
क्या भारत में विकास की परिभाषा विरासत तोड़ना बनती जा रही है
वाराणसी केवल एक नगर नहीं, बल्कि भारत की सभ्यतागत चेतना का जीवंत प्रतीक है। यहां लिया गया हर प्रशासनिक निर्णय स्थानीय नहीं रहता, वह पूरे राष्ट्र के सांस्कृतिक विवेक को प्रभावित करता है। अहिल्याबाई घाट पर अहिल्याबाई होलकर से जुड़ी धार्मिक–ऐतिहासिक संरचना को विकास के नाम पर हटाने की कार्रवाई ने आज पूरे देश के सामने एक मूल प्रश्न खड़ा कर दिया है,क्या भारत में विकास का अर्थ अब विरासत को हटाना होता जा रहा है?अहिल्याबाई होलकर भारतीय इतिहास की उन महान विभूतियों में हैं, जिन्होंने सत्ता को भोग नहीं, सेवा का माध्यम बनाया। काशी विश्वनाथ मंदिर, मणिकर्णिका घाट और काशी के अनेक तीर्थस्थलों के पुनर्निर्माण में उनका योगदान केवल स्थापत्य कार्य नहीं, बल्कि सनातन सांस्कृतिक पुनर्जागरण था। काशी में उनसे जुड़ी हर संरचना आस्था, इतिहास और राष्ट्रीय स्मृति का संगम है। ऐसे में किसी भी कार्रवाई को साधारण प्रशासनिक प्रक्रिया मान लेना ऐतिहासिक दृष्टिहीनता होगी।
संविधान का स्पष्ट निर्देश
भारतीय संविधान विकास का विरोध नहीं करता, लेकिन वह विकास को सांस्कृतिक विनाश की छूट भी नहीं देता। संविधान का अनुच्छेद 49 राज्य पर यह दायित्व डालता है कि वह ऐतिहासिक और राष्ट्रीय महत्व की स्मृतियों की रक्षा करे। यह दायित्व केवल अधिसूचित स्मारकों तक सीमित नहीं है, बल्कि उन सभी स्थलों पर लागू होता है जिनका ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व स्थापित है। इसके साथ ही अनुच्छेद 25 और 26 नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता और धार्मिक संस्थाओं के प्रबंधन का अधिकार देते हैं। किसी धार्मिक संरचना को बिना व्यापक संवाद, बिना सहमति और बिना सम्मानजनक विकल्प के हटाना इन संवैधानिक प्रावधानों की भावना के विरुद्ध है। संविधान सुविधा के नाम पर आस्था के विस्थापन को वैध नहीं ठहराता।
विरासत संरक्षण: केवल भावना नहीं, विधिक दायित्व
भारत में विरासत संरक्षण कोई भावुक आग्रह नहीं, बल्कि कानूनी और नैतिक उत्तरदायित्व है। ऐतिहासिक संरचनाओं को हटाना अंतिम उपाय होना चाहिए, न कि पहली कार्रवाई। संरक्षण, मरम्मत और संरचनात्मक समायोजन जैसे विकल्पों पर गंभीरता से विचार किए बिना तोड़फोड़ का रास्ता चुनना प्रशासनिक सुविधा हो सकती है, लेकिन संवैधानिक न्याय नहीं।न्यायपालिका बार-बार यह स्पष्ट कर चुकी है कि जनहित के नाम पर सांस्कृतिक पहचान और ऐतिहासिक स्मृति को नष्ट नहीं किया जा सकता। यदि अहिल्याबाई घाट पर की गई कार्रवाई बिना विशेषज्ञ परामर्श, बिना सामाजिक सह भागिता और बिना पारदर्शी प्रक्रिया के हुई है, तो वह न केवल कानून के विरुद्ध है, बल्कि राष्ट्र के सांस्कृतिक विवेक पर भी आघात है।
प्रशासनिक तर्क और उसकी सीमा
प्रशासन का तर्क है कि घाटों पर भीड़, स्वच्छता और सुरक्षा की समस्या है और पुनर्विकास आवश्यक है। इस तर्क से कोई असहमति नहीं हो सकती। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या काशी जैसे नगर में विकास का एकमात्र मार्ग इतिहास को हटाना ही है? क्या सुविधा का अर्थ स्मृति का विस्थापन है? संविधान शासन को केवल आदेश देने की शक्ति नहीं देता, बल्कि उसे जनता की आस्था और सांस्कृतिक स्मृतियों का संरक्षक भी बनाता है। यदि निर्णय प्रक्रिया में स्थानीय समाज, धर्माचार्य और इतिहासविदों को शामिल नहीं किया गया, तो ऐसा विकास लोकतांत्रिक सहमति से नहीं, बल्कि प्रशासनिक दबाव से हुआ विकास कहलाएगा।
अहिल्याबाई होलकर: स्मारक नहीं, उत्तरदायित्व
अहिल्याबाई होलकर किसी एक क्षेत्र या समाज की नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र की सांस्कृतिक धरोहर हैं। काशी में उनसे जुड़ी संरचनाएं राज्य की संपत्ति नहीं, बल्कि राष्ट्र की साझा विरासत हैं। उनका संरक्षण किसी विभाग की इच्छा पर नहीं छोड़ा जा सकता। यह राज्य का संवैधानिक उत्तरदायित्व है।जो शासन अतीत का सम्मान नहीं करता, वह भविष्य की नींव भी कमजोर करता है। काशी में विकास तभी सार्थक होगा, जब वह यह स्वीकार करे कि यहां हर पत्थर केवल निर्माण सामग्री नहीं, बल्कि सभ्यता की साक्षी है।
निष्कर्ष
यदि अहिल्याबाई घाट पर की गई कार्रवाई बिना विधिसम्मत प्रक्रिया, बिना सामाजिक संवाद और बिना सांस्कृतिक संवेदनशीलता के हुई है, तो वह विकास नहीं, बल्कि विरासत पर प्रहार है। ऐसा विकास न संविधान स्वीकार करता है, न इतिहास क्षमा करता है।
यह केवल काशी का प्रश्न नहीं है। यह उस भारत का प्रश्न है, जो यह तय कर रहा है कि वह आधुनिकता के नाम पर अपनी स्मृतियों को छोड़ेगा या उन्हें साथ लेकर आगे बढ़ेगा। राष्ट्र का भविष्य वही सुरक्षित कर सकता है, जो अपने अतीत की रक्षा करना जानता हो।

लेखक: डॉ. संतोष सिंह
राष्ट्रीय अध्यक्ष, विश्व वैदिक सनातन न्यास




