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धर्म

मकर संक्रान्ति का त्योहार विविधता में एकता का प्रतीक

प्राची राय
हमारे देश में विभिन्न त्यौहार है जो हमारी संस्कृति का परिचय एवं बोध कराते आये है। आज संक्रांति (मकर संक्रांति) का पर्व है जो हमारी भारत देश की विविधता में एकता का प्रतीक कहा जाता है। पौष मास में जब सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है, तब इस पर्व को मनाया जाता है। यह त्यौहार जनवरी माह के चौदहवें या पन्द्रहवें दिन ही पड़ता है। इस दिन सूर्य धनु राशि को छोड़कर मकर राशि में प्रवेश करता है। इस दिन से ही सभी शुभ कार्यों का भी आयोजन होता है। देश के अलग-अलग राज्यों में संक्रांति अलग-अलग नामों से मनायी जाती है। मकर संक्रांति के पर्व को उत्तरायण का पर्व भी कहते है। देश के विभिन्न स्थानों पर भव्य मेलों का आयोजन किया जाता है।
देश.मे मकर संक्रान्ति कहां कहां किस नाम.से.मनाया जाता मकर संक्रान्ति : छत्तीसगढ़, गोआ, ओड़ीसा, हरियाणा, बिहार, झारखण्ड, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, केरल, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, मणिपुर, राजस्थान, सिक्किम, उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड, पश्चिम बंगाल, गुजरात और जम्मू।पोंगल, उझवर तिरुनल : तमिलनाडु।उत्तरायणी : गुजरात, उत्तराखण्ड। माघ : हरियाणा, हिमाचल प्रदेश।,बिहु : असम।खिचडी़ संक्रांति : उत्तर प्रदेश और बिहार।पौष संक्रान्ति : पश्चिम बंगाल।मकर संक्रमण : कर्नाटक।लोहड़ी : पंजाब
मकर संक्रान्ति के दिन क्या बनता है अलग-अलग मान्यताओं के अनुसार इस पर्व के पकवान भी अलग-अलग होते हैं, लेकिन दाल और चावल की खिचड़ी इस पर्व की प्रमुख पहचान है। विशेष रूप से घी के साथ खिचड़ी खाने का महत्व है। इसके अलावा तिल और गुड़ का भी मकर संक्राति पर बेहद महत्व है। उत्तराखंड में इस दिन घुघुते बनाये जाते है, जिस कारण इस पर्व को घुघुत्या पर्व भी कहा जाता है।

मकर संक्रान्ति के दिन नान और दान
कहा जाता है कि मकर संक्रांति के दिन गंगा स्नान करने पर सभी कष्टों का निवारण हो जाता है, इसीलिए इस दिन दान, तप, जप का विशेष महत्व है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन को दिया गया दान विशेष फल देने वाला होता है।

मकर संक्रान्ति के दिन तिल का प्रयोग
हमारे ऋषि मुनियों ने मकर संक्रांति पर्व पर तिल के प्रयोग को बहुत सोच समझ कर परंपरा का अंग बनाया है।आयुर्वेद के अनुसार यह शरद ऋतु के अनुकूल होता है। मानव स्वास्थ्य की दृष्टि से तिल का विशेष महत्व है, इसीलिए हमारे तमाम धार्मिक तथा मांगलिक कार्यों में, पूजा अर्चना या हवन, यहां तक कि विवाहोत्सव आदि में भी तिल की उपस्थिति अनिवार्य रखी गई है।

तिल वर्षा ऋतु की खरीफ की फसल है। बुआई के बाद लगभग दो महीनों में इसके पौधे में फूल आने लगते हैं और तीन महीनों में इसकी फसल तैयार हो जाती है। इसका पौधा 3-4 फुट ऊंचा होता है। इसका दाना छोटा व चपटा होता है। इसकी तीन किस्में काला, सफेद और लाल विशेष प्रचलित हैं। इनमें काला तिल पौष्टिक व सर्वोत्तम है। आयुर्वेद के छह रसों में से चार रस तिल में होते हैं, तिल में एक साथ कड़वा, मधुर एवं कसैला रस पाया जाता है।
मकर संक्रांति का महत्व
मकर संक्रांति को भारतीय ज्योतिष और धार्मिक मान्यताओं में बड़ा ही महत्व दिया गया है। कहते हैं इस दिन स्वर्ग के दरवाजे खुलते हैं और देवताओं का दिन आरंभ होता है। दरअसल ऐसी मान्यता है कि धरती लोक का एक साल देवलोक का एक दिन होता है। जब सूर्य उत्तरायण होते हैं तो दिन आरंभ होता है और जब सूर्य दक्षिणायन होते हैं तब रात। इसलिए मकर संक्रांति के दिन जब सूर्य उत्तरायण होते हैं तो धरती लोक पर देवताओं की आराधना की जाती है और उनसे सुख समृद्धि की कामना की जाती है। इसलिए नाम भले ही अलग हैं, लेकिन देश के तमाम भागों में मकर संक्रांति का पर्व उत्साह और श्रद्धा से मनााया जाता है। 
सूर्य के मकर राशि में आने से जहां उत्तरायण होता है वहीं धनु राशि से सूर्य के मकर में आने पर एक महीने का खरमास समाप्त हो जाता है।

मांगलिक कार्यों जैसे विवाह की तिथियां शुरू हो जाती हैं। सूर्य का उत्तरायण होना शुभता और पुण्य का प्रतीक भी माना जाता है। सांकेतिक रूप से यह भी कह सकते हैं कि मकर संक्रांति से दिन की अवधि बढ़ने से जीवन अंधकार से प्रकाश की ओर गतिशील होता है। सूर्य के उत्तरायण के महत्व को समझने के लिए भीष्म पितामह का उदाहरण ले सकते हैं, जिन्होंने बांणों की शय्या पर अपार कष्ट सहा। लेकिन सूर्य के उत्तरायण होने का इंतजार किया। क्योंकि धार्मिक मान्यता है कि सूर्य के उत्तरायण होने पर शुभ मुहूर्त में प्राण त्यागने से आत्मा को फिर किसी शरीर में प्रवेश करके धरती के सुख दुख और जन्म मरण के चक्र में नहीं फंसना पड़ता है उसे आवागमन से मुक्ति मिल जाती है।

मकर संक्रांति के दिन क्यों उड़ाते हैं पतंग?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मकर संक्रांति के दिन सबसे पहले पतंग भगवान श्रीराम ने उड़ाई थी. कहा जाता है कि एक बार प्रभु श्रीराम पतंग उड़ा रहे थे, उनकी पतंग इतनी ऊंची उड़ रही थी कि वह इंद्रलोक तक पहुंच गई थी. इसी प्रसंग के कारण संक्रांति के दिन पतंग उड़ाने की परंपरा जुड़ गई. रामचरितमानस के बालकांड में भी भगवान राम द्वारा पतंग उड़ाने का उल्लेख मिलता है, जहां तुलसीदास लिखते हैं-
राम इक दिन चंग उड़ाई।
इंद्रलोक में पहुँची जाई॥’

पतंगबाजी का वैज्ञानिक महत्व
बात वैज्ञानिक महत्व की करें, तो मकर संक्रांति के समय ठंड कम होने लगती है और मौसम बदलने की शुरुआत होती है. इस दौरान धूप में बाहर रहना शरीर के लिए बहुत फायदेमंद होता है. पतंग उड़ाने के दौरान व्यक्ति धूप में रहता है जिससे शरीर को प्राकृतिक विटामिन डी मिलता है. इससे हड्डियां मजबूत होती हैं, इम्युनिटी बढ़ती है और सर्दी में होने वाली कई परेशानियों से राहत मिलती है. पतंग उड़ाते समय शरीर की हलचल भी बढ़ती है, जिससे शरीर एक्टिव होता है और एनर्जी मिलती है. इसलिए यह परंपरा स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से भी बेहतरीन मानी जाती है।

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