लजीज खानपान के लिए लखनऊ को मिला यूनेस्को प्रमाणपत्र

अशोक कुमार मिश्र
लखनऊ तहजीब के साथ, खान-पान के लिए भी मशहूर है। वाजपेई की पूरी, शुक्ला व जैन की चाट या प्रकाश कुल्फी जो भी लखनऊ आता है इसे बड़े चाव से खाता है। इसके साथ ही टुंडे कबाब व काकोरी कबाब आदि मुगलई व्यंजन भी यहां मशहूर है। इसी लजीज खानपान के लिए अब यूनेस्को ने भी इसको प्रमाण पत्र दे दिया है। सम्मान पत्र के साथ मोरक्को में 2026 में होने वाले आयोजन के लिए भी लखनऊ को आमंत्रण मिला है।
विश्व के बेहतरीन खानपान वाले शहरों में शामिल किए जाने के बाद यूनेस्को ने लखनऊ को प्रमाणपत्र दिया है। यूनेस्को ने यह प्रमाणपत्र और सम्मान पत्र प्रदेश सरकार को भेजा था, जिसे पिछले दिनों नगर आयुक्त ने महापौर सुषमा खर्कवाल को सौंप दिया। पत्र में यूनेस्को की ओर से 2026 में मोरक्को में आयोजित सम्मेलन का आमंत्रण भी भेजा गया है। यूनेस्को ने अक्तूबर माह में लखनऊ को क्रिएटिव सिटीज नेटवर्क के गैस्ट्रोनॉमी श्रेणी में भी शामिल किया है। इस उपलब्धि के लिए यूनेस्को के संस्कृति क्षेत्र के सहायक महानिदेशक एर्नेस्टो ऑट्टोने आर ने महापौर सुषमा खर्कवाल को यह सम्मान पत्र भेजा है।
लखनऊ केवल उत्तर प्रदेश की राजधानी ही नहीं, बल्कि भारत की खाद्य संस्कृति का एक ऐसा केंद्र है जहाँ स्वाद, तहज़ीब और परंपरा एक-दूसरे में घुल-मिल जाते हैं। ‘नवाबों का शहर’ कहलाने वाला लखनऊ अपने लजीज खानपान के लिए देश-दुनिया में विशेष पहचान रखता है। यहाँ का भोजन सिर्फ पेट भरने का साधन नहीं, बल्कि एक शाही अनुभव है, जिसमें खुशबू, सलीका और मेहमाननवाज़ी की झलक साफ दिखाई देती है। लखनऊ के खानपान की जड़ें अवध के नवाबी काल में मिलती हैं। नवाब वाजिद अली शाह के समय रसोई को कला का दर्जा मिला था। शाही बावर्चीखानों में ऐसे व्यंजन विकसित हुए, जो आज भी लखनऊ की पहचान बने हुए हैं। मसालों का संतुलित प्रयोग, धीमी आँच पर पकाने की तकनीक और स्वाद में नफासत, यही अवध की रसोई की खासियत है।
लखनऊ का ज़िक्र हो और टुंडे कबाब का नाम न आए, ऐसा संभव नहीं। कहा जाता है कि इसमें सौ से अधिक मसालों का प्रयोग होता है। खाने वाले बताते हैं कि यह इतना नरम होता है कि मुँह में रखते ही घुल जाता है। यही इसकी पहचान है। अमीनाबाद और चौक की गलियों में टुंडे कबाब आज भी उसी शिद्दत से परोसे जाते हैं, जैसे कभी नवाबी दौर में परोसे जाते थे। लखनऊ की बिरयानी अपने हल्के मसालों और खुशबूदार चावल के लिए जानी जाती है। यहाँ की ‘पक्की बिरयानी’ में चावल और मांस अलग-अलग पकाकर बाद में दम पर रखा जाता है, जिससे स्वाद में नज़ाकत बनी रहती है। इसका स्वाद हैदराबादी बिरयानी से अलग होता है। सुबह की शुरुआत लखनऊ में अक्सर निहारी से होती है। रात भर धीमी आँच पर पकी निहारी, जिसमें मसालों की गहराई और मांस की नरमी होती है, लखनऊ की सुबह को खास बना देती है। इसके अलावा कोरमा, क़लिया और पासंदा जैसे व्यंजन भी यहाँ की रसोई की शान हैं।
लखनऊ का खानपान केवल मांसाहारी व्यंजनों तक सीमित नहीं है। यहाँ की मिठाइयाँ भी उतनी ही प्रसिद्ध हैं। मलइदाद, शीरमाल, कुल्फी, रबड़ी और मक्खन मलाई सर्दियों में लोगों को अपनी ओर खींचती हैं। चौक और नक्खास की दुकानों पर मिलने वाली पारंपरिक मिठाइयाँ आज भी पुराने स्वाद को ज़िंदा रखे हुए हैं। एक ओर जहाँ चौक, अमीनाबाद और नक्खास की तंग गलियाँ पारंपरिक स्वाद परोसती हैं, वहीं दूसरी ओर गोमती नगर और हजरतगंज में आधुनिक रेस्तरां नवाबी व्यंजनों को नए अंदाज़ में प्रस्तुत कर रहे हैं। परंपरा और आधुनिकता का यह संगम लखनऊ के खानपान को और भी खास बनाता है।लखनऊ के भोजन की सबसे बड़ी खासियत है, तहज़ीब।
यहाँ खाना परोसने का सलीका, मेहमान से बातचीत और अदब-कायदे, स्वाद को और गहरा कर देते हैं। यही वजह है कि लखनऊ का खानपान केवल जीभ ही नहीं, दिल भी जीत लेता है। लखनऊ का लजीज खानपान उसकी सांस्कृतिक विरासत का जीवंत उदाहरण है। नवाबी दौर की शाही रसोई से लेकर आज की आधुनिक थाली तक, यहाँ का हर निवाला इतिहास, खुशबू और नफासत से भरा है। यही कारण है कि लखनऊ को सही मायनों में स्वाद और तहज़ीब की राजधानी कहा जाता है। इसी लजीज खानपान के लिए यूनेस्को ने अब लखनऊ को प्रमाणपत्र भी दे दिया है।




