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एक ऐसी कहानी जिसमें दीवारें खामोश हैं, लेकिन स्क्रीन बोल रही…. @-शाश्वत तिवारी

पश्चिम बंगाल की राजनीति हमेशा से ही अपनी तीव्रता, वैचारिक टकराव और जनभावनाओं के उभार के लिए जानी जाती रही है। कभी यह लड़ाई विचारधाराओं की होती थी, कभी सड़क पर उतरकर नारे और जुलूसों की, और कभी दीवारों पर उकेरे गए चित्रों और पोस्टरों की। लेकिन आज, यह संघर्ष एक नए मंच पर स्थानांतरित हो चुका है, डिजिटल प्लेटफॉर्म, जहां युद्ध का मैदान मतदाताओं के मोबाइल फोन की स्क्रीन बन गया है। यह परिवर्तन केवल माध्यम का बदलाव नहीं है, बल्कि यह राजनीति के चरित्र, रणनीति और मतदाता व्यवहार में एक गहरा और स्थायी परिवर्तन है। एक समय था जब चुनावी मौसम आते ही कोलकाता की दीवारें रंग-बिरंगे पोस्टरों, नारे और राजनीतिक चित्रों से पट जाती थीं। हर गली, हर चौराहे पर दीवारें बोलती थीं। वे केवल ईंट-पत्थर नहीं थीं, बल्कि वे राजनीतिक संवाद का माध्यम थीं। लेकिन आज वही दीवारें अपेक्षाकृत शांत हैं, क्योंकि प्रचार का केंद्र अब डिजिटल स्पेस में शिफ्ट हो चुका है। अब राजनीतिक दलों को दीवारों पर जगह की कमी नहीं खलती, क्योंकि उन्होंने मतदाताओं की जेब में मौजूद स्मार्टफोन को अपना सबसे प्रभावी माध्यम बना लिया है। फेसबुक, व्हाट्सएप, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और ट्विटर जैसे प्लेटफॉर्म अब नए “चुनावी पोस्टर” बन चुके हैं। तृणमूल कांग्रेस, भारतीय जनता पार्टी, कांग्रेस और माकपा, सभी दलों ने डिजिटल प्रचार को अपनी रणनीति का केंद्रीय हिस्सा बना लिया है। हर पार्टी ने अपनी “डिजिटल सेना” तैयार की है, जो 24 घंटे सक्रिय रहती है। फेसबुक पर लक्षित विज्ञापन, व्हाट्सएप ग्रुप्स के माध्यम से संदेशों का प्रसार, इंस्टाग्राम रील्स और शॉर्ट वीडियो, यूट्यूब पर भाषण और डॉक्यूमेंट्री

ट्विटर पर ट्रेंड और नैरेटिव निर्माण। यह सब मिलकर एक ऐसा डिजिटल इकोसिस्टम बना रहे हैं, जिसमें मतदाता लगातार राजनीतिक संदेशों से घिरा रहता है। इस डिजिटल क्रांति का सबसे बड़ा प्रभाव मतदाता के व्यवहार पर पड़ा है। पहले मतदाता केवल सुनने वाला था, सभाओं में जाता था, भाषण सुनता था और फिर अपना निर्णय करता था। लेकिन आज का मतदाता केवल उपभोक्ता नहीं, बल्कि कंटेंट का निर्माता और प्रसारक भी बन चुका है।वह वीडियो शेयर करता है, वह पोस्ट पर टिप्पणी करता है, वह अपने विचार व्यक्त करता है, वह ट्रेंड्स को प्रभावित करता है। इस प्रकार, मतदाता अब राजनीतिक प्रक्रिया का सक्रिय भागीदार बन गया है। लेख की शुरुआत में हमने जिस महत्वपूर्ण बिंदु को उठाया, “अब वह समय बीत गया, जब घर की महिलाएं कहती थीं कि वे राजनीति नहीं समझतीं”, वह इस बदलाव का सबसे सशक्त उदाहरण है। आज महिलाएं, व्हाट्सएप ग्रुप्स में राजनीतिक चर्चा करती हैं, फेसबुक और यूट्यूब पर नेताओं के भाषण देखती हैं, अपने विचार साझा करती हैं और कई बार परिवार के वोटिंग निर्णय को भी प्रभावित करती हैं। डिजिटल माध्यम ने उन्हें केवल सूचना ही नहीं दी, बल्कि आत्मविश्वास भी दिया है।

पश्चिम बंगाल की आबादी में युवाओं का बड़ा हिस्सा है, और यही वर्ग डिजिटल प्लेटफॉर्म का सबसे बड़ा उपयोगकर्ता भी है। औसतन तीन घंटे से अधिक समय सोशल मीडिया पर बिताने वाला यह वर्ग अब राजनीतिक दलों के लिए सबसे महत्वपूर्ण टारगेट बन चुका है। राजनीतिक दल युवाओं को आकर्षित करने के लिए, मीम्स और वायरल कंटेंट का उपयोग कर रहे हैं, शॉर्ट वीडियो के माध्यम से संदेश दे रहे हैं। इन्फ्लुएंसर्स को जोड़ रहे हैं, और रोजगार, शिक्षा जैसे मुद्दों को डिजिटल भाषा में प्रस्तुत कर रहे हैं। यह “डिजिटल पॉलिटिक्स” युवाओं के मानस को सीधे प्रभावित कर रही है। डिजिटल प्रचार का सबसे बड़ा लाभ यह है कि यह “वन साइज फिट्स ऑल” नहीं है। अब हर मतदाता को उसकी पसंद, उसकी भाषा, उसकी उम्र और उसके सामाजिक-आर्थिक वर्ग के अनुसार संदेश भेजा जा सकता है। इसे “माइक्रो-टारगेटिंग” कहा जाता है। उदाहरण के लिए, किसानों को कृषि योजनाओं से जुड़े विज्ञापन, युवाओं को रोजगार और स्टार्टअप से जुड़े संदेश, महिलाओं को सुरक्षा और कल्याण योजनाओं की जानकारी। इस प्रकार, हर मतदाता को “पर्सनलाइज्ड” राजनीतिक संदेश मिल रहा है।जहां डिजिटल प्लेटफॉर्म ने राजनीति को सरल और व्यापक बनाया है, वहीं यह कई गंभीर चुनौतियां भी लेकर आया है। सबसे बड़ी चुनौती है, फेक न्यूज़ और प्रोपेगेंडा, जिससे झूठी खबरें तेजी से फैलती हैं, वीडियो और तस्वीरों को एडिट कर भ्रम फैलाया जाता है, नेता/पार्टी/ प्रत्याशी को बदनाम करने के लिए अफवाहें चलाई जाती हैं। इसका असर यह होता है कि मतदाता कई बार गलत जानकारी के आधार पर सही/ गलत का निर्णय नहीं कर पाते है। डिजिटल प्रचार ने चुनावी प्रक्रिया को अधिक प्रभावी तो बनाया है, लेकिन इसके साथ ही नैतिकता और जवाबदेही के प्रश्न भी खड़े हो गए हैं।

जैसे, क्या डेटा का दुरुपयोग हो रहा है? क्या मतदाताओं की गोपनीयता सुरक्षित है? क्या चुनावी खर्च का सही हिसाब रखा जा रहा है? ये सभी सवाल आज के चुनावी परिदृश्य में अत्यंत महत्वपूर्ण हो गए हैं। हालांकि डिजिटल प्रचार तेजी से बढ़ा है, लेकिन यह भी सच है कि अभी भी ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच डिजिटल पहुंच में अंतर है। शहरों में इंटरनेट और स्मार्टफोन की पहुंच अधिक है, गांवों में अभी भी सीमित संसाधन हैं लेकिन यह अंतर धीरे-धीरे कम हो रहा है, और आने वाले समय में यह पूरी तरह समाप्त हो सकता है। डिजिटल प्रचार ने राजनीति को “वर्चुअल” बना दिया है। अब, रैलियां ऑनलाइन हो रही हैं, भाषण लाइव स्ट्रीम हो रहे हैं, नेता सीधे मतदाताओं से जुड़ रहे हैं। इससे राजनीति अधिक सुलभ और त्वरित हो गई है, लेकिन इसके साथ ही “जमीनी संपर्क” की कमी का खतरा भी बढ़ा है। पश्चिम बंगाल का यह चुनाव केवल एक राज्य का चुनाव नहीं है, बल्कि यह भारत में भविष्य की राजनीति की दिशा का संकेत भी है। आने वाले समय में, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित प्रचार, वर्चुअल रियलिटी रैलियां और अधिक उन्नत डेटा एनालिटिक्स, राजनीति का हिस्सा बन सकते हैं। इस बदलते समय की राजनीति से पश्चिम बंगाल के चुनावी रण में प्रचार का यह बदलता स्वरूप हमें यह बताता है कि राजनीति अब केवल सड़कों और सभाओं तक सीमित नहीं रही। यह अब हर व्यक्ति के हाथ में मौजूद एक छोटे से उपकरण, स्मार्टफोन के माध्यम से संचालित हो रही है।यह परिवर्तन अवसर भी है और चुनौती भी। अवसर इसलिए कि यह लोकतंत्र को अधिक समावेशी और सशक्त बना सकता है। चुनौती इसलिए कि यह भ्रम, प्रोपेगेंडा और नैतिक संकट को भी जन्म दे सकता है। अंततः यह मतदाता पर निर्भर करता है कि वह इस डिजिटल सूचना के सागर में से सत्य को कैसे पहचानता है और अपने मताधिकार का प्रयोग किस प्रकार करता है।

(लेखक राजनीतिक विश्लेषक / स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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