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भदोही

भदोही : उमरा से लौटे हाजी शकील खान से मिलने पहुंचे सभासद, दी मुबारकबाद

हाजी शकील खान मदीने की खुशबू से मोअत्तर हुई फिजाओं और नबी की गलियों की बातों को बताते हुए हो गए अश्कबार

आफताब अंसारी
भदोही। उमरा शरीफ से लौटे सना पब्लिक स्कूल के प्रबंधक हाजी शकील खान से मिलने के लिए आशिके रसूल पहुंच रहे है जहां उन्हें मदीने की खजूर और आबे ज़मज़म से सैराब किया जा रहा है। मंगलवार को नगर पालिका परिषद भदोही के सीनियर सभासद गुलाम हुसैन संजरी व पूर्व सभासद साहबे आलम संजरी हाजी शकील खान के आवास पर पहुंचे जहां डॉ श्री संजरी ने श्री खान को गले लगाकर मोबारकबाद पेश की। वहीं श्री खान ने सभासद गुलाम हुसैन संजरी व साहबे आलम संजरी को मदीने की खजूर और आबे ज़मज़म से सैराब कराया। इस मुलाकात में हाजी शकील खान ने आये हुए मेहमानों को मदिनतुर्रसुल की खुशबू से मोअत्तर हवाओं के बारे में बताया कि मदीने की गलियों की बात ही निराली है। हाजी साहब ने मेहराबे मेम्बरे, रियाजुल जन्ना, सफा मरवा, मुदजल्फा, मना की वादी, मैदान अरफात की बातों को बताते हुए अश्कबार हो गए। उनके लबे मुबारक से गुंबदे ख़ज़रा में आराम फरमाने वाले आक़ा मुस्तफा जाने रहमत स.की मीठी-मीठी बातें सुन लोगो के भी आँखें अश्कबार हो गई। हाजी साहब से जो कोई आता मिलने तो वे नबी-ए-मोकर्र्म स.के शहर की बात करते और उनका दिल मचल जाता। कहा मदीने की गली छोड़ कर हम यहां आये तो ज़रूर है लेकिन दिलो दिमाग मदीने की गलियों में गर्दिश कर रही है। मदीने की खुशबु लिए आशिकाने मुस्तफा कुछ इस अंदाज़ में बयां कर रहे थे की बारिशे तहारत में गुस्ल कर के लौटी है। उम्र भर न देखेंगी अब इधर उधर आँखे। ज़िक्र हुस्ने तैबा का हक़ अदा नहीं होता। वरना लोग पी जाएं घोल-घोल कर आंखे। कहा ज़िन्दगी में देख आएं उनका संगे दर आँखे। कितनी मोतबर निकली मेरी बेहुनर आँखें कहते-कहते आँखे अश्कबार हो जाती। मेहमाने आक़ा स.से नबी-ए-आखेरुज़्ज़मा सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के शहर का जमाल और दरे खाक की खुश्बुवों की महक से लोग फैज़ियाब होते रहे। उनकी आँखों ने गुंबदे ख़ज़रा की सुनहरी जाली रियाजुलजन्ना।जन्नतुलबकीय.जबले वहद गारे हेरा,गारे सुर, मस्जिदे कुबा, मक़ामे इब्राहिम तो संगे अस्वद का बोसा लेना और परवरदिगार के घर की ज़ियारत का शरफ हासिल होने पर लोग उनके आँखों और लबो को इश्के मुस्तफा स.की नज़र से देख रहे थे। बताया निगाहो में मदीने का मंज़र और काबे का तवाफ़ समाया हुआ है मस्जिदे नबवी में नमाज़ पढ़ना याद आ रहा है कहते-कहते आँखों से आंसू छलक पड़े। बहरहाल लोग अज़वा खजूर और आबे ज़मज़म से सैराब होते रहे और मुस्तफा जाने रहमत सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के शहर की बाते सुन फैज़ियाब होते रहे।

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