लेख- समकालीन भोजपुरी कविता

लोकभाषा भोजपुरी में लोकगीतों तथा पर्व-त्यौहार और संस्कार गीतों के अलावे शिष्ट काव्य साहित्य की भी समृद्ध परम्परा रही है। गुरु गोरखनाथ ,कबीर, धरमदास, पलटू साहेब, लछिमी सखी और टेकमन राम आदि की निर्गुण भाव-धारा की रचनाओं के अलावे भोजपुरी में हिन्दी कविता के समानान्तर आधुनिक भाव-बोध की कविताएँ भी रची गयी हैं। अधिकतर भोजपुरी कवि हिन्दी कविता की परम्परा और प्रगति से न केवल परिचित रहे हैं बल्कि यथावसर हिन्दी कविता की दुनियाँ में भी उन्होंने भी हाथ-आजमाइश की है।परन्तु, यहाँ यह बात रेखांकित करने योग्य है कि बावजूद इन सबके, आधुनिक भोजपुरी कविता का काल-खंडवार प्रवृतिगत अध्ययन करना एक अत्यंत असुविधाजनक और अतार्किक प्रयास होगा।आधुनिक भोजपुरी कविता हिन्दी कविता के प्रभाव में लिखी जाकर भी इस अर्थ में उससे भिन्न रही है कि यहाँ हिन्दी कविता की भाँति विभिन्न ‘वादों’ का दौर नहीं रहा है । भोजपुरी कविता में छायावाद, रहस्यवाद,प्रगतिवाद, प्रयोगवाद, नई कविता या समकालीन कविता आदि सबका प्रवृत्तिगत प्रभाव देखने को मिलता है अवश्य, मगर ‘वादों’ का प्रमाद यहाँ ढूँढ़ पाना कठिन होगा। भोजपुरी एक लोकभाषा है। लोकभाषा की कविताओं में गेयता ,लय या तुक का होना उसकी श्रव्यता या पठनीयता को बढ़ाता है।आज भी भोजपुरी में जितने गीत,नवगीत, गजलें,दोहे ,सवैया या अन्य छंदबद्ध रचनाएँ उपलब्ध हैं , तुलनात्मक रूप से छंदमुक्त रचनाएँ एक सीमा तक ही सामने आ पाती हैं।आधुनिक भाव-बोध से जुड़ी कविताएँ यद्यपि साठ के दशक के बाद से ही भोजपुरी में भी शुरु हो गई थीं, मगर उनका वास्तविक विकास हमें सन 1970 के बाद तब देखने को मिलता है, जब प्रयोगवाद, नयी कविता आदि के समेकित प्रभाव ग्रहण किए लगातार कई संग्रह भोजपुरी में प्रकाशित हुए।
चारो ओर अम्हरिया'(1971,डाॅ.स्वर्णकिरण),’लेके ई लुकार हाथन में'(1975, डाॅ.स्वर्णकिरण),’ई हरनाकुस मन'(1975,पांडेय सुरेन्द्र),’जोत कुहासा के'(1976,प्रो.ब्रजकिशोर), ‘बात-बहुबात’ (1978,शिवशंकर मिश्र),’बाकिर ‘(1978,शारदानंद प्रसाद),’सँझवत ‘ (1981,डाॅ.स्वर्णकिरण), ‘एगो मेहरारु'(1981,महेन्द्र गोस्वामी),’ टटात परछाईं ‘(1982,विश्वरंजन),’कुछ खास किसिम के आवाज ‘ (1983,शशिभूषण लाल),’ आगे-आगे'(1988,संपादक-रिपुसूदन प्रसाद श्रीवास्तव), ‘क्ष त्र ज्ञ'(1992, परमेश्वर दूबे शाहाबादी) ,’औरत जात'(2008,मलयार्जुन), ‘मोथा अउर माटी’,’फुन्सियात सहर’, ‘अखबारी कविता’ (2012, रवीन्द्र श्रीवास्तव ‘जुगानी’) , ‘खरकत जमीन बजरत आसमान ‘(2015 ,ब्रजभूषण मिश्र),’माटी क बरतन'(2023,चंद्रदेव यादव) आदि कुछ ऐसे कविता संग्रह हैं जिनके माध्यम से वर्तमान समय और समाज के ज्वलंत मुद्दों के साथ- साथ व्यक्ति की पीड़ा ,घुटन,संत्रास और उसके संघर्षों को भी अभिव्यक्ति मिली।इन संग्रहों के अधिकतर कवियों ने यह स्वीकार भी किया है कि हिन्दी की समकालीन कविता की प्रवृत्तियों के अनुरूप ही उन्होंने जीवन ,समय और समाज को तर्क और संवेदना की सम्मिलित भाव-भूमि पर आकलित किया है। यहाँ भोजपुरी जन-जीवन के स्पन्दनों और उल्लास के साथ- साथ, उसकी मुश्किलों और मुसीबतों से भी एक मुठभेड़ देखने को मिलती है। बात-बहुबात ‘ में शिवशंकर मिश्र लिखते हैं कि “बात ऊ दोसर ह/ई बात ना ह/बात जे देस के,समाज के/बात जे आपन ह,आज के/देस के तरक्की के/उन्नति- उत्थान के/बात जे जिनिगी का भीतर के/दुनिया का बीच के/बात समाधान के/नमहर के,नीच के/दुखी के,गरीब के/बात जे सबका समस्या के/जथारथ-परतीत के/बात एगो उहे ह/बात उहे साँच ह।”इन पंक्तियों से यह स्पष्ट है कि भोजपुरी कवि यथार्थ बातों की प्रतीति और देश -समाज-व्यक्ति की समस्याओं को ही अपनी कविता का प्रतिपाद्य मानता है।
‘ई हरनाकुस मन’ में पांडेय सुरेन्द्र व्यक्ति- मन के संताप और संत्रास को वाणी देने के क्रम में नये देशज बिम्बों का सहारा लेते हैं-“अपना चूर-चूर भइला के /हो रहल बा अपने एहसास/केरा के पतई अस /चित्ती-चित्ती फाट के /फड़फड़ा रहल /भीतर फेफड़ा में /जमकल जा रहल बा/अइसन तहलका /जेसे/बिसवास के हवा में साँस ना खिंचा सके।”(काल्ह)। प्रो.ब्रजकिशोर अपने दो कविता संग्रहों-‘जोत कुहासा के’ और ‘बूँद भर सावन’ में मानवीय मनोभावों का सूक्ष्म विश्लेषण करने के साथ-साथ कहीं-कहीं दार्शनिक मनोभूमि पर भी उतरते दिखते हैं जबकि शारदानंद प्रसाद अपने तीनों कविता संग्रह- ‘पुरइन’ , ‘बाकिर ‘ और ‘ का कहीं’ में भोजपुरी समकालीन कविता को एक ऐसी ऊँचाई पर ले जाकर पहुँचा देते हैं जहाँ वह किसी भी भाषा की समकालीन कविताओं से किसी भी दृष्टि से कमतर नहीं रह जाती।एक उदाहरण देखने लायक है-” लीप पोत के हर कोना /अँगना के ओरी तर /ढरक गइल पोतनहार/भुक-भुक जोन्ही लउके लागल /छान्ही के छेद से /अँखिया में /अभागा बिछलहर रतिया के /का कहीं जे जागले रहल भोर ले /अब गुदरी में तोप के सभकर नजर बचावत/हमरा से/सितुही में मोती ना पोसा सकी!”(बाकिर) भोजपुरी समकालीन कविता को मजबूती प्रदान करने में शशिभूषण लाल के कविता -संग्रह ‘कुछ खास किसिम के आवाज ‘ की भूमिका भी काफी महत्वपूर्ण रही है।
इस संग्रह में ‘झलफलाह’ शीर्षक 227 पंक्तियों की एक लम्बी कविता है तो ‘फूल तलमखान के’ शीर्षक से 8 शब्दों की 6 पंक्तियों वाली भी एक मुकम्मल कविता है-“मुसकाइल /फूल/तलमखान के/फेरो /आज/सुबह/ भइल।”भोजपुरी समकालीन कविता के महत्वपूर्ण कवियों में जितराम पाठक, तैयब हुसैन ‘पीड़ित’, रिपुसूदन श्रीवास्तव, अशोक द्विवेदी , ब्रजभूषण मिश्र,भगवती प्रसाद द्विवेदी,मलयार्जुन, चंद्रदेव यादव,विश्वरंजन,रवीन्द्र प्रसाद श्रीवास्तव ‘जुगानी भाई’,मोती बी.ए ,हरिकिशोर पांडेय,आनंद संधिदूत, पी.चंद्रविनोद, बलभद्र ,प्रकाश उदय,सुरेश कांटक, जितेन्द्र कुमार, सदानंद शाही,चंद्रेश्वर, लक्ष्मीकांत ‘मुकुल’आदि के नाम चर्चित रहे हैं।भोजपुरी समकालीन कविता को निलय उपाध्याय, प्रमोद कुमार तिवारी,हरेप्रकाश उपाध्याय, संतोष पटेल, अरुण शीतांश,विमलेश त्रिपाठी,जितेन्द्र श्रीवास्तव,,सुनील कुमार पाठक,विष्णुदेव तिवारी,संध्या सिन्हा,सुमन सिंह, कनक किशोर, जे.पी.द्विवेदी ,अंचित,गुलरेज शहजाद,केशव मोहन पांडेय आदि के जरिए भी खूब धार मिल रही है।संतोष पटेल के कविता संग्रह ‘अदहन ‘ और ‘अनबोलता’ भी समकालीन भोजपुरी कविता में काफी चर्चित रहे हैं।समकालीन दौर में हिन्दी की भाँति भोजपुरी में भी नवगीत, गजलें और अन्य विभिन्न छंदों में भी कविताएँ आज खूब लिखी जा रही हैं।इस दौर में विभिन्न पीढ़ियों के कवि एक साथ सक्रिय हैं।गजलों की दुनियाँ में सौरभ पांडेय, आसिफ रोहतासवी, जौहर शाफियावादी ,मनोज भावुक, सुनील कुमार तंग,मिथिलेश गहमरी,नुरैन अंसारी आदि दर्जन भर नाम विशेष रूप से चर्चित हैं जबकि गंगा प्रसाद अरुण, कुमार विरल,रिपुंजय निशांत, कमलेश राय, भालचंद्र त्रिपाठी ,अक्षय पांडेय, सुशांत शर्मा प्रभृति अनेक नाम भोजपुरी नवगीत विधा को समग्र रूप से आज विकसित कर रहे हैं।’नेवान’ (सुनील कुमार पाठक)से शुरु हुई भोजपुरी हाइकु कविता की परम्परा में भी आज दर्जन भर से अधिक हाइकु संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं।
कुल मिला-जुलाकर देखा जाए तो भोजपुरी की समकालीन कविता का विकास एक स्वस्थ दृष्टि और दिशा-बोध के साथ हो रहा है।भोजपुरी समकालीन कविता की सर्वाधिक महत्वपूर्ण विशेषताओं के तौर पर कुछ बातें रेखांकित की जा सकती हैं।पहली यह कि इनमें किसी प्रकार का कोई बड़बोलापन (ओवर-टोनिंग)नहीं है।यहाँ प्रयोगधर्मिता के नाम पर अर्थहीनता का विस्तार और अमूर्तन के नाम पर अबूझ पहेली जैसी बात नहीं है।हिन्दी की तरह भोजपुरी समकालीन कविता एकतरहीपन का शिकार न होकर पर्याप्त विषय-वैविध्य से परिपूर्ण है।भोजपुरी समकालीन कविता में अपने पाठकों से सीधा संवाद बना लेने की भरपूर क्षमता है ।कारण कि आज भी भोजपुरी में मंच की कविता और किताबों तथा पत्र-पत्रिकाओं की कविता में कोई खास दूरी नहीं है।आज भोजपुरी कविता की एक विशेषता यह भी है कि ‘ समकालीनता ‘ का बोध भोजपुरी की छंदमुक्त और छांदस-दोंनो तरह की कविताओं में देखने को मिलता है। यहाँ यह भी ध्यातव्य है कि आनंद संधिदूत,गोरख मस्ताना,सुशांत शर्मा,गुलरेज शहजाद आदि ने आज के दौर में भी समकालीन वैचारिक प्रखरता से भरपूर ‘अग्निसंभव'(आनंद संधिदूत), ‘एकलव्य ‘ (गोरख प्रसाद ‘मस्ताना’), ‘जटायु’ (सुशांत शर्मा)जैसी प्रबंधात्मक काव्य-कृतियों का भी प्रणयन किया है।
समकालीन भोजपुरी कविता सिर्फ अंचल विशेष और गाँव की कविता नहीं है ।आज नागर-बोध से भी यह सम्बलित है।प्राकृतिक सुषमा के साथ-साथ भौतिक और औद्योगिक विकास की खूबियाँ और खामियाँ -दोंनो यहाँ मुखरित हैं।सामाजिक-राजनीतिक जन-पक्षधरता और प्रतिबद्घता तथा जन-विरोधी सत्ता के तिलिस्म और वंचक चरित्र के विरुद्ध प्रतिरोध की संस्कृति को सशक्त करने का काम भी समकालीन भोजपुरी कविता ने बखूबी किया है। आज हिन्दी कविता लोक जीवन और लोक संस्कृति के जिस रास्ते पाठकों में अपनी वापसी करती दिख रही है ,दरअसल वह लोक जीवन, उसके सुवास,संस्कार आदि तो भोजपुरी कविता के अपने ‘खोंइछा ‘ के मंगलाचार और अनुपम संचय रहे हैं। कथ्य और शिल्प के स्तर पर भी भोजपुरी समकालीन कविता का विस्तार और वैविध्य बेहद रोचक और रमणीय रहाहै।
सोच और संवेदना की दृष्टि से भी यह उत्कर्षपूर्ण है।विचार ,चिंतन,भावोत्कर्ष, सौन्दर्य-बोध आदि सभी दृष्टियों से यह सशक्त और निपुण है।साथ ही ,आज के प्रचलित तमाम विमर्शों , यथा-नारी विमर्श, दलित विमर्श, आदिवासी चिंतन, कृषक चिंतन, वृद्धविमर्श आदि को भी अपने काव्य-संसार में बसाये हुए यह कविता काव्य-विवेक और अभिव्यक्ति के स्तर पर भी बहुवर्णी और बहुआयामी है।रुचिर सहज संवेद्य बिम्बों ,प्रतीकों और मिथकीय प्रयोगों से परिपूर्ण भोजपुरी समकालीन कविता अपनी रुचि और रचाव दोंनो रूपों में इतनी सशक्त ठाठ-बाट वाली कविता है कि किसी भी भारतीय भाषा की समृद्ध कविताओं के साथ अग्रपांक्तेय हो सकती है।भोजपुरी कवि सिपाही सिंह ‘ श्रीमंत ‘ की एक कविता की ये पंक्तियाँ तो जैसे आज की भोजपुरी कविता का आत्मकथ्य ही लगती हैं-
“गुमसुम-गुमसुम तनिको ना भावे हमें/आँधी हईं आँधी अंधाधुंध हम मचाइले/नाश लेके आ इले कि नया निरमान होखे /नया भीत उठेला पुरान भीत ढाहीले।”

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