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गाजीपुरधर्म

गाजीपुर : श्री गंगा आश्रम के मानवता अभ्युदय महायज्ञ में उमड़े श्रद्धालु जन

डॉ एके राय / गाजीपुर। चैत्र नवरात्र के बाद शुरू होने वाले मानवता अभ्युदय महायज्ञ के तीसरे दिन श्री गंगा आश्रम के सर्वराह्कार, बाबा गंगारामदास बालिका उत्तर माध्यमिक विद्यालय के अध्यक्ष प्रबन्धक, मानव धर्म प्रसार समाजसेवी संस्था के अध्यक्ष भोला बाबा ने सायंकालीन ज्ञानयज्ञ में व्याख्यान देते हुए कहा कि, यह युग भगवन्नाम का है। इसमें केवल हरिनाम से ही कल्याण संभव है. हरिनाम लेने में किसी नियम की आवश्यकता नहीं है। आचार्य रामानन्द की परम्परा में एक भक्त ‘खिसिरावन’ नाम का जप करते हुए ईश्वरप्राप्त हो गया. यह नाम उसने भगवान् श्रीकृष्ण को दिया था क्योंकि वे ऊखल घसीटते हुए गन्धर्वों को नारद के शाप से मुक्त किये थे. उन्होंने कहा कि भगवान् अपना अपमान सह लेते हैं लेकिन भक्तों का अपमान नहीं सह सकते हैं‌। धर्म की हानि होने पर वह इसे बचाते हैं।

युवा व्यास माधव कृष्ण ने कहा कि, कर्म ही धर्म है. सत्संग की एकमात्र अभिप्राय जनजागरण है क्योंकि इसमें बतायी जाने वाली बातें मोटे तौर पर सभी लोग जानते ही हैं। सभी जानते हैं कि झूठ, अन्याय और अधर्म के मार्ग पर चलने से दुःख मिलता है फिर भी वे इस मार्ग पर चलकर कष्ट पाते हैं। गुरुमुख होने का मूल अर्थ है गुरु के तरफ मुख कर के सतर्कता से उनके निर्देशों को सुनना और उनके आचरण को देखना। गुरु के मुख से निकली बात को अपना जीवन बना लेना ही गुरुमुख होना है। जैसे समर्थ गुरु रामदास के शिष्य शिवाजी महाराज अपने गुरु के निर्देश पर निर्भीक होकर शेरनी का दूध लेने जंगल में चले गए, जैसे अपने गुरु सान्दीपनि के आदेश पर भगवान् कृष्ण और भगवान् बलराम मृत्यु के देवता से अपने गुरुपुत्र के जीवन के लिए मिलने चले गए। सत्संग में श्रोता की केवल एक विशेषता है, एकाग्रचित्त होकर सुनना. हमें एकाग्रचित्त होकर गुरु, शास्त्र और सत्संग की वाणी को सुनकर अपने जीवन में धारण कर लेना चाहिए। सभा में सुदामा जी, सत्यं बाबा, हवलदार जी ने अपने भजन सुनाये। शिवलोचन जी ने कहा कि, गुरु के बताये मार्ग से भजन करना चाहिए, और धैर्य रखना चाहिए। सभा का आरम्भ ईश वंदना से किया गया। नित्य की भांति आश्रम के नीतिग्रंथ श्रीरामचरितमानस का नवाह्न पारायण चलता रहा। वहीं दिन भर परमहंस बाबा गंगारामदास द्वारा बताये गए वैदिक हवन की विधि से यज्ञाचार्य संतोष पाण्डेय और जयप्रकाश यादव की पुरोहिती में मानवता के कल्याण के लिए यज्ञ चलता रहा। दोपहर और शाम में नित्य की भांति हजारों लोगों ने सामूहिक भंडारे में आकर भोजन प्रसाद लिया और जातिवाद और साम्प्रदायिक संकीर्णता को एक साथ एक पंक्ति में एक समान भोजन करके धता बताया।

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