नई दिल्ली : मिडिल ईस्ट में टेंशन से देश में बढ़ा खाद का संकट
डीएपी 30 फीसदी महंगा, सब्सिडी बोझ बढ़ने की संभावना

नई दिल्ली। मिडिल ईस्ट में चल रही टेंशन का असर अब देश के किसानों पर नजर आ सकता है।खरीफ सीजन से पहले भारत को महंगे दामों पर डीएपी और यूरिया आयात करना पड़ रहा है,जिससे सरकार पर खाद की सब्सिडी का बोझ बढ़ने की संभावना है।किसानों को खाद की किल्लत का सामना करना पड़ सकता है।बता दें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बीते रविवार को देश के किसानों से रासायनिक खादों का कम उपयोग करने और प्राकृतिक खेती अपनाने की अपील कर चुके हैं। रूरल वॉयस की खबर के मुताबिक भारत की फर्टिलाइजर्स कंपनियों ने खरीफ सीजन के लिए लगभग 15 लाख टन डीएपी आयात के सौदे किए हैं।सूत्रों के मुताबिक फरवरी में डीएपी की ग्लोबल प्राइस 720 से 730 डॉलर प्रति टन थी, लेकिन अब यह बढ़कर 920 से 930 डॉलर प्रति टन तक पहुंच गई है। यानी आयात लागत में लगभग 30 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। ऊपर से रुपये के मुकाबले डॉलर का महंगा होना भी कोढ़ में खाज का काम कर रहा है। इसके अलावा खेती में सबसे अधिक इस्तेमाल होने वाले फर्टिलाइजर यूरिया का आयात भी भारी महंगा हो गया है। भारत ने लगभग 25 लाख टन यूरिया आयात के लिए 935 से 959 डॉलर प्रति टन की दर पर सौदे किए हैं,जबकि अमेरिका-ईरान जंग से पहले यही कीमत लगभग 435 डॉलर प्रति टन थी। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक चीन फिलहाल डीएपी निर्यात नहीं कर रहा है।वहीं सल्फर की कमी से मोरक्को में डीएपी उत्पादन प्रभावित हुआ है।सल्फ्यूरिक एसिड,जो डीएपी निर्माण का अहम कच्चा माल है,सल्फर से तैयार होता है। खाड़ी देशों से एलएनजी सप्लाई में रुकावट आने से भारत में घरेलू उर्वरक उत्पादन भी प्रभावित हुआ है।भारत का प्रमुख एलएनजी सप्लायर कतर है,जहां से सप्लाई कम होने का असर सीधे खाद उत्पादन पर पड़ रहा है। 1 मार्च से 10 मई के बीच भारत का कुल खाद का उत्पादन घटकर 76.78 लाख टन रह गया, जो पिछले साल इसी अवधि में 92.01 लाख टन था। यूरिया और एनपीके उर्वरकों का उत्पादन भी तेजी से घटा है। गन्ना फसल में अभी यूरिया की मांग बनी हुई है,जबकि अगले एक महीने में धान की रोपाई शुरू होने के साथ खाद की मांग और बढ़ने वाली है। किसानों को डर है कि यदि स्थिति नहीं सुधरी तो खरीफ सीजन में गंभीर संकट पैदा हो सकता है। केंद्र सरकार सब्सिडी वाले खादों की बिक्री के लिए नेशनल स्तर पर एक फ्रेमवर्क तैयार कर रही है।इसमें किसानों को मिलने वाली खाद की मात्रा और प्रक्रिया तय की जाएगी। हालांकि अभी तक इसका अंतिम फ्रेमवर्क जारी नहीं हुआ है, जिससे किसानों और खाद विक्रेताओं में अनिश्चितता बनी हुई है।




