वाराणसी:भोजपुरी एवं मधुबनी पेंटिंग पर चर्चा हुई

सुशील कुमार मिश्र
हिंदुस्तान संदेश/वाराणसी। मंगलवार को भोजपुरी अध्ययन केंद्र द्वारा आयोजित सप्तदिवसीय कार्यशाला के द्वितीय दिवस पर ‘भोजपुरी चित्रकला: चौक पूरना और श्रम संस्कृति’ पर चर्चा परिचर्चा हुई।स्वागत वक्तव्य देते हुए प्रो. प्रभाकर सिंह ने बताया कैसे एक कलाकार संस्थागत आबद्धताओं एवं प्रतिबद्धताओं से मुक्त होता है इसलिए उसकी कला समष्टि चेतना से युक्त होती है।संचालन कर रही आकृति विज्ञा ‘अर्पण’ ने आरम्भ में भोजपुरी कविता लेखन के टूल्स पर प्रकाश डाला। भोजपुरी की रवायत, छंदों एवं लोक धुनों की महत्ता पर भी विस्तार से चर्चा की।भोजपुरी अंचल में चौका पूरन, कोहबर चित्रकला, गोधन एवं महावर की प्रस्तुति पर महिमा महाविद्यालय से आयीं डॉ. उर्वशी गहलौत ने विस्तार से चर्चा-परिचर्चा की। प्रसिद्ध भोजपुरी चित्रकार संजीव सिन्हा द्वारा बनाए गये चित्र का अनावरण इस कार्यशाला का आकर्षण रहा। भोजपुरी एवं मधुबनी चित्रों में विद्यमान समानता एवं भिन्नताओं के बिन्दुओं पर विस्तृत चर्चा की।उपरोक्त विषय के दूसरे मर्मज्ञ विद्वान् डॉ. राधाकृष्णन गणेशन ने रंगोली शब्द की व्युत्पत्तिपरक व्याख्या प्रस्तुत करते हुए विविध प्रदेशों में प्रयुक्त रंगोलियों की शैली पर प्रकाश डाला। प्रो. नीरज खरे ने अध्यक्षीय भाषण देते हुए कलाओं की समावेशिता पर बल दिया। आज के सत्र का औपचारिक धन्यवाद ज्ञापन डॉ. अंबरीष कुमार ‘ चंचल’ ने दिया।




