गाजीपुर के काव्य-साहित्य का इतिहास’ का किया लोकार्पण
पुस्तक गाजीपुर की उर्वरा साहित्यिक भूमि की फसलें लोगों के समक्ष है, यह पूर्वजों को मेरी श्रद्धांजलि है- गजाधर शर्मा 'गंगेश"


गाजीपुर। नगर के लंका स्थित रामलीला समिति के सभागार में रविवार को साहित्य चेतना समाज के तत्वाधान में डाॅ.गजाधर शर्मा ‘गंगेश’ की पुस्तक ‘गाजीपुर के काव्य-साहित्य का इतिहास’ का लोकार्पण किया गया। अध्यक्षता भोलानाथ त्रिपाठी विह्वल और मुख्य अतिथि के रूप में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के सेवानिवृत्त प्रोफेसर डाॅ.अवधेश प्रधान थे। इस मौके पर पुस्तक लेखक डॉ. गजाधर शर्मा गंगेश ने कहा कि तमाम परेशानियों के बावजूद मैंने काव्य-इतिहास पूरा किया। जिससे गाजीपुर की उर्वरा साहित्यिक भूमि की फसलें लोगों के समक्ष आ सकें। यह पूर्वजों को मेरी श्रद्धांजलि है। नए लोगों को इतिहास और साहित्य के क्षेत्र में कार्य करने के लिए आह्वान करती है। शेषनाथ राय ने कहा कि डाॅ. गंगेश ने इस पुस्तक से हमें बड़ा होने का अवसर दिया है। डॉ अजीत कुमार राय ने कहा कि डाॅ.गंगेश ने भगीरथ प्रयास कर इस परियोजना को मूर्त रूप दिया है। यह प्राणायामी साधना है। प्रो.आनंद सिंह ने डाॅ. गंगेश ने पूर्ववर्ती कार्यों को आधार बनाकर साहित्य इतिहास को विस्तार दिया। इस तरह से वह भूत और वर्तमान के मध्य एक सेतु का कार्य किया है।डॉ.कमलेश राय ने कहा कि यह पुस्तक एक जूनून का परिणाम है. उन्होंने विवेकी राय के कार्य का अनुसरण कर आत्म परिष्कार और अनुसंधान का कार्य किया है। प्रो.विजय शंकर मिश्र ‘ज्योतिपुंज’ ने कहा कि जिस तरह से लेखक ने मुझे फ़ोन करके मेरा विवरण माँगा जबकि इसमें संकलित होने के लिए मुझे प्रयासरत होना चाहिए था, वह उनकी विराट सोच और ह्रदय का परिचायक है। डॉ रविनंदन सिंह ने कहा कि मौलिक रचनाएँ लिख लेना सरल है लेकिन इतिहास और इतिवृत्त लेखन बहुत साहस की मांग करता है. गंगेश जी का संग्रह इतिहास की कोटि में नहीं आता है।यह संकलन है, इतिवृत्त है लेकिन इतिहास नहीं है। ओम धीरज ने पुस्तक की प्रशंसा करते हुए कहा कि अनेक ऐसे कवि हैं जिनकी पुस्तकें अनुपलब्ध हैं, ऐसे कवि भी इस पुस्तक में आने के बाद अब विस्मृत नहीं होंगे।डॉ.रामबदन राय ने कहा कि इस संकलन से भीखा साहब और मंगरू कवि जैसे लोगों का परिचय मिलता है जो मुझे अन्यत्र नहीं मिला। डॉ. देवेन्द्र ने कहा कि मुझे यह पुस्तक पढ़कर पता चला कि मेरे प्रिय कवि आलोक धन्वा गाजीपुर के ही हैं। हिमांशु उपाध्याय ने पुस्तक की प्रशंसा करते हुए कहा कि यह अभूतपूर्व कृति है। इतना विस्तृत कार्य इससे पहले आज तक किसी ने नहीं किया था।प्रो.अवधेश प्रधान ने कहा कि साहित्य ने इस देश को संस्कार की पहचान दी है कि यह देश कैसे बोलता है. शब्द में अर्थ आचरण से आता है।एक विभाग था जिसे अंग्रेजों ने शुरू किया था और वह १९७८ तक चला आया, वह विभाग हर जनपद के विषय में सब कुछ लिखते थे, क्योंकि जिन पर शासन करना है उनके विषय में जानना चाहिए. इस परम्परा को गंगेश जी ने आगे बढाया है। हमारे कवियों ने इस देश का निर्माण किया है, जैसे तुलसी ने श्रीराम दिया और वेदव्यास ने श्रीकृष्ण को दिया।अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में भोलानाथ त्रिपाठी विह्वल’ ने कहा कि कृति का लोकार्पण कृतिकार की पुत्री के विवाह के समान होता है। गंगेश जी ने दुर्धर्षपूर्ण परिस्थितियों में इस कृति को चुना है जिसके लिए वह धन्यवाद के पात्र हैं।कार्यक्रम में प्रमुख रूप से मानव कृष्ण, रामबचन यादव, डाॅ.रविनन्दन वर्मा,डाॅ. संतोष सिंह, हीरा राम गुप्ता, डाॅ.व्यासमुनि राय,राजीव मिश्र,नागेश मिश्र, आनन्द प्रकाश अग्रवाल, डाॅ. श्रीकान्त पाण्डेय, मुक्तेश्वर श्रीवास्तव, सुहैल खाँ, गिरीश शर्मा, आशुतोष श्रीवास्तव, शिवम प्रकाश त्रिपाठी, डाॅ. युद्धिष्ठिर तिवारी,श्यामनगर, डाॅ.दिनेश सिंह, डाॅ.प्रतिभा सिंह, डाॅ.पारसनाथ सिंह, विपिन बिहारी राय, मृत्युंजय राय, अलका त्रिपाठी, संजीव श्रीवास्तव आदि प्रमुख रूप से उपस्थित थे। कार्यक्रम का संचालन साहित्य चेतना समाज के उपाध्यक्ष संजीव गुप्त एवं धन्यवाद ज्ञापन संस्थापक अमरनाथ तिवारी ‘अमर’ ने किया।



