न करें ये गलतियां, सुहागिन महिलाओं का अधूरा रह सकता है वट सावित्री का व्रत

वट सावित्री व्रत 16 मई को मनाया जाएगा। यह पर्व विवाहित हिंदू महिलाओं के लिए विशेष महत्व रखता है। मान्यता है कि इस व्रत को करने से पति की लंबी उम्र और अच्छे स्वास्थ्य का आशीर्वाद मिलता है। धार्मिक कथाओं के अनुसार, इसी दिन सावित्री की अटूट भक्ति और दृढ़ संकल्प से प्रसन्न होकर यमराज ने सत्यवान को दोबारा जीवनदान दिया था। ऐसी मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से वट वृक्ष (बरगद के पेड़) की पूजा करने वाली महिलाओं को सुखी वैवाहिक जीवन और पति की लंबी आयु का आशीर्वाद मिलता है। धार्मिक परंपराओं के अनुसार, व्रत के दौरान कुछ खास नियमों का पालन करना जरूरी होता है। इन्हें नजरअंदाज करने से व्रत अधूरा माना जा सकता है।
सुहाग की उधार ली हुई चीजें पहनने से बचें वट सावित्री व्रत पर विवाहित महिलाएं दुल्हन की तरह सजती-संवरती हैं। पूरा श्रृंगार करके पूजा करती हैं। यह व्रत अखंड सौभाग्य और वैवाहिक सुख से जुड़ा माना जाता है। महिलाएं आमतौर पर लाल, पीली या हरे रंग की साड़ी पहनती हैं। लेकिन धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन उधार लिया हुआ श्रृंगार इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। सिंदूर, मंगलसूत्र, चूड़ियां या पूजा में उपयोग होने वाली अन्य सुहाग की चीजें अपनी ही होनी चाहिए, किसी और से उधार ली हुई नहीं। वट वृक्ष की परिक्रमा का महत्व वट सावित्री व्रत में बरगद के पेड़ की परिक्रमा करना सबसे महत्वपूर्ण रस्मों में से एक माना जाता है। अधिकतर महिलाएं पेड़ की सात बार परिक्रमा करती हैं, जो सात जन्मों तक अटूट रिश्ते का प्रतीक मानी जाती है। कुछ महिलाएं श्रद्धा के अनुसार 21 या 108 बार भी परिक्रमा करती हैं। मान्यता है कि वट वृक्ष की परिक्रमा जीवन में स्थिरता और वैवाहिक संबंधों में मजबूती का प्रतीक होती है।
कच्चे सूती धागे का उपयोग क्यों किया जाता है ? पूजा के दौरान महिलाएं वट वृक्ष की परिक्रमा करते समय उसके चारों ओर कच्चा सूती धागा लपेटती हैं। कच्चा सूती धागा शुभ माना जाता है क्योंकि इसे प्राकृतिक और पवित्र माना जाता है। हिंदू धर्म के कई धार्मिक अनुष्ठानों में सरल और प्राकृतिक चीजों का विशेष महत्व होता है। मौली और जनेऊ जैसे धार्मिक कार्यों में भी सूती धागे का उपयोग किया जाता है। परंपरा के अनुसार, जितनी परिक्रमा की जाती है, उसी के अनुसार धागा भी लपेटा जाता है। कथा सुने बिना व्रत अधूरा माना जाता है? वट सावित्री व्रत में सावित्री और सत्यवान की कथा सुनना या पढ़ना बहुत जरूरी माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि कथा सुने बिना यह व्रत अधूरा रहता है। महिलाएं आमतौर पर बरगद के पेड़ के पास एकत्र होकर सावित्री की भक्ति और अपने पति को मृत्यु से बचाने की कथा सुनती या पढ़ती हैं।
वट सावित्री व्रत कथा बहुत समय पहले की बात है। भद्रदेश नामक राज्य में अश्वपत नाम के राजा और उनकी रानी मालवती रहते थे। उनके घर एक सुंदर और तेजस्वी कन्या का जन्म हुआ, जिसका नाम उन्होंने सावित्री रखा। वह बहुत बुद्धिमान, धर्मपरायण और सुंदर थी। जब सावित्री विवाह योग्य हुई, तो उसके पिता ने उसे स्वयं वर चुनने की अनुमति दी। सावित्री ने सत्यवान नामक एक राजकुमार को अपना वर चुना। सत्यवान एक वनवासी राजा द्युमत्सेन के पुत्र थे, जो किसी कारणवश अपना राज्य खो चुके थे और वन में रहते थे। लेकिन एक बात जिसने सबको चिंतित कर दिया वह यह थी कि एक भविष्यवाणी के अनुसार सत्यवान की मृत्यु एक साल के भीतर हो जाएगी। लेकिन सावित्री अपने निर्णय पर अडिग रही और सत्यवान से विवाह कर लिया। विवाह के बाद सावित्री अपने पति और सास-ससुर के साथ वन में रहने लगी। वह बहुत सेवा भाव से सबका ध्यान रखती थी। जिस दिन सत्यवान की मृत्यु होनी थी, उस दिन सावित्री ने व्रत रखा और वट वृक्ष के नीचे बैठकर पूजा की। जब सत्यवान लकड़ियां काटने जंगल गया, तो सावित्री भी उसके साथ गई। थोड़ी देर बाद सत्यवान के सिर में दर्द हुआ और वह सावित्री की गोद में लेट गया। तभी यमराज, मृत्यु के देवता, उसकी आत्मा लेने आए। सावित्री ने यमराज का पीछा किया और उनसे सत्यवान की आत्मा वापस देने की प्रार्थना की। यमराज ने कहा कि यह नियम के विरुद्ध है, लेकिन सावित्री की बुद्धिमानी, प्रेम और दृढ़ संकल्प देखकर वे प्रसन्न हो गए। उन्होंने सावित्री को तीन वर मांगने का अवसर दिया। सावित्री ने पहले अपने ससुर का राज्य वापस मांगा, फिर अपने सास-ससुर की आंखों की रोशनी, और अंत में अपने लिए सौ पुत्र मांगे। यमराज ने बिना सोचे समझे वर दे दिए, लेकिन जब सावित्री ने सौ पुत्रों की बात कही तो यमराज को समझ आया कि बिना सत्यवान के यह संभव नहीं है। उन्होंने सावित्री की दृढ़ता को सराहा और सत्यवान को जीवनदान दे दिया। इस तरह सावित्री के प्रेम और तप से सत्यवान की मृत्यु टल गई। तभी से महिलाएं सावित्री की तरह अपने पति की लंबी उम्र के लिए वट सावित्री व्रत करती हैं और वट वृक्ष की पूजा करती हैं, जो दीर्घायु और अटल प्रेम का प्रतीक माना जाता है।
धार्मिक ग्रंथों में वट सावित्री व्रत का महत्व धार्मिक ग्रंथों में वट सावित्री व्रत को वैवाहिक सुख, समृद्धि और परिवार की खुशहाली से जोड़ा गया है। मान्यता है कि जो महिलाएं पूरी श्रद्धा और विधि-विधान से इस व्रत को रखती हैं, उन्हें सुखी दांपत्य जीवन, पति की लंबी आयु और परिवार में समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है।




