…लोग अक्सर पूछते पत्रकार अब पहले जैसी खबरें क्यों नहीं करते ?

आलोक कुमार त्रिपाठी । किसी पत्रकार की रिपोर्ट या उसके सवालों के आधार पर उसके खिलाफ प्रशासनिक कार्रवाई की सिफारिश होने लगे, जब एक प्रेस वार्ता में हुई किसी घटना को आधार बनाकर नौकरी और प्रतिष्ठा पर संकट खड़ा हो सकता हो, तब पत्रकारिता का माहौल स्वतः प्रभावित होता है। पत्रकार भी इंसान हैं। उनके ऊपर संस्थान का दबाव होता है, संस्थान के ऊपर विज्ञापन और सरकारी तंत्र का दबाव होता है। ऐसे में यदि कोई पत्रकार सरकार या प्रशासन के खिलाफ मुखर होकर सवाल उठाता है, तो उसे यह डर भी सताता है कि कहीं उसकी नौकरी, उसका करियर और उसकी वर्षों की कमाई हुई साख दांव पर न लग जाए। संलग्न पत्र में देखा जा सकता है कि एक पत्रकार के विरुद्ध शिकायत के आधार पर कार्रवाई करने का अनुरोध किया गया है। ऐसे मामलों को देखकर पत्रकार यह सोचते हैं कि मौन रहो या फिर सोशल मीडिया पर अकाउंट बनाकर स्वतंत्र हो जाओ। इसीलिए लिखता हू…कलम अगर डर जाए तो खबर मर जाती है,सच की आवाज़ भी अक्सर बिखर जाती है। जो पूछे सवाल सत्ता से बेखौफ़ होकर, उसकी राह में मुश्किलें ही नज़र आती हैं।
इस सवाल का जवाब शायद इस पत्र में छिपा हुआ है।





