
26 जनवरी केवल एक तारीख नहीं, बल्कि भारत की आत्मा का उत्सव है। यह वह दिन है जब भारत ने स्वयं को एक संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक गणराज्य के रूप में घोषित किया। 77वाँ गणतंत्र दिवस वर्ष 2026 में इसलिए भी ऐतिहासिक बन गया क्योंकि इसी दिन देश ने एक ऐसे सपूत को सम्मानित किया, जिसने साहस, कर्तव्य और राष्ट्रभक्ति की परिभाषा को नई ऊँचाइयों तक पहुँचा दिया।
भारतीय वायुसेना के ग्रुप कैप्टन एवं अंतरिक्ष यात्री शुभांशु शुक्ला को भारत के सर्वोच्च शांतिकालीन वीरता पुरस्कार ‘अशोक चक्र’ से सम्मानित किया जाना केवल एक व्यक्ति का सम्मान नहीं, बल्कि उस युवा भारत की जीत है जो सपने देखता है, जोखिम उठाता है और राष्ट्र के लिए स्वयं को समर्पित करता है। उत्तर प्रदेश की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक राजधानी लखनऊ ने देश को अनेक स्वतंत्रता सेनानी, साहित्यकार और राष्ट्रसेवक दिए हैं। इसी धरती से निकले शुभांशु शुक्ला ने यह सिद्ध कर दिया कि प्रतिभा किसी सीमित दायरे की मोहताज नहीं होती। सामान्य पृष्ठभूमि से निकलकर असाधारण उपलब्धि हासिल करना ही सच्ची प्रेरणा है। उनकी यात्रा हमें बताती है कि यदि लक्ष्य स्पष्ट हो, अनुशासन जीवन का हिस्सा हो और राष्ट्र सर्वोपरि भावना बने, तो कोई भी ऊँचाई असंभव नहीं।
भारतीय वायुसेना में सेवा से लेकर अंतरिक्ष अभियानों तक, शुभांशु शुक्ला का हर कदम राष्ट्र के प्रति समर्पण का प्रमाण है। अशोक चक्र भारत का सर्वोच्च शांतिकालीन वीरता पुरस्कार है। यह सम्मान केवल असाधारण साहस के लिए दिया जाता है, वह साहस जो प्राणों की परवाह किए बिना राष्ट्रहित में दिखाया जाए। यह पुरस्कार उन वीरों को दिया जाता है जिनके लिए कर्तव्य, सुविधा से ऊपर और देश, स्वयं से बड़ा होता है।
शुभांशु शुक्ला को यह सम्मान मिलना इस बात का संकेत है कि आधुनिक युद्ध और सुरक्षा केवल सीमाओं तक सीमित नहीं रह गए हैं। आज राष्ट्र की रक्षा अंतरिक्ष, साइबर और तकनीकी मोर्चों पर भी होती है। ऐसे में एक अंतरिक्ष यात्री का अशोक चक्र से सम्मानित होना भारत की बदलती रणनीतिक सोच को भी दर्शाता है। 21वीं सदी में अंतरिक्ष केवल वैज्ञानिक खोज का क्षेत्र नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा का अहम आयाम बन चुका है। संचार उपग्रह, निगरानी प्रणाली, आपदा प्रबंधन और रक्षा तकनीक, ये सभी अंतरिक्ष पर निर्भर हैं। शुभांशु शुक्ला जैसे सैन्य पृष्ठभूमि वाले अंतरिक्ष यात्री इस बात का प्रतीक हैं कि भारत अब अंतरिक्ष को केवल प्रयोगशाला नहीं, बल्कि रणनीतिक शक्ति के रूप में देख रहा है। यह आत्मनिर्भर भारत की उस सोच को मजबूत करता है जिसमें विज्ञान, सेना और राष्ट्र एक साझा लक्ष्य के लिए कार्य करते हैं।
आज भारत विश्व का सबसे युवा देश है। यहाँ की औसत आयु लगभग 28 वर्ष है। यह युवा शक्ति यदि सही दिशा में प्रेरित हो जाए, तो भारत को विश्वगुरु बनने से कोई नहीं रोक सकता। शुभांशु शुक्ला की कहानी युवाओं को यह सिखाती है कि देशभक्ति केवल नारों में नहीं, कर्म में होती है। यह जरूरी नहीं कि हर युवा वर्दी पहने, लेकिन हर युवा अपने-अपने क्षेत्र में उत्कृष्टता हासिल कर राष्ट्र सेवा कर सकता है। इंजीनियर, वैज्ञानिक, पत्रकार, शिक्षक, किसान या उद्यमी, हर भूमिका में यदि राष्ट्र प्रथम की भावना हो, तो वही सच्ची देशभक्ति है।
गणतंत्र दिवस पर होने वाली परेड केवल सैन्य शक्ति का प्रदर्शन नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आत्मविश्वास का प्रतिबिंब होती है। जब ऐसे अवसर पर किसी वीर को अशोक चक्र से सम्मानित किया जाता है, तो वह संदेश देता है कि यह राष्ट्र अपने सपूतों को पहचानता है, उनका सम्मान करता है और उनसे प्रेरणा लेता है। यह सम्मान आने वाली पीढ़ियों के लिए एक प्रकाश स्तंभ बन जाता है, जो अंधकार में भी सही दिशा दिखाता है।
ऐसे राष्ट्रीय क्षणों में मीडिया और समाज की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। इन कहानियों को केवल समाचार बनाकर नहीं छोड़ देना चाहिए, बल्कि इन्हें आंदोलन बनाना चाहिए, प्रेरणा का आंदोलन। आज जब युवाओं के सामने भटकाव, त्वरित सफलता और शॉर्टकट की संस्कृति हावी है, तब शुभांशु शुक्ला जैसे उदाहरण उन्हें धैर्य, परिश्रम और अनुशासन का महत्व समझाते हैं।
77वाँ गणतंत्र दिवस 2026 इसलिए याद रखा जाएगा क्योंकि इस दिन भारत ने अपने एक सपूत को नहीं, बल्कि अपनी उस आत्मा को सम्मानित किया जो कहती है। राष्ट्र सर्वोपरि है।”लखनऊ के बेटे शुभांशु शुक्ला का अशोक चक्र से सम्मानित होना हर भारतीय के लिए गर्व का विषय है। यह सम्मान हमें याद दिलाता है कि भारत सुरक्षित हाथों में है और उसका भविष्य साहसी, सक्षम और राष्ट्रनिष्ठ युवाओं के हाथों में है। आज आवश्यकता है कि हम सब अपने-अपने स्तर पर यह संकल्प लें कि ईमानदारी, कर्तव्यनिष्ठा और देशभक्ति को जीवन का मूल मंत्र बनाएँ। तभी अशोक चक्र जैसे सम्मान केवल पदक नहीं, बल्कि राष्ट्र चरित्र का प्रतीक बनेंगे।

स्वतंत्र पत्रकार




