Slide 1
Slide 1
गाजीपुर

 गाजीपुर : क्या है ! भूमिहार ब्राह्मणों का इतिहास…

राजीव सिंह/गाजीपुर । भूमिहारों के प्रथम राजा प्रचेता थे। जो सुभाषनगर राज्य के राजा थे। इनकी दो पत्नी थीं। प्रथम वीरणी दूसरी उर्वसी। वीरणी के पुत्र ऋषि भृगु और उर्वशी के पुत्र ऋषि वशिष्ठ थे। इस प्रकार राजा प्रचेता के दो पुत्र ऋषि भृगु और ऋषि वशिष्ठ थे। ऋषि भृगु के पुत्र ऋचिक थे। जिनकी पत्नी का नाम सत्यवती था। ऋषि भृगु के पोते एवं ऋचिक के पुत्र जमदग्नि थे। जिनकी पत्नी का नाम रेणुका था। जमदग्नि ब्राह्मण एवं उनकी पत्नि रेणुका ( राजा प्रसेनजीत की पुत्री) क्षत्रिय कुल से थीं। जमदग्नि के पांच पुत्र थे । जिनमें पांचवें पुत्र भगवान परशुराम थे। जिन्हें भगवान विष्णु का छठवां अवतार माना जाता है। क्षत्रिय वंश हैहय वंश के राजाओं ने भगवान परशुराम के पिता जमदग्नि की हत्या कर दी। जिससे परशुराम की मां रेणुका सती हो गई । इस घटना से क्रुद्ध होकर क्षत्रियों पर 21 बार आक्रमण किया। जिससे हैहय वंश लगभग का नाश हो गया था । अंत में हैहय वंश के बचे पांच पुत्रों ने परशुराम  से माफी मांगी और परशुराम ने क्षमा कर दिया। जिसके परिणाम स्वरूप क्षत्रिय वंश आगे बढ़ा। भगवान परशुराम  क्षत्रियों से युद्ध में जीती भूमि को अश्वमेध यज्ञ करने के बाद ऋषि कश्यप को दान कर दिया। भगवान परशुराम के ऋषि कश्यप को भूमि उपहार में देने के कारण ये जाति भूमिहार कहलाया । जिन ब्राह्मणों ने भूमि दान में ली थी । उन ब्राह्मणों ने दान दक्षिणा लेना छोड़ दिया। यही अयाचक ब्राह्मण भूमिहार कहलाए। 1857 में अंग्रेजों के विरुद्ध सर्वप्रथम बगावत भूमिहार राजाओं ने की थी। ये सैनिक ब्राह्मण माने जाते थे । भूमिहारों ब्राह्मणों को कान्यकुब्ज ब्राह्मणों की ही संतान माना जाता है। इसीलिए भूमिहारों को भूमिहार ब्राह्मण कहा जाता है। हम और ब्राह्मण एक ही है। भारत में इनका मूल स्थान मदारपुर ( कानपुर) है।  जिन ब्राह्मणों को भूमि दान में देकर शासक बनाया, वही शासक भूमिहार शासक रहे । भूमिहार भूमि के स्वामी होने के कारण जमींदारी का कार्य करने लगे थे। जिससे भूमिहार ब्राह्मणों ने अपने पारंपरिक ब्राह्मण कार्य पूजा पाठ और दान दक्षिणा लेना छोड़ दिया  और अयाचक वृत्ति अपना ली थी। अतः भूमिहारों का उदय पूजा पाठ और दान दक्षिणा लेने वाले ब्राह्मणों के रूप में न होकर एक शासक वर्ग और जमींदारी वर्ग के रूप में हुआ। आचार्य चाणक्य भूमिहार थे। भूमिहार जाति के जनक भगवान परशुराम को ही माना जाता है। भूमिहार जाति जन्म से ब्राह्मण और कर्म से क्षत्रिय है। भूमिहार जाति को अनेक उपमाओं से पुकारा जाता है। जैसे: भूमि को उपहार में देने वाले। भूमि से आहार अर्जित करने वाले। भूमि को जीतने वाले। सामान्यतः कहा जाता है कि भूमिहार किसी जाति, सम्प्रदाय विशेष का नाम नहीं है। वरन एक गुण और आचरण है।  भूमिहार संरक्षक, अयाचक, धर्मरक्षक, विद्वान, जीवरक्षक, श्रेष्ठ शासक, दूसरों के लिए जीने वाले, शौर्य और पराक्रम के लिए जानी जाती है । जिन लोगों में यह गुण हैं, वह भूमिहार हैं, क्योंकि भूमिहार एक जाति नहीं वरन् एक गुणवत्ता, एक आचरण, एक गुण, एक जीवन शैली है।

 

 

 

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button