“गंगाजल” मोक्षदायिनी के साथ इलाज में भी कारगर

अशोक कुमार मिश्र
गंगाजल की बहुत महिमा है। गंगाजल केवलमोक्षदायिनी ही नहीं है, वह लोगों को रोगों से बचाव भी करती है। डॉक्टर गंगाजल से पेट की बीमारी का इलाज भी कर रहे है। वह 50 मरीजों पर अध्ययन कर रहे है। उनका कहना है कि गंगाजल से तैयार फेज थेरेपी पेट की बीमारियों में राहत दे रही है। किंग जार्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (केजीएमयू), लखनऊ और राजर्षि दशरथ आटोनामस स्टेट मेडिकल कालेज, अयोध्या के चिकित्सकों ने 18 से 65 वर्ष की आयु वाले 50 मरीजों पर अध्ययन किया। सभी मरीज अपच और एच. पाइलोरी संक्रमण से पीड़ित थे, जिसकी पुष्टि रैपिड यूरियेज टेस्ट से हुई।अध्ययन में मरीजों को दो समूहों में बांटा गया। 24 मरीजों को केवल एलोपैथिक दवाएं दी गईं, जबकि 26 को दवाओं के साथ गंगाजल आधारित फेज थेरेपी भी दी गई। 14 दिन उपचार के बाद पाया गया कि सिर्फ दवा लेने वालों में 66.7 प्रतिशत, जबकि फेज थेरेपी वाले समूह में 69.2 प्रतिशत मरीज संक्रमण मुक्त पाए गए। राहत के मामले में भी फेज थेरेपी आगे रही। पेट दर्द, जलन, भारीपन व गैस में सुधार देखा गया। उनकी जीवन-गुणवत्ता बेहतर दर्ज हुई। शोध में केजीएमयू लखनऊ के गैस्ट्रोएंटेरोलाजी विभाग के डा. अजय पाटवा, डा. महेश चंद्र पांडेय, डा. जितेंद्र सिंह और डा. रवि कुमार, राजर्षि दशरथ आटोनामस स्टेट मेडिकल कालेज, अयोध्या के माइक्रोबायोलाजी और क्लिनिकल रिसर्च यूनिट से डा. विरेंद्र वर्मा, डा. अर्चना देवी और डा. भरत झुनझुनवाला शामिल रहे। शोधकर्ताओं ने गंगाजल को माइक्रो-फिल्टर से छानकर उसमें मौजूद प्राकृतिक बैक्टीरियोफेज अलग किए। ये सूक्ष्म वायरस एच. पाइलोरी जैसे हानिकारक बैक्टीरिया को चुनकर नष्ट करते हैं। इसके बाद इन फेज को मेडिकल-ग्रेड तरल रूप में तैयार किया गया और निर्धारित खुराक में मरीजों को दिया गया। मरीज को इससे बहुत राहत मिली।
भारत की आत्मा में यदि किसी नदी का वास है, तो वह मां गंगा हैं। गंगा केवल एक नदी नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता, संस्कृति, आस्था और जीवन-दर्शन की अमर धारा हैं। हिमालय की गोद से निकलकर सागर तक बहती गंगा करोड़ों भारतीयों के लिए जीवन, मोक्ष और पवित्रता का प्रतीक मानी जाती हैं। गंगा जल की महिमा वेदों, पुराणों, उपनिषदों से लेकर लोकजीवन तक व्याप्त है। हिंदू धर्मग्रंथों में गंगा को देवनदी कहा गया है। मान्यता है कि गंगा का उद्गम स्वर्गलोक से हुआ और राजा भगीरथ के कठोर तप से वे पृथ्वी पर अवतरित हुईं। भगवान शिव ने अपनी जटाओं में गंगा को धारण कर उनकी वेगवती धारा को नियंत्रित किया, जिससे पृथ्वी पर जीवन सुरक्षित रह सका। भागवत पुराण, रामायण और महाभारत में गंगा का बार-बार उल्लेख मिलता है। कहा जाता है कि गंगा जल के स्पर्श मात्र से पापों का नाश और आत्मा की शुद्धि होती है। मृत्यु के समय मुख में गंगा जल डालने की परंपरा मोक्ष प्राप्ति की कामना से जुड़ी है।
गंगा जल की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह लंबे समय तक खराब नहीं होता। वर्षों तक संग्रहित रहने पर भी उसमें दुर्गंध नहीं आती। गंगा जल में पाए जाने वाले विशिष्ट बैक्टीरियोफेज हानिकारक जीवाणुओं को नष्ट करने में सहायक होते हैं। ब्रिटिश काल में वैज्ञानिकों ने पाया कि हैजा जैसी बीमारियों के जीवाणु गंगा जल में शीघ्र नष्ट हो जाते थे। इसमें घुलित खनिज और ऑक्सीजन की मात्रा अधिक होती है, जिससे यह जल शुद्ध बना रहता है। गंगा जल को अमृत तुल्य माना गया है, जो हर कार्य को पवित्र बनाता है। गंगा के तट पर ही भारतीय सभ्यता पनपी। ऋषि-मुनियों के आश्रम, गुरुकुल, विश्वविद्यालय और तीर्थ विकसित हुए। वाराणसी, प्रयागराज, हरिद्वार जैसे नगर संस्कृति और अध्यात्म के केंद्र बने। गंगा जल की महिमा को शब्दों में समेटना कठिन है। यह जल नहीं, संस्कार है, नदी नहीं, मां है, और प्रवाह नहीं, मोक्ष की धारा है। जब तक गंगा बहती रहेंगी, तब तक भारत की आध्यात्मिक चेतना जीवित रहेगी और लोग स्वस्थ रहेंगे।
भारतीय संस्कृति में गंगा केवल एक नदी नहीं, बल्कि जीवनदायिनी और स्वास्थ्यवर्धक धारा के रूप में पूजित रही है। प्राचीन काल से गंगा जल को रोगनाशक और शुद्ध करने वाला माना जाता रहा है। आस्था के साथ-साथ आधुनिक शोध भी यह संकेत देते हैं कि गंगा जल में ऐसे प्राकृतिक गुण हैं, जो इसे सामान्य जल से अलग पहचान देते हैं।हानिकारक बैक्टीरिया को नष्ट करने की क्षमता गंगा जल में हैं। यही कारण है कि पुराने समय में गंगा जल का उपयोग घाव धोने और संक्रमण से बचाव के लिए किया जाता था। आयुर्वेद के अनुसार, सीमित मात्रा में शुद्ध गंगा जल का सेवन पाचन क्रिया को संतुलित करने में सहायक माना गया है। इसके अलावा त्वचा रोगों, खुजली और एलर्जी जैसी समस्याओं में गंगा जल से स्नान को लाभकारी बताया गया है। गंगा जल में निहित प्राकृतिक और औषधीय गुण आज भी इसे स्वास्थ्य के लिए उपयोगी बनाते हैं, लेकिन इसके संरक्षण और स्वच्छता पर विशेष ध्यान देना समय की आवश्यकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि गंगा को प्रदूषण से मुक्त रखा जाए, तो यह न केवल आस्था बल्कि स्वास्थ्य की दृष्टि से भी आने वाली पीढ़ियों के लिए अमूल्य धरोहर बनी रहेगी।




