…तो मैं मुख्यमंत्री के मीडिया सेल/सलाहकार टीम का हिस्सा होता…विनय मौर्या

बात हिमाचल से—
कल मैंने हिमाचल यात्रा से जुड़ा अपना अनुभव साझा किया था। आज जो शीर्षक दिया है, उसे पढ़कर आप सोचेंगे यह कैसे और क्यों और इस तस्वीर का भी आशय जानना चाहेंगे। बहरहाल, तस्वीर को लेकर स्पष्ट कर दूं कि दोनों तस्वीरें करीब डेढ़ दशक पुरानी हैं। ऊपर जो तस्वीर है, वह बड़े भाई अमित आर्या की है। जब मैं टीवी 24 न्यूज़ चैनल का ब्यूरो था, तब वे एक बड़े चैनल में बड़े पद पर पदस्थापित थे। विनम्र, व्यवहारकुशल। 2012 के बाद जब मैंने इलेक्ट्रॉनिक मीडिया छोड़ा प्रिंट की तरफ रुख किया, तब कभी-कभार भैया से बात-मुलाकात हो जाती थी। बाद में यह हरियाणा के मुख्यमंत्री के मीडिया सलाहकार बने, उसके बाद एक केंद्रीय मंत्री के सलाहकार और फिर तरक्की का एक और पायदान ईनके हिस्से आया, जब सरकार ने ईन्हें विश्वविद्यालय का कुलपति बना दिया। अंर्तमुखी और संकोची होने के कारण जब यह आगे बढ़ते गयें मैं इनसे दूर होता गया यह सोचकर कि यह न सोचें कि मैं लोभ लाभ से जुड़ा हूँ।
इससे पहले कि आप इन्हीं के इर्द-गिर्द घूमते हुए पूरे विषय को इन्हीं पर सिमटता देखें, मैं मूल विषय पर आता हूं। यही कोई 2021 की बात रही होगी। मैं जिस अख़बार में खबरें लिखता था, उसमें केंद्रीय सत्ता की नीतियों पर सवाल खड़े करता, सरकार की कमियों पर समीक्षात्मक बखिया उधेड़ लिखता। वह खबरें उस वक्त खूब वायरल होती थीं। देश की दूसरे नंबर की पार्टी का सोशल मीडिया सेल उन्हें सोशल साइट्स पर चिपकाए रहता था। मिलियन में शेयर और व्यूज़ होते थे। उसके अगले साल यूपी और हिमाचल में विधानसभा चुनाव थे। देश की दूसरे नंबर की पार्टी मीडिया को लेकर बेहद सक्रिय थी। मेरी खबरें उसके रणनीतिकारों के लिए मुफीद थीं यानी सरकार की नाकामियों की दास्तान सुनाती थीं।2021 की एक शाम मेरे मोबाइल पर फोन आया। उस व्यक्ति ने मेरा परिचय पूछा, फिर खबरों को लेकर तारीफ की और सीधे मुद्दे पर आ गया। उसने बताया कि वह हरियाणा का रहने वाला है और केंद्रीय पार्टी के किसी बड़े पद का परिचय देते हुए बोला कि वह हिमाचल चुनाव में मीडिया प्रभारी है ऐसे ही दो-तीन अहम पद गिनाए। उसने कहा कि आप बेहतर लिखते हो, उसके लहजे में हरियाणवी पुट था। बोला एक काम करो, आप मेरे लिए यानी मेरी पार्टी के लिए लिखो, आपको आर्थिक लाभ होगा। मैंने धन्यवाद के साथ कहा कि भाई, मैं जो लिखता हूं वह समीक्षात्मक और स्वेच्छिक होता है, मुझे अघोषित पोषित मीडिया का हिस्सा नहीं बनना है।
फिर उसका दूसरा ऑफर था अगर हिमाचल में मेरी सरकार बनती है तो आप सीएम के मीडिया सेल सलाहकार टीम का हिस्सा रहेंगे। मैंने सोचा, मेरा घर-बार, दोस्त-रिश्तेदार सब यूपी में हैं और मैं हिमाचल में क्या तीर मारूंगा। दूसरी बात, मेरा पूरा फोकस यूपी पर ही था। बहरहाल, विनम्रता से इंकार के बाद उसने कहा आपकी मर्जी। और मैंने उसका नंबर तक सेव करना गंवारा नहीं समझा। बाद में उन्हीं की सरकार हिमाचल में बनी।ऐसी दो तीन वाकये के बाद मुझे अब लगता है कि कभी-कभी जज़्बात और नैतिकता में लिए गए फैसले करियर को खरबूजे की तरह खा जाते हैं। आज उस व्यक्ति की बात से सहमति जता देता तो अमित आर्या भइया की तरह कुलपति भले न बनता, मगर वर्तमान की तरह “धूलपति” भी नहीं होता। इसलिए नेता अवसर देखकर नैतिकता को तिलांजलि दे देते हैं। हो सकता है पहले कभी आपने मेरे इस जिक्र को कहीं पढ़ा हो, मगर इस बार जब हिमाचल गया तो उस व्यक्ति को याद कर रहा था। कुछ होता न होता, मगर बातचीत बनी रहती तो कुछ सरकारी सुविधाएं ही मुहैया हो जातीं।
बनारस,संपादक-अचूक रणनीति समाचार पत्र


