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राजनीति

फिल्मों में खास किस्म के मुद्दों को उठाना और पॉलिटिक्स करना ठीक नहीं

वर्तमान में आर्ट और अदब को किनारे किया गया, हम दुनिया की सबसे बड़ी डेमोक्रेसी तो चुनाव में भी ईमानदारी और शुचिता दिखनी चाहिए असगर वहाजत बोले, अगर प्लास्टिक के नोटों से गांधी जी का चित्र हटाया भी तो कोई असर नहीं होगा, दुनिया स्टेट्समैन मानती है, हिंदू-मुस्लिम एकता और भाईचारे पर दिया जोर, फतेहपुर वालों को भी मिलजुलकर रहने का दिया संदेश

असगर वजाहत देश और विदेश में पहचान के मोहताज नहीं हैं। वह हिंदी साहित्य के साठोत्तरी नाटककार और वृत्तचित्र फिल्म निर्माता हैं। सामाजिक और राजनीतिक विसंगतियों पर गहरा व्यंग्य करने वाले वजाहत साहब ने अपनी रचनाओं के माध्यम से रूढ़िवादी विचारधाराओं को तोड़ने का महत्वपूर्ण कार्य किया है।

जीवन परिचय

उनका जन्म 5 जुलाई 1946 को उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले में हुआ था। उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्विद्यालय (एएमयू) से हिंदी में एमए और पीएचडी की डिग्री प्राप्त की। इसके बाद जेएनयू से पोस्ट डाक्टोरल रिसर्च पूरा किया। वह जामिया मिलिया इस्लामिया के हिंदी विभाग के विभागाध्यक्ष और प्रोफेसर रहे। इसके अलावा हंगरी में भी पांच सालों तक अध्यापन कार्य किया। उन्होंने जिस लाहौर नई देख्या, ओ जम्याई नई, विभाजन की त्रास्दी पर लिखा प्रसिद्ध नाटक, गोडसे @गांधी.काम, वीरगति और फिरंगी लौट आए, उपन्यासः सात आसमान, कैसी आगी लगाई, बरखा रचाई और रात में जागने वाले,  कहानी संग्रहः मैं हिंदू हूं, दिल्ली पहुंचना है, स्वीमिंग पूल, शेर की पहचान, चार हाथ और साझा के अलावा यात्रा संस्मरण चलते तो अच्छा था और पाकिस्तान का मतलब क्या? आदि लिखी। असगर वजाहत साहब का नाता फिल्म इंडस्ट्री से भी रही। उन्होंने गांधी गोडसे एक युद्ध की पटकथा लिखी है। अभी उन्होंने प्रसिद्ध कहानीकार ख्वाजा अहमद अब्बास की उर्दू में लिखी कहानी का हिंदी अनुवाद कर “पिंडी दे गुरुचरण” फिल्म की पटकथा लिखी है। यह फिल्म जल्द ही रिलीज होने वाली है। उनको व्यास सम्मान, शलाका सम्मान. संगीत नाटक अकादेमी सम्मान और कथा क्रम सम्मान से भी विभूषित किया जा चुका है।

महान साहित्यकार व कहानीकार से कई अहम सवालों पर एडिटर आसिफ हुसैन की बात हुई। उन्होंने सभी सवालों के बेबाकी से जवाब दिए। वर्तमान दौर में हिंदू-मुस्लिम में टकराव पैदा करने की राजनीति से खिन्न भी दिखे और एकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि देश गांधी जी के विचारों से ही आगे बढ़ेगा।

क्या आपको लगता है कि वर्तमान दौर में हिंदी या उर्दू साहित्य की कोई प्रासंगिता बची है?

साहित्य से सभी लोग फायदा उठाते हैं। साहित्य लोगों को संवेदनशील बनाता है। उत्तर भारत में पचास साल पहले जो साहित्य की भूमिका थी वह कम हो गई है। यह चिंता का कारण है। इस पर ध्यान देना चाहिए। नए मोड़ आ रहे हैं। इसमें आर्ट और अदब को किनारे कर दिया गया है। साइंस और टेक्नोलाजी को आगे किया जा रहा है।

प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद के बाद आधुनिक दौर में राही मासूम रजा, प्रो. केपी सिंह आदि रहे। अब प्रो. नमिता सिंह और आप बचे हैं। क्या आपको लगता है कि अब कहानियों का दौर समाप्त हो गया है?

जो नाम लिए हैं, ये काफी कम हैं। हजारों लोग हैं जिन्होंने कहानियां लिखी हैं। अभी भी अच्छी कहानियां लिख रहे हैं। सोशल मीडिया के दौर उसके माध्यम से कहानियां सामने आ रही हैं। कहानी का दौर खत्म नहीं होगा। हंस के अलावा अन्य रिसाले निकल रहे हैं लेकिन प्रसार कम हो गया है। अब कहानी का असर लोगों पर कम हो रहा है।

आपने फतेहपुर जैसे छोटे शहर से अपना सफर शुरू किया। आपने छोटा सा चुनाव (सभासदी) भी लड़ा। अबके चुनाव में और पहले के चुनाव में कितना अंतर आ गया है ?

 पहले बेईमानी के इक्का दुक्का मामले सामने आते थे लेकिन अब आम हो गया है। हिंदू-मुस्लिम विभाजन भी नहीं होता था। हम अपने को सबसे बड़ा लोकतंत्र देश कहते हैं तो दुनिया में सबसे ज्यादा ईमानदारी व शुचिता भी चुनाव में होनी चाहिए हम यह भी कह सके कि दुनिया का सबसे फेयर चुनाव हमारे यहां होता है लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है।  संसद और संविधान बनाने वालों को बैठकर कोई कानून बनाकर इसे दुरुस्त करना चाहिए।

जिस तरह मीडिया के एक वर्ग ने खान सर जैसे कई टीचरों को निशाना बनाया। क्या यह आपकी नजर में ठीक है या फिर इसके लिए मीडिया घराने जिम्मेदार हैं?

निशाना किसी को नहीं बनाना चाहिए। खास तौर पर जो शिक्षा दे रहा है। हमारा समाज बहुत कॉम्प्लिकेटेड हो गया है। उसमें बिखराव पैदा हो गया है। उसमें जलन और हसद पैदा हो गई है। अगर किसी के काम में खामी नजर आ रही है तो स्वस्थ आलोचना होनी चाहिए। खान सर को भी यह मुगालता हो गया है कि दुनिया का हर टॉपिक वह जानते हैं। कोई हर चीज नहीं जान सकता है। किसी को बदनाम करना ठीक नहीं है।

जिस तरह से वर्तमान में प्रोपगंडा फिल्में बनीं और आगे भी बन रही हैं। इससे फिल्म इंडस्ट्री की प्रतिष्ठा को ठेस पहुंची है?

फिल्म बनाना एक तरह का कारोबार है। इसीलिए इंडस्ट्री कहते हैं। एक तरह से फिल्म एक आर्ट भी है लेकिन अब इंडस्ट्री वाला पहलू हावी हो गया है। इसीलिए आज कल जो जमाना कह रहा है उसी तरह की फिल्म बनाई जा रही हैं। खास किस्म की पॉलिटिक्स और उसके खास किस्म के मुद्दों को उठाना और फिल्मों में पॉलिटिक्सकरना ठीक नहीं है।

 

क्या आप मानते हैं कि अब वामपंथी विचारधारा का दौर खत्म हो गया?

दौर कभी खत्म नहीं होगा। वामपंथ का मतलब गरीबों की मदद करना है। शांति से रहना यै हिंदू-मुस्लिम एकता को कौन कहेगा कि ठीक नहीं है। बदलते दौर में वह सही तरह से काम नहीं कर पाए। इसलिए पावर से आउट हो गए हैं। अपने आपको बदला नहीं है। जनता के करीब और जाते। मीडिया में जो बदलाव आ रहा था उसके हिसाब से अपना मीडिया खड़ा नहीं किया। ट्रेड यूनियन और किसान सभा तक ही सीमित रहे। जेहन टेलीवीजन और रेडियो से बनता है उस पर ध्यान नहीं दिया।

 

एएमयू में प्रो. केपी सिंह और शहरयार के जाने के बाद साहित्य की गतिविधियां खत्म सी हो गई हैं। इसकी वजह आप क्या मानते हैं?

उन सबको दुनिया छोड़े बहुत अरसा हो गया। वहां बहुत कम जाने का मौका मिलता है लेकिन अब नई जेनेरेशन है। वह लोग वहां काम कर रहे हैं। वहां अभी भी आर्ट्स, कल्चर और साहित्य की गतिविधियां चल रही हैं।

कहानीकार व फिल्म लेखक प्रो. असगर वजाहत

आपने गांधी जी पर कहानी लिखी, उस पर फिल्म भी बनी। अब सुनने में आ रहा है कि प्लास्टिक के नोटों पर गांधी का चित्र और उर्दू नहीं रहेगी। क्या यह सही कदम होगा ?

गांधी जी को हटाने से कोई हट नहीं सकता है। उनकी पूरी दुनिया में मान्यता है। अगर ऐसा किया भी गया तो गांधी जी पर कोई असर नहीं होगा। उनको दुनिया स्टेट्समैन मानती है।

 

अब आपकी काफी उम्र हो गई है। इस उम्र में भी आप साहित्य की खिदमत कर रहे हैं। इस समय आप किस विषय पर कहानी लिख रहे हैं?

ख्वाजा अहमद अब्बास की कहानी सरदार जी पर फिल्म बनवाई गई है। उसकी पटकथा लिखी है। जल्दी ही वह फिल्म रिलीज होगी। कहानी बहुत बड़ी है। ताआस्सुब के खिलाफ फिल्म है। 1848 में यह कहानी छपी थी।

आपने फतेहपुर में अपना बचपन गुजारा। आपने बाकरगंज कहानी भी लिखी। अब अपने शहर के लोगों को कोई संदेश देंगे?

संदेश यही है कि सभी मिलजुल कर रहें। दंगा फसाद नहीं होना चाहिए। सभी लोग अपने ख्यालात रखें लेकिन दूसरों पर दखल न दें। वहां तो शांति का माहौल हमेशा रहा। सिख दंगों में भी लोगों ने सिखों को लोगों ने बचाया था। यही वहां की रवायत है। यही कायम रहनी चाहिए।

ASIF HUSAIN

ASIF HUSAIN EDITOR मैंने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से हिंदी साहित्य में परास्नातक (मास्टर) करने के बाद ट्रांसलेशन में पीजी डिप्लोमा किया। इसके बाद पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा किया। 1997-98 में राष्ट्रीय सहारा में ट्रेनिंग की। इसके बाद 1998 में अमर उजाला कानपुर में ज्वाइन किया। अमर उजाला में कानपुर में रिपोर्टिंग की। गाजीपुर, चंदौली, भदोही, इटावा में ब्यूरोचीफ के पद पर रहा। इसके अलावा मुरादाबाद में संभल डेस्क प्रभारी रहा। झांसी में देहात डेस्क प्रभारी रहा। साथ में कई महत्वपूर्ण कार्यक्रमों की रिपोर्टिंग की। 2023-24 में अमर उजाला में सीनियर सब एडिटर पद से स्वैच्छिक रिटायरमेंट लिया। इसके बाद अपना यूट्यूब चैनल ‘ब्रिलियंट टाइम’ नाम से बनाया। वीकली अखबार भी इसी नाम से निकाला। ‘द्वाबा सम्राट हिंदी दैनिक’ में देश और विदेश पर लेख लिखे। वर्तमान में हिंदुस्तान संदेश से बतौर एडिटर जुड़ा हूं।

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