
वैदिक और पौराणिक धर्म शास्त्रों में प्रकृति के पंच महाभूतों को ईश्वर के समतुल्य माना गया है। सनातनी परम्परा को मानने वाले आदि काल से ही पंच महाभूत के रूप में पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि और आकाश की महत्ता को स्वीकार करते हैं। प्रकृति और पर्यावरण को शुद्ध रखने में सूर्य की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इनकी रश्मियों और प्रकाश से जीवों में ऊर्जा का संचार होता है। आज सौर ऊर्जा को संग्रहित कर उसका उपयोग विभिन्न रुपों में सफलता पूर्वक किया जा रहा है। सनातनी व्रत और त्योहारों में भी सूर्योपासना को विशेष दर्जा दिया गया है।प्रकृति में सूर्य को प्रत्यक्ष देव की संज्ञा दी गई है। इनका सीधा संबंध पृथ्वी और सौरमंडल से होता है। जीवन के आधार के साथ ही ज्ञान, प्रकाश, शक्ति और ऊर्जा के स्रोत सूर्य को कृतज्ञता प्रकट करने हेतु साधु-सन्त, ऋषि-मुनि, योगी, साधक के साथ ही साथ वैष्णवजन भी नित्य प्रति सूर्योपासना हर युग में करते रहे हैं।
सूर्य महापर्व के रूप में सूर्य षष्ठी (छठ पर्व) में व्रतियों द्वारा शाम को अस्ताचलगामी और सवेरे उदयाचलगामी सूर्य को अर्घ्य देकर उनकी ऊर्जा को आत्मसात कर शरीर की सकारात्मक ऊर्जा को सक्रिय किया जाता है। यौगिक क्रिया सूर्य नमस्कार के माध्यम से शरीर को स्वस्थ रखने में मदद मिलती है।वास्तविकता है कि सूर्य सौरमंडल की बारह राशियों पर भ्रमणशील रहता है। सूर्य जब एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करता है तब उस समय को संक्रांति कहते हैं। इस क्रम में वर्ष में बारह संक्रांति होती हैं जिसमें सर्वाधिक लोकप्रिय संक्रांति मकर संक्रांति होती है। इस दिन ही सूर्य धनुराशि से बाहर निकल कर मकर राशि में प्रवेश करते हैं। यह समय हर साल चौदह या पन्द्रह जनवरी का होता है, जो प्रति वर्ष सनातनी जनों द्वारा उत्साहपूर्वक मनाया जाता है।

इस दिन का धार्मिक महत्व भी होता है क्योंकि इसी दिन सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण होते हैं अर्थात सूर्य का झुकाव उत्तर तरफ हो जाता है। प्राणियों की ऊर्जा और संकल्प शक्ति में बढ़ोतरी होने लगती है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार मकर राशि के स्वामी शनि हैं जो सूर्य पुत्र हैं। मकर सक्रांति के दिन सूर्य अपने पुत्र शनि के यहां एक माह के लिए पहुंचते हैंं। सूर्य के मकर राशि में पहुंचने से क्रमशः दिन बड़े और रात्रि छोटी होने लगती हैं। सूर्य के उत्तरायण होते ही धार्मिक शुभ आयोजन आरम्भ हो जाते हैं। मकर संक्रांति पर लोग पवित्र नदियों में प्रातः काल में स्नान और सूर्योपासना कर तिल, गुड़ आदि का सेवन व दान पुण्य करते हैं और खिचड़ी का प्रसाद ग्रहण करते हैं। देश के विभिन्न हिस्सों में यह त्यौहार विभिन्न नाम के साथ रीति रिवाज से मनाया जाता है।




