिन में ही होने चाहिए। दिन के विवाह ही सर्वोत्तम होते है। सूर्य को साक्षी मानकर विवाह संस्कार किया जाना चाहिए। आचार्य तिवारी कहते हैं कि मुहूर्त तो दिन का ही होता है। कुछ लोग नहीं मानते हैं, रात्रि में ही विवाह करने का आग्रह करते हैं। लोगों के आग्रह पर ही वह रात्रि में विवाह संस्कार कराते हैं।

रात्रि के विवाह संस्कार से जहां वर कन्या के साथ परिवार के लोग भी थक जाते है वहीं बाराती भी परेशान हो जाते हैं। गंगा महासभा व अखिल भारतीय संत समिति के महासचिव स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती जी महाराज बताते हैं कि मुगल काल से पहले अपने देश में घूंघट प्रथा नहीं थी। मुगल आक्रमणकारियों के डर से ही हिंदू बहन बेटियां घूंघट करने लगी व बिना मुहूर्त के ही रात्रि में विवाह होने लगा। महाराज जी के अनुसार राजस्थान में बेटियों की इज्जत सुरक्षित रहे, इसलिए डोली में बैठते समय उनके नाखून पर सूअर का रक्त लगा दिया जाता था, ताकि मुगल आक्रमणकारी न छूए व उनका इज्जत सुरक्षित रहे। मुगल आक्रमणकारियों के डर से ही राजस्थान में बाल विवाह की प्रथा शुरू हुई थी। कुछ समय पहले तो अक्षय तृतीया वाले दिन वहां सामूहिक बाल विवाह होता था। महराज जी का कहना है कि हिंदुओं को विवाह के लिए अब दिन में शुभ मुहूर्त का चयन करना चाहिए। जितने भी देवी देवता व ऋषि मुनि हुए सब का विवाह दिन में ही हुआ है। भगवान शिव पार्वती का विवाह उत्तराखंड के जिस पावन भूमि पर हुआ, वहां सनातनी अपने बेटे बेटियों की शादी दिन में करते हैं।धर्मशास्त्रों के अनुसार विवाह के लिए दिन का समय ही श्रेष्ठ है, इसको ध्यान में रखकर उत्तर प्रदेश सरकार के उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक सहित समाज के कई महत्वपूर्ण लोगों ने अपने पुत्र पुत्रियों का विवाह गत वर्षो में दिन में ही संपन्न कराया।

धर्मशास्त्रों के अनुसार सनातन धर्मावलंबियों को दिन में विवाह करना चाहिए। हिंदू धर्म में 16 संस्कारों का उल्लेख है। इसमें विवाह सबसे प्रमुख संस्कार है, जो धूमधाम से मनाया जाता है। उत्तर भारत में इस प्रमुख संस्कार को ज्यादातर लोग दिन में आयोजित न कर रात्रि के निशाचर बेला में आयोजित करते है। धर्मशास्त्रों में विवाह के लिए दिन के समय को श्रेष्ठ बताया गया है।मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति तथा अन्य धर्मग्रंथों में विवाह के लिए सूर्योदय से सूर्यास्त तक का समय उचित माना गया है। विवाह को एक यज्ञ की भांति माना जाता है। जैसे यज्ञ में अग्नि के समक्ष आहुति दी जाती है, वैसे ही विवाह में अग्नि को साक्षी मानकर सप्तपदी होती है। चूंकि यज्ञ रात्रि में नहीं होता, इसलिए विवाह भी रात्रि में नहीं होना चाहिए। विवाह के लिए शुभ मुहूर्त, तिथि, नक्षत्र और लग्न की गणना की जाती है, जो सामान्यतः दिन के समय ही मिलती हैं। रात्रि के समय तामसिक शक्तियों की प्रधानता मानी जाती है, जो किसी भी मांगलिक कार्य के लिए प्रतिकूल मानी जाती हैं। कर्मकांड के कई विद्वानों के साथ ज्योतिष के जानकारों का भी कहना है कि विवाह का मुहूर्त दिन में ही होता है।

हिंदू धर्म एक प्राचीन और गूढ़ परंपराओं वाला धर्म है, जिसमें हर कर्म और संस्कार का एक निश्चित विधान, समय और विधि निर्धारित की गई है। विवाह संस्कार का भी इसी प्रकार विशेष महत्त्व है, जिसमें शुभ मुहूर्त, नक्षत्र, तिथि और समय का बड़ा ध्यान रखा जाता है। इन्हीं परंपराओं के अंतर्गत रात्रि विवाह को परंपरागत रूप से वर्जित या अशुभ माना गया है। विवाह एक आत्मिक मिलन है। दिन के समय वातावरण सत्त्वगुणी होता है, जबकि रात्रि में रजोगुण और तमोगुण का प्रभाव बढ़ जाता है। दिन में देवता जागृत रहते हैं, जबकि रात्रि में विश्राम करते है। मांगलिक कार्य देवताओं की उपस्थिति में ही करने की परंपरा रही है। विवाह एक सामाजिक उत्सव है, जिसमें आस-पड़ोस, कुटुंब और समाज के लोग भाग लेते है। दिन में सभी लोग सरलता से भाग ले सकते थे, जबकि रात में यात्रा करना कठिन होता है साथ ही सुरक्षा का भी संकट बना रहता है।

सनातन धर्म मानने वालों को इस बात पर विचार करना चाहिए कि जब मुंडन, यज्ञोपवीत व गृह प्रवेश आदि सभी शुभ संस्कार दिन में होते हैं तो विवाह जैसा महत्वपूर्ण संस्कार निशाचरी बेला में क्यों।अन्य संस्कारों की तरह विवाह भी दिन में ही उचित है, रात्रि में नहीं। रात को निशाचर का समय कहां जाता है। विवाह अत्यंत महत्वपूर्ण संस्कार है। यह दो आत्माओं का पवित्र बन्धन है। अग्नि के सात फेरे लेकर व सूर्य भगवान को साक्षी मानकर वर व कन्या एक पवित्र बंधन में बंधते हैं।

भारत में सभी उत्सव एवं संस्कार दिन में ही किये जाते है। यह सनातनी परम्परा है। सीता और द्रौपदी का स्वयंवर भी दिन में ही हुआ था। प्राचीन काल से लेकर मुगलों के आने तक भारत में विवाह दिन में ही हुआ करते थे। मुस्लिम आक्रमणकारियों के भारत पर हमला करने के बाद ही, हिन्दुओं को अपनी कई प्राचीन परम्पराएं तोड़ने को विवश होना पड़ा था। मुस्लिम आक्रमणकारियों द्वारा भारत पर अतिक्रमण करने के बाद भारतीयों पर बहुत अत्याचार किये गये। यह आक्रमणकारी हिन्दुओं के विवाह के समय वहां पहुंचकर लूटपाट मचाते थे व लड़की को उठाकर ले जाते थे। मुगल शासन काल में जब अत्याचार चरम सीमा पर था तब मुग़ल सैनिक हिन्दू लड़कियों को बलपूर्वक उठा लेते थे और उन्हें अपने आकाओं को सौंप देते थे। इसी डर से रात के अंधेरे में विवाह संस्कार होने लगे। पहली बार रात्रि में विवाह सुन्दरी और मुंदरी नाम की दो ब्राह्मण बहनों का हुआ था। यह विवाह दुल्ला भट्टी ने अपने संरक्षण में ब्राह्मण युवकों से कराया था। उस समय दुल्ला भट्टी ने अत्याचार के खिलाफ हथियार उठाये थे। दुल्ला भट्टी ने ऐसी अनेकों लड़कियों को मुगलों से छुड़ाकर, उनका हिन्दू लड़कों से विवाह कराया। उसके बाद मुस्लिम आक्रमणकारियों के आतंक से बचने के लिए हिन्दू रात के अँधेरे में विवाह करने पर मजबूर हुए। विवाह करते समय भी यह ध्यान रखा जाता है कि नाचना-गाना, दावत, जयमाला, आदि भले ही रात्रि में हो, पर विवाह के फेरे वैदिक मन्त्रों के साथ भोर में ही लिए जाएं।

रात्रि विवाह की इस परंपरा को सबसे पहले पंजाब में समाप्त किया गया। फिल्लौर से लेकर काबुल तक महाराजा रंजीत सिंह का राज हो जाने के बाद उनके सेनापति हरीसिंह नलवा ने सनातन वैदिक परम्परा अनुसार दिन में खुले आम विवाह करने और उनको सुरक्षा देने की घोषणा की। हरीसिंह नलवा के संरक्षण में हिन्दुओं ने दिन में बैंडबाजे के साथ विवाह शुरू किये। तब से पंजाब में दिन में विवाह का प्रचालन शुरू हुआ। पंजाब में अधिकांश विवाह आज भी दिन में ही होते हैं। महाराष्ट्र, तमिलनाडु, आंध्र, कर्नाटक, केरल, असम, मणिपुर, नागालैंड, त्रिपुरा एवम् अन्य राज्य भी धीरे धीरे अपनी जड़ों की ओर लोटने लगे हैं। अतः इन प्रदेशों में दिन में विवाह होते हैं। हरीसिंह नलवा ने मुसलमान बने हिन्दुओं की घर वापसी कराई, मुसलमानों पर जजिया कर लगाया, हिन्दू धर्म की परम्पराओं को फिर से स्थापित किया।

पहले विवाह में सूर्य को साक्षी माना जाता था लेकिन बाद में रात्रि में ध्रुव तारा को मान लिया गया। साक्षी सूर्य के प्रतीक स्वरूप अग्नि को ही माना जाता है। इसीलिए अग्नि के ही चारों ओर फेरे लिए जाने की विधि है।भारतीय सनातन धर्म, वेद पुराणों आदि ग्रंथों में दिन में ही विवाह करने का विधान है। भारत, खासकर उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश एवं बिहार के लोग, 400 साल हो गए मुगल यहां से चले गए, किन्तु आज भी परंपरा मानकर उसे चला रहे हैं। गुलामी की मानसिकता से अब उबरना चाहिए। राजधानी लखनऊ के प्रकांड ज्योतिषाचार्य व कर्मकांड विशेषज्ञ आचार्य अशोक तिवारी कहते हैं कि शुभ कार्य दिन में ही होने चाहिए। दिन के विवाह ही सर्वोत्तम होते है। सूर्य को साक्षी मानकर विवाह संस्कार किया जाना चाहिए। आचार्य तिवारी कहते हैं कि मुहूर्त तो दिन का ही होता है। कुछ लोग नहीं मानते हैं, रात्रि में ही विवाह करने का आग्रह करते हैं। लोगों के आग्रह पर ही वह रात्रि में विवाह संस्कार कराते हैं।

रात्रि के विवाह संस्कार से जहां वर कन्या के साथ परिवार के लोग भी थक जाते है वहीं बाराती भी परेशान हो जाते हैं। गंगा महासभा व अखिल भारतीय संत समिति के महासचिव स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती जी महाराज बताते हैं कि मुगल काल से पहले अपने देश में घूंघट प्रथा नहीं थी। मुगल आक्रमणकारियों के डर से ही हिंदू बहन बेटियां घूंघट करने लगी व बिना मुहूर्त के ही रात्रि में विवाह होने लगा। महाराज जी के अनुसार राजस्थान में बेटियों की इज्जत सुरक्षित रहे, इसलिए डोली में बैठते समय उनके नाखून पर सूअर का रक्त लगा दिया जाता था, ताकि मुगल आक्रमणकारी न छूए व उनका इज्जत सुरक्षित रहे। मुगल आक्रमणकारियों के डर से ही राजस्थान में बाल विवाह की प्रथा शुरू हुई थी। कुछ समय पहले तो अक्षय तृतीया वाले दिन वहां सामूहिक बाल विवाह होता था। महराज जी का कहना है कि हिंदुओं को विवाह के लिए अब दिन में शुभ मुहूर्त का चयन करना चाहिए। जितने भी देवी देवता व ऋषि मुनि हुए सब का विवाह दिन में ही हुआ है। भगवान शिव पार्वती का विवाह उत्तराखंड के जिस पावन भूमि पर हुआ, वहां सनातनी अपने बेटे बेटियों की शादी दिन में करते हैं।धर्मशास्त्रों के अनुसार विवाह के लिए दिन का समय ही श्रेष्ठ है, इसको ध्यान में रखकर उत्तर प्रदेश सरकार के उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक सहित समाज के कई महत्वपूर्ण लोगों ने अपने पुत्र पुत्रियों का विवाह गत वर्षो में दिन में ही संपन्न कराया।

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