विश्व शांति के प्रयास में 26 साल से जुटा राजधानी का एक स्कूल

Buy chief editor Hindustan Sandesh Ashok Kumar Mishra
विश्व में शांति स्थापित हो, इसके लिए राजधानी लखनऊ का एक स्कूल पिछले 26 सालों से जुटा हुआ है। यह गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में “एक ही शहर में सबसे ज्यादा विद्यार्थियों वाला स्कूल” माना गया है। इसके अलावा इस स्कूल को यूनेस्को प्राइस ऑफ़ पीस एजुकेशन आदि से भी सम्मानित किया गया था। इस स्कूल का नाम सिटी मांटेसरी स्कूल (सी एम एस) है। इसकी स्थापना डॉ. जगदीश गांधी और डॉ. भारती गांधी ने की थी। उनका जीवन दृष्टिकोण “जय जगत” पर आधारित है, जो “वसुधैव कुटुम्बकम” (पूरी पृथ्वी एक परिवार है) की प्राचीन भारतीय भावना से मिलता है। यह स्कूल विश्व में शांति के लिए पिछले 26 साल से विश्व के मुख्य न्यायधीशों व कानूनविदों का अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित कर रहा है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51 पर आधारित यह सम्मेलन इस वर्ष भी इस माह नवंबर में आयोजित हुआ।यह स्कूल चाहता है कि विश्व में शांति हो, कहीं कोई युद्ध न हो व सब सुरक्षित रहें।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51 में इसका उल्लेख होने के कारण यह स्कूल इस सम्मेलन का आयोजन लगातार 26 साल में से कर रहा है। यह सम्मेलन दुनिया भर के प्रमुख न्यायाधीशों, संवैधानिक विद्वानों, नीति निर्माताओं और विचारकों को एक मंच पर लाता है, ताकि वे वैश्विक कानूनी चुनौतियों, न्याय और वैश्विक शासन के मॉडल पर चर्चा कर सकें। खास बात यह है कि यह सम्मेलन अनुच्छेद 51 को थीम आधार बनाकर चलाया जाता है, यानी सीएमएस इसे संविधान के उस हिस्से के अनुरूप देखती है जो अंतरराष्ट्रीय न्याय, शांति और सम्मान का प्रोत्साहन देता है। अब तक इस सम्मेलन में 142 देशों से लगभग 1520 मुख्य न्यायाधीश, जज, कानूनविद और शीर्ष नेतृत्व शामिल हो चुके हैं। सम्मेलन में बच्चों की आवाज़ भी महत्वपूर्ण होती है। वे पेश करते हैं, एक याचिका जो न्यायाधीशों और नीति-निर्माता को यह याद दिलाती है कि भविष्य की पीढ़ियों (बच्चों) की भलाई, उनकी नैतिक जिम्मेदारी है। सम्मेलन में प्रस्तावित और पारित किए गए कई संकल्प हैं, जिसमें “न्याय की सार्वभौमिक व्यवस्था” के लिए वैश्विक कानून या एक “विश्व न्यायालय” की अवधारणा प्रमुख है। इस स्कूल का दर्शन “शांति और एकता” पर आधारित है। इसका मानता है कि न्यायाधीशों का वैश्विक मंच सिर्फ औपचारिकता नहीं है, यह संविधान द्वारा समर्थित नैतिक और वैधानिक जिम्मेदारी भी है, जिसे लागू करने के लिए न्यायाधीशों और नीति-निर्माताओं को आगे आना चाहिए। स्कूल के बच्चे न्यायाधीशों को सिर्फ कानूनी विशेषज्ञ नहीं बल्कि मानवता के संरक्षक मानते है।
उनका मानना है कि न्यायाधीशों का ग्लोबल संवाद नए विश्व-न्याय मॉडल की कल्पना कर सकते हैं। ऐसे सम्मेलन समय-समय पर यह याद दिलाते हैं कि वैश्विक समस्याओं जैसे युद्ध, पर्यावरण संकट, मानवाधिकार का समाधान सिर्फ राजनयिक या राजनीतिक नहीं हो सकता, कानूनी और न्याय-आधारित सोच की जरूरत है,और इसमें न्यायाधीशों की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है।अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की भूमिका को यदि समझना हो तो अनुच्छेद 51 को देखना अनिवार्य हो जाता है। यही प्रावधान देश को वैश्विक परिदृश्य में एक ऐसे राष्ट्र के रूप में प्रस्तुत करता है जो शांति, सहयोग और न्याय के आदर्शों पर आधारित विश्व व्यवस्था का समर्थक है। अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की शांति-प्रिय और सहयोगी छवि के पीछे जिस संवैधानिक सिद्धांत की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका है, वह है भारतीय संविधान का अनुच्छेद 51। अंतरराष्ट्रीय संबंधों के बदलते परिदृश्य में इस अनुच्छेद का महत्व और भी बढ़ गया है। यह भारत को अंतरराष्ट्रीय मामलों में एक “नैतिक नेतृत्व” प्रदान करता है, जिसके आधार पर देश विश्व शांति और सहयोग की नीतियों को मजबूती से आगे बढ़ाता है। अनुच्छेद 51 ने ही भारत की विदेश नीति को “शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व” और “संवाद आधारित समाधान” की ओर अग्रसर किया। 1954 का भारत–चीन पंचशील समझौता, 1961 की गुटनिरपेक्ष नीति, 1971 का मैत्री संधि समझौता, और हाल के वर्षों में जलवायु परिवर्तन, समुद्री सुरक्षा, तथा मानवीय सहायता से जुड़ी भारत की सक्रिय भूमिका, इन सभी के पीछे अनुच्छेद 51 की मूल भावना स्पष्ट झलकती है। सीमा मुद्दे हों, समुद्री सीमा का विवाद हो या जल बंटवारे का प्रश्न, भारत ने हमेशा “मध्यस्थता, पंच-निर्णय और शांतिपूर्ण वार्ता” को सर्वोच्च प्राथमिकता देने की नीति अपनाई है।
अनुच्छेद 51 ने भारत को एक ऐसे राष्ट्र के रूप में तैयार किया है जो संघर्ष की बजाय समाधान की तलाश करता है। भारत ने पिछले दो दशकों में वैश्विक पर्यावरण समझौतों, समुद्री कानून, मानवाधिकार संरक्षण, आतंकवाद विरोधी समझौतों में लगातार सक्रिय भागीदारी की है। यह सहभागिता भारत की अंतरराष्ट्रीय साख को मजबूत करती है और उसे विश्व के कानून-आधारित व्यवस्था का समर्थक बनाती है।पड़ोसी देशों के साथ सीमाई विवाद,सामरिक दबाव, वैश्विक शक्ति संघर्ष, आर्थिक हितों की प्रतिस्पर्धा आदि कई बार शांतिपूर्ण नीति को व्यवहारिक रूप से चुनौती देते हैं। इसके बावजूद, भारत इन परिस्थितियों में भी संवाद और शांति के मार्ग को प्राथमिकता देने की कोशिश करता रहा है।वैश्विक कानून बनाने की दिशा में विचार करना एक बात है, पर उसे लागू करना बहुत जटिल है, यह जानते हुए भी यह स्कूल पिछले 26 सालों से लगातार जुटा हुआ है। विश्व न्यायालय” या “वैश्विक संसद” जैसे विचार आदर्शवाद पर ज्यादा आधारित हैं, और वे वास्तविकता में हर देश द्वारा स्वीकार नहीं किए जाएंगे। यह देखने की ज़रूरत है कि सम्मेलन के प्रस्ताव और संकल्प वास्तव में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नीति निर्माताओं और राजनयिकों द्वारा कितने गंभीरता से लिए जाते हैं।




