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देशलेख

संघ और राजनीत

नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे

कर्नाटक राज्य के विधान मंडल सदन का मानसून सत्र और सत्र के अंदर एक महत्वपूर्ण बिल पर चर्चा के दौरान कर्नाटक राज्य के उपमुख्यमंत्री व कर्नाटक जैसे महत्वपूर्ण राज्य में कांग्रेस पार्टी के नंबर दो स्तर की हैसियत रखने वाले नेता या यूं कहें कि राज्य के चुनाव के पूर्व जो भाजपा सरकार बनाने का सपना देख रही हो।उसके सपने को तोड़ते हुए कांग्रेस पार्टी को सत्ता प्राप्त कराने वाले डी के शिवकुमार आज जब संघ में की जाने वाली प्रार्थना “नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे” का वाचन कर रहे हैं। तो यह पूरे देश भर में कौतूहल व जिज्ञासा का विषय बना हुआ है। जिज्ञासा कई प्रकार का मीडिया हाउस इस बात की भी पुष्टि करना चाह रही है की क्या कर्नाटक में भी अमित शाह ऑपरेशन लोटस चलाने वाले हैं! लेकिन यहां इस बात का भी ध्यान रखना आवश्यक है की पूर्व में एक पत्रकार द्वारा पूछे जाने पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होशबाले जी ने स्पष्ट किया था कि संघ अलग है भाजपा अलग और सरकार भाजपा की है न कि संघ की उसमें कुछ स्वयंसेवक अपने हैं जो वैचारिक समानता के नाते वहां कार्य करते हैं।भाजपा शुद्ध रूप से एक राजनीतिक संगठन है।

हालांकि देश की मीडिया समय समय पा अपने क्षणिक मसाले के लिए संघ और भाजपा की मिक्स करने का प्रयास करती रहती है। लेकिन मीडिया बाजार पुनः गर्म हुआ है डी के शिवकुमार के उस ताजा तरीन बयान के कारण परन्तु मेरा ऐसा मानना है की मीडिया के दिखाए जा रहे न्यूज़ से इतर होकर इनसाइड स्टोरी अथवा पूरी जानकारी रखना आवश्यक है क्योंकि यह सामान्य सी दिखने वाली वीडियो असामान्य ख्याति बटोर रही है,और यह विषय है भी ऐसा कि डी के शिवकुमार जैसे बड़े कॉन्ग्रेसी नेता के मुख से “आर एस एस” की प्रार्थना अचंभित कर रही है। कांग्रेस के छोटे हो या बड़े नेता जब तक प्रत्यक्ष रूप से आरएसएस को खरी खोटी नहीं सुनाते भगवा आतंकवाद ,हिंदू आतंकवाद ,कट्टरवाद, मनुवाद , ब्राह्मणवाद जैसे विषयों को नहीं जोड़ देते तब तक स्वयं को कांग्रेस पार्टी में स्थापित नहीं कर सकते हैं, और ना ही गांधी नेहरू परिवार के प्रिय बन पाते हैं। लेकिन कहा गया है सत्य को दबाया जा सकता है लेकिन मिटाया नहीं जा सकता।यह सत्यता ही है जो समय-समय पर प्रातः के अरुण ज्योति के समान तेजोमय में स्थिति में खड़ी हो जाती है। जिसे किसी पर्दे से छुपाया नहीं जा सकता है। जी हां सत्यता यह की जब वर्ष 1971 से 73 के बीच में उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी। तत्कालिक माननीय मुख्यमंत्री कमलापति त्रिपाठी जी ने जब आरएसएस के ही अनुषांगिक संगठन विद्या भारती द्वारा संचालित सरस्वती विद्या मंदिर द्वारा सोनभद्र व मिर्जापुर के वनवासी बहुल सीमावर्ती क्षेत्र के विद्यालयों को अपने विधायक निधि का अंश देने का कार्य किया। वही विद्या भारती आज शिक्षा के क्षेत्र में कार्य करने वाला भारत का सबसे बड़ा गैर सरकारी संगठन है।

त्रिपाठी जी के विद्या भारती के प्रति उदारता से खिन्न होकर उस समय के कांग्रेस के एक बड़े धड़े ने दबी जुबान में ही उनका विरोध किया। जिसका उन्होंने यह कहकर उत्तर दिया की विद्यालय, कूप , नदी,तालाब, धर्मशाला, मंदिर यह किसी व्यक्ति या संगठन का नहीं समाज का होता है। संगठन तो बस इसके ईश्वरीय अनुमति द्वारा संचालन की व्यवस्था करते हैं।इसलिए हम सब का यह कर्तव्य बनता है कि हम उन्हें अपने संचित धन से कुछ अंश देकर और आगे बढ़ाएं हालांकि वास्तविकता यह है। कमलापति त्रिपाठी भी इस बात से भली-भांति परिचित थे कि विद्या भारती जो भारतीय आधार की शिक्षा वर्तमान में दे रही है यह किसी और संगठन के द्वारा दिया जाना संभव है। उन्हें भी मैकाले की शिक्षा नीति से घोर आपत्ति थी। ठीक उसी क्रम में आज कर्नाटक राज्य के कांग्रेस के उपमुख्यमंत्री जब वहां के सदन में खड़े होकर “नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे” गा रहे हैं उसका कारण यही है कि वह वहां के राज्य में विद्या भारती के कार्य से इस प्रकार से प्रभावित हैं कि वह मुक्त कंठ से उसकी तारीफ कर पाना नहीं भूल पा रहे हैं। और कहीं ना कहीं इन घटनाओं के गर्भ में अगर हम जाएंगे तो कांग्रेस का कोई भी बड़ा नेता हो आज वह संघ को चाहे जितना गाली दे दे लेकिन वह जानता है कि संघ जो करते आया है या जो कार्य आज कर रहा है वो किसी अन्य के बस की बात नहीं थी।

1925 से बना या संगठन आज 2025 में जब अपना 100 वर्ष पूर्ण करने जा रहा है ,इसके कार्य की तुलना किसी से नहीं की जा सकती लेकिन उनकी गांधी नेहरू परिवार के प्रति इस प्रकार की भक्ति या यूं कहे है कि अपनी निजी राजनीति स्वार्थ ही है। सार्वजनिक मंच से संघ की बुराई करने को विवश रहते हैं । हालांकि सच्चाई इसके ठीक विपरीत है। वरन् ऐसी घटना संघ के लिए नया नहीं है, कि 10- 20 वर्ष पर एक बार हो रहा हो नहीं बिल्कुल नहीं। निरंतर अंतराल पर लगातार देखने को मिलती है दक्षिण के ही एक और राज्य तेलंगाना में जहां राज्य के मुख्यमंत्री वर्तमान में है रेवंत कुमार रेड्डी जिनका इतिहास अगर देखे तो वह स्वयं कहते हैं कि अपने छात्र जीवन में वह अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ता रहे हैं। जिसके कारण अभी हाल ही में तेलंगाना के अंदर हुए किसी कार्यक्रम में जब मंच से वहां के एक कांग्रेसी कार्यकर्ता ने विद्यार्थी परिषद के बारे में कुछ भला बुरा कहा तब अपनी बारी आने पर वहां के माननीय मुख्यमंत्री रेवंत कुमार रेड्डी ने स्वयं आपत्ति दर्ज कराया कि, मैं अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का कार्यकर्ता रहा हूं और यहां जो बताया जा रहा है परिषद के बारे में वह बिल्कुल ही निराधार है। आप पहले विद्यार्थी परिषद में जाइए और उनके कार्य को समझिए आज मैं जिस स्वाभिमान से इस राज्य का नेतृत्व कर रहा हूं।

इस नेतृत्व का गुण मुझे उसी(अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् )संगठन ने सिखाया है। गौर करने की बात है यहां अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद जो की 1948 में गांधी हत्या के आरोप में जब संघ पर प्रतिबंध लगाया गया था और प्रतिबंध के समाप्ति उपरांत संघ ने समाज व्यापी होने के उद्देश्य से अपना जो प्रथम संगठन बनाया वह था अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद जिसका पंजीकरण 1949 में पूर्ण हुआ आज इस संगठन के भी 75 वर्ष से अधिक हो गए हैं। और युवा कार्य के क्षेत्र में आज अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद भारत का सबसे बड़ा गैर सरकारी विद्यार्थी संगठन है। उसके बाद तो मानो संघ के गर्भ से जनसंगठनों की लंबी श्रृंखला सी ही खड़ी ही गई। लेकिन आज बात उठी है डीके शिवकुमार के उस एक बयान से तो डीके शिवकुमार ने भी अगर गौर किया जाए तो लगभग कमलापति त्रिपाठी की तरह ही मिलता-जुलता जवाब दिया है। उन्होंने बहुत स्पष्ट कहा है कि विद्या भारती कर्नाटक राज्य में शिक्षा के क्षेत्र में बहुत ही उच्च स्तर का कार्य कर रही है। यहां गौर करने वाली बात यह भी है ,कि वह जिस पार्टी से उनका नाता है उस पार्टी के बड़े नेता जिन्हें उस पार्टी में युवा नेता की संज्ञा दी गई है। उनका एक कार्यक्रम बिहार में आयोजित था कार्यक्रम का स्वरूप रैली के प्रकार का था। प्राप्त जानकारी के अनुसार जब उनकी रैली बिहार में भ्रमण कर रही थी तो उनके पार्टी की एक बैठक वहां के स्थानीय कांग्रेसी कार्यकर्ताओं ने एक स्कूल में रखा था।

जब उन्हें यह बताया गया यह स्कूल विद्या भारती द्वारा संचालित होता है उन्होंने वहां के स्थानीय जिम्मेदार कार्यकर्ता को फटकार भी लगाया और उस स्थान पर बैठक कैंसिल भी किया गया। लेकिन बात यह है कि क्या केवल बैठक न रखने से या स्थानीय कार्यकर्ता को फटकार देने से सत्य को छुपाया जा सकता है। तो नहीं क्योंकि उन्हीं की पार्टी के एक राज्य के बड़े नेता ने सप्ताह दिन के भीतरी ही पुनः उन्हें आईना दिखाने का कार्य किया है। आज जब संघ समय समय पर अपने ऊपर लगाएं प्रतिबंधों व अपने कार्यकर्ताओं पर तमाम यातनाओं व अनर्गल आरोपों को झेलते हुए भी अपने व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण की प्रतिबद्धता पर अडिग रहते हुए जब 100 वर्ष पूर्ण कर पंच परिवर्तन और पंचमुखी विकास योजना को धरातल पर उतारते हुए शताब्दी वर्ष मनाने की योजना में व्यस्त है। तब ऐसी घटनाओं का होना इस बात को दर्शाता है कि संघ अब उस स्थिति में आकर खड़ा हो गया है, कि अब कई विषयों पर संघ का कार्यकर्ता ही नहीं अब संघ के धुर विरोधी भी संघ के अनुकूल स्वतः बातें करने लगे हैं। क्योंकि संघ की प्रार्थना का वह पहला श्लोक “नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे
त्वया हिन्दुभूमे सुखवं वर्धितोऽहम्।
महामङ्गले पुण्यभूमे त्वदर्थे
पतत्वेष कायो नमस्ते नमस्ते॥
जिसका अर्थ ही है, है वात्सला मातृभूमि, मैं तुझे निरंतर प्रणाम करता हूं। हे हिंदू भूमि तूने ही मुझे सुख पूर्वक बढ़ाया है। हे महामंगलमयी पुण्यभूमि। तेरे लिए ही मेरी यह काया (शरीर ) अर्पित हो। तुझे मैं बारंबार प्रणाम करता हूं।। तभी तो कॉन्ग्रेस पार्टी के प्रेस वार्ता के दौरान उसके राष्ट्रीय प्रवक्ता जब अपनी बात का प्रारंभ करते हैं तो भूल वश ही सही लेकिन संघ के शाखा में गाई जाने वाली उस गणगीत के एक चरण को दोहराते हैं,कि
तन समर्पित मन समर्पित और यह जीवन समर्पित,
चाहता हूं हे मातृभूमि तुझको अभी कुछ और भी दूं।
सही मायनों में देखा जाए तो यह पूरे विश्व की एकमात्र प्रार्थना है।

जिसमें प्रथम श्लोक उस भूमि के लिए समर्पित है, जहां व निवास करता है।ऐसी प्रार्थना आज पूरे भारत भर में लगभग 80000 से अधिक जगहों पर एक साथ एक समय पर गाई जाती है। यही संघ की एक अनूठी और अलग व्यवस्था है जिसके कारण आज संघ अपना 100 वर्ष पूर्ण कर रहा है और उसके स्वयंसेवक उत्साह और उमंग से इस पर्व की तैयारी में जुटे हुए हैं। उसके इतर “आर एस एस” से शत्रुता पूर्ण व्यवहार रखने वाले दल व संगठन जो समय-समय पर संघ को दबाकर , कुचल कर उन्हें नष्ट करने की चेष्टा करते थे । आज उनके भी बड़े नेता जो नंबर दो या यूं कहें कि नंबर एक की हैसियत रखते हैं वह भी संघ की उपलब्धि या संघ के उस राष्ट्रवादी भाव को मुक्त कंठ से ना सही लेकिन उनके अनुसांगिक संगठनों की प्रोत्साहना करने से अपने को रोक नहीं पा रहे हैं। तो अब कहां जा सकता है कि इस शताब्दी वर्ष में संघ की यह उपलब्धि होने जा रही है कि प्रत्यक्ष रूप से ना सही लेकिन संघ के गर्भ से निकले जन संगठनों के कार्यों से प्रभावित होकर संघ के वे विरोधी जो संघ को नष्ट करना चाहते थे वह भी व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण के उस प्रयास को साधुवाद कर रहे होंगे।

लेखक- अभिषेक शौंडिक
सह नगर कार्यवाह
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ गाजीपुर

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