
गाजीपुर। पी० जी० कालेज में पूर्व शोध प्रबंध प्रस्तुत संगोष्ठी का आयोजन अनुसंधान एवं विकास प्रकोष्ठ तथा विभागीय शोध समिति के तत्वावधान मे सेमिनार हाल में किया गया । जिसमें महाविद्यालय के प्राध्यापक शोधार्थी व छात्र/ छात्राएं उपस्थित रहे। इस संगोष्ठी मे संगीत विषय की शोधार्थिनी रुचिका अग्रहरि ने अपने शोध प्रबन्ध शीर्षक राजस्थान के पारंपरिक लोक वाद्य एवं लोकजीवन का अंत: संबंध” नामक विषय पर शोध प्रबन्ध व उसकी विषय वस्तु प्रस्तुत करते हुए कहा कि राजस्थान का लोक जीवन विविधता और सांस्कृतिक समृद्धि से परिपूर्ण है। इस रंग-बिरंगी संस्कृति में लोक संगीत और लोक वाद्य यंत्रों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। ये वाद्य केवल ध्वनि उत्पन्न करने वाले उपकरण नहीं, बल्कि राजस्थान के जनजीवन की आत्मा हैं, जो समाज की भावनाओं, परंपराओं, आस्थाओं और संघर्षों को अभिव्यक्ति देते हैं। लोक वाद्य जैसे रावणहत्था, मंजीरा, खड़ताल, और शंख धार्मिक अनुष्ठानों, कीर्तन, भजन, और मेलों में प्रमुख भूमिका निभाते हैं। इन वाद्यों की ध्वनि से वातावरण में आध्यात्मिकता का संचार होता है। सामूहिक भक्ति भावना प्रकट होती है। राजस्थान के हर उत्सव चाहे वह गणगौर, तेजाजी मेला, डोलची, होली या लोक देवताओं की पूजा हो लोक वाद्यों के बिना अधूरे हैं। ढोलक, नगाड़ा, मोरचंग, कमायचा जैसे वाद्य इन आयोजनों में लय और ऊर्जा भरते हैं। राजस्थानी लोक गीतों में प्रेम, विरह, युद्ध, शौर्य और प्रकृति के भावों को व्यक्त किया जाता है। इन भावों को अभिव्यक्त करने में लोक वाद्य जैसे कमायचा, रावणहत्था, और एकतारा महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। गांवों में जब कलाकार लोक वाद्य लेकर गीत प्रस्तुत करते हैं, तो लोग जाति, वर्ग और समुदाय की सीमाएं तोड़कर एकत्र होते हैं। यह सामूहिकता सामाजिक एकता को प्रोत्साहित करती है। कई लोक कलाकार और कारीगर इन वाद्यों के निर्माण और प्रस्तुति से अपनी जीविका चलाते हैं। इतना ही नही मांगणियार, लंगा, भील जैसी जातियां पारंपरिक रूप से इन वाद्यों से जुड़ी रही हैं। इन लोक वाद्य यंत्रों के माध्यम से पीढ़ी-दर-पीढ़ी राजस्थान की लोककथाएं, इतिहास, देवताओं की गाथाएं और सामाजिक मूल्य संप्रेषित होते हैं। ये वाद्य हमारी धरोहर को जीवित रखते हैं। प्रस्तुतिकरण के बाद विभागीय शोध समिति, अनुसंधान एवं विकास प्रकोष्ठ व प्राध्यापकों तथा शोध छात्रों द्वारा शोध पर विभिन्न प्रकार के प्रश्न पूछे गए जिनका शोधार्थिनी रुचिका अग्रहरि ने संतुष्टिपूर्ण एवं उचित उत्तर दिया। तत्पश्चात समिति एवं महाविद्यालय के प्राचार्य प्रोफे० (डॉ०) राघवेन्द्र कुमार पाण्डेय ने शोध प्रबंध को विश्वविद्यालय में जमा करने की संस्तुति प्रदान किया।




