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राजनीतिविचार लेख

शोक से पहले शपथ: सत्ता की यह कैसी हड़बड़ी? @शाश्वत तिवारी


महाराष्ट्र की राजनीति ने एक बार फिर दिखाया है कि यहाँ सत्ता को विराम नहीं चाहिए, चाहे शोक अधूरा ही क्यों न रह जाए। राजनीति में संवैधानिक प्रक्रियाएँ ज़रूरी होती हैं, इसमें कोई दो राय नहीं, लेकिन क्या लोकतंत्र सिर्फ प्रक्रियाओं से चलता है, या फिर संवेदनाओं से भी? अजीत पवार की मृत्यु के मात्र तीसरे दिन उनकी पत्नी का महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री पद की शपथ लेना केवल एक राजनीतिक घटना नहीं है, बल्कि यह समाज और सत्ता, दोनों के लिए एक असहज प्रश्न खड़ा करता है। यह सवाल व्यक्ति विशेष पर नहीं, उस राजनीतिक संस्कृति पर है जहाँ शोक से पहले शपथ और संवेदना से पहले सत्ता की प्राथमिकता तय हो जाती है। आम नागरिक के लिए मृत्यु के बाद तेरह दिन का शोक केवल परंपरा नहीं, बल्कि मानवीय ठहराव का समय होता है। तो फिर सत्ता के गलियारों में यह ठहराव क्यों नहीं दिखता?
क्या कुर्सी खाली रहने का डर इतना बड़ा है कि संवेदनाएँ इंतज़ार नहीं कर सकतीं? यह तर्क दिया जा सकता है कि राज्य की स्थिरता के लिए तुरंत निर्णय आवश्यक थे, पर स्थिरता सिर्फ पद भरने से नहीं आती, वह भरोसे, मर्यादा और नैतिकता से भी आती है। आज सवाल यह है कि क्या, शपथ का यह उचित समय हैं? अजीत पवार की आकस्मिक मृत्यु के तीसरे दिन शपथ लेना संवैधानिक रूप से वैध हो सकता है, पर यह निर्णय लोकतांत्रिक विवेक और सार्वजनिक मर्यादा के प्रश्नों से मुक्त नहीं है। यह घटना हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हम ऐसे लोकतंत्र की ओर बढ़ रहे हैं, जहाँ सत्ता को ठहराव की आवश्यकता नहीं, और संवेदना को विलासिता समझा जाने लगा है? लोकतंत्र केवल नियमों से नहीं चलता। वह विश्वास, संवेदना और समय की समझ से चलता है। और जब शोक से पहले शपथ होने लगे, तो सवाल केवल राजनीति का नहीं रहता, वह समाज की दिशा का सवाल बन जाता है।

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