गाजीपुर : नहीं ढूंढते आ गिरता है सिर पर, प्रेम की चोट आजीवन है रहती… पूजा राय

गाजीपुर। शहर के द प्रेसीडियम इंटरनेशनल स्कूल अष्टभुजी कॉलोनी के सभागार में आयोजित काव्य संगोष्ठी का शुभारंभ मां शारदा की प्रतिमा के समक्ष दीपार्चन और पुष्पार्चन से हुआ। कार्यक्रम की अध्यक्षता आचार्य श्रीकांत पांडेय ने किया। कवि गोष्ठी में गीतकार हरिशंकर पांडेय ने जीवन के यथार्थ का गीत “ज़िन्दगी बड़ी ये अनमोल सबकी/धन -दौलत यहां रही किसकी,/मरण के बाद भी रहे ये जीवन / आओ कुछ ऐसा जतन कर लें।” सुनाया तो युवा कवि मनोज यादव बेफिक्र ने कहा कि, “किसी को अपने सपनों से इश्क़ था /और किसी को अपनों से इश्क़ था।/ये ज़िन्दगी की अजीब दास्ताँ है दोस्तों,/किसी को किसी के इश्क़ से इश्क़ था।” सुनाकर महफ़िल को जवां कर दिया। आलोचक माधव कृष्ण ने युद्ध की विभीषिका पर पढ़ा, “युद्ध ने किया ही क्या खून पीने के सिवा/चीख भूख अकाल लाशें महामारी और क्या/पेड़ पौधे नदी सागर हवा सब अनुकूल थे/आदमी जब से हुआ सब कुछ प्रदूषित हो गया।” कवयित्री पूजा राय ने प्रेम पर नई कविता पढ़ते हुए सबको रोमांचित किया, “नहीं ढूंढते आ गिरता है सिर पर/प्रेम का पत्थर ज़ोर से लगता है /प्रेम की चोट आजीवन रहती है साथ/हम उसे साथ लिए घूमते हैं। युवा व्यंग्यकार डॉ राम अवध कुशवाहा ने चमचों पर कटाक्ष कर हंसाया, “पूरी कायनात को यही आसन पसंद है, साफ कहूँ तो उन्हें भी चमचासन पसंद है/चमचे तो चमचे हैं चमचों के चमचों को/भी यही आसन पसंद है” गजलकार गोपाल गौरव पांडेय ने “कहीं मस्जिद कहीं शिवाला है/फिर भी दिखता नहीं उजाला है/दोष साकी का नहीं गौरव/तेरे हाथ में उल्टा प्याला है।” सुनाकर वाहवाही बटोरी। व्यंग्यकार आशुतोष श्रीवास्तव ने आज के साहित्यिक आयोजनों के चारित्रिक पतन पर करारा व्यंग्य कसा तो शालिनी श्रीवास्तव ने पढ़ा, “कश्तियों को बोल दो, भूल जायें सावनों को/बोल दो कटी पतंग को, ढूँढ लें नयी राहों को, और रिम्पू सिंह ने पढ़ा, “भूख और जीवन का/सतत संघर्ष /दोनों में एक/झींना सा आवरण /जो अदृश्य है/नहीं दिखाई देता/खुली आँखों से।” संजय पाण्डेय ने भंडारा नामक पैरोडी गाकर लोगों को हंसाया तो वरिष्ठ कवि दिनेश चंद्र शर्मा ने वीर रस की कविता सुनाकर लोगों में राष्ट्रप्रेम जागृत किया। कवि प्रेम कुमार श्रीवास्तव ने बहुत संजीदा शेर पढ़े, “हमने झेले हैं दर्द इतने की दर्द हो गया हूं।/श्वास तक बिक चुकी और मैं कर्ज हो गया हूं।/सुनाऊं किसको गुजारा जो है जिंदगी में हमने,/तन ढांपने की फिराक में बेपर्द हो गया हूं।।” सुनाकर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। कार्यक्रम का संचालन माधव कृष्ण ने तथा धन्यवाद ज्ञापन दिनेश्वर दयाल ने किया।




