
अजित पाण्डेय /वाराणसी। श्री सनातन जागृति शक्तिपीठ ट्रस्ट के तत्वावधान में बरईपुर, सारनाथ स्थित बाबा नीम करौली आश्रम में आयोजित श्री नीम करौली बाबा के पंचम स्थापना दिवस के पावन अवसर पर चल रही श्रीमद्भागवत कथा के आठवें दिन कथा व्यास पूज्य पं. आलोक कृष्ण जी महाराज ने श्रद्धालु श्रोताओं को श्रीकृष्ण एवं बलराम की अद्भुत लीलाओं का विस्तारपूर्वक रसपान कराया। कथा के दौरान महाराज जी ने वर्णन किया कि किस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण और बलराम ने कंस द्वारा आयोजित धनुष यज्ञ में सम्मिलित होने हेतु माता यशोदा,गोपियों एवं ग्वालों से विदा ली और नंद जी व अन्य ग्वालों के साथ अक्रूर जी के संग मथुरा पहुंचे। वहां उन्होंने अत्याचारी कुवलयापीड़ हाथी का वध कर अखाड़े में कंस के पहलवान मुष्टिक और चाणूर का संहार किया तथा अंततः आततायी कंस का वध कर महाराजा उग्रसेन को पुनः सिंहासन पर स्थापित किया। साथ ही अपने माता-पिता वसुदेव और देवकी को कारागार से मुक्त कराया। महाराज जी ने कथा के माध्यम से यह भी बताया कि कंस का प्रारंभिक जीवन श्रेष्ठ था,किन्तु जरासंध,शिशुपाल और दन्तवक्त्र जैसे दुष्टों की संगति ने उसे क्रूर और अत्याचारी बना दिया। इस प्रसंग से उन्होंने वर्तमान समाज को संदेश देते हुए कहा कि बच्चों को बुरी संगति से बचाना अत्यंत आवश्यक है,क्योंकि गलत मित्रता उन्हें नशे और अनैतिक कार्यों की ओर ले जाती है,जिससे उनका जीवन पतन की ओर बढ़ जाता है। कथा में आगे भगवान श्रीकृष्ण और बलराम की शिक्षा-दीक्षा,विवाह,सुदामा के साथ दिव्य मित्रता,पाण्डवों की रक्षा तथा दुष्टों के संहार की लीलाओं का भी अत्यंत भावपूर्ण वर्णन किया गया। अंत में दुर्वासा ऋषि के श्राप से यदुवंश के विनाश,उद्धव और मैत्रेय को तत्वज्ञान प्रदान करने तथा भगवान के स्वधाम गमन की भक्तिमयी कथा सुनाकर श्रद्धालुओं को भावविभोर कर दिया। इस अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे और भक्ति रस में डूबकर कथा का श्रवण करते हुए आध्यात्मिक आनंद की अनुभूति की।




