
प्यार के गीत गाया, तो अच्छा लगा।
साथ में गुनगुनाया, तो अच्छा लगा।।
मेरे बापू को फुर्सत ही, मिलती नहीं।
पास अपने बिठाया, तो अच्छा लगा।।
आजकल लोग कुछ भी,बताते नहीं।
हाल अपना सुनाया, तो अच्छा लगा।।
अच्छे लगते हैं बच्चे, जो हंसते मिलें।
वह मुझे भी हंसाया, तो अच्छा लगा।।
आते रहते हैं घर पर, सगे मित्र सब।
पर पड़ोसी बुलाया, तो अच्छा लगा।।
सुन के शैतानियां, मां ने डांटा बहुत।
रो के मां ने रुलाया, तो अच्छा लगा।।
वह बहुत ही करीबी है, मेरा मगर।
गलतियां भी गिनाया,तो अच्छा लगा।।
मैं तो बचपन में ही,इस शहर आ गया।
गांव जब याद आया, तो अच्छा लगा।।
जाति-मजहब का नेता, खड़ा हो गया।
‘आदमी’ ने हराया, तो अच्छा लगा।
प्राध्यापक, हिंदी विभाग
स्वामी सहजानन्द पी जी कॉलेज, गाजीपुर(उ.प्र.)-233001
मो.9450725810




