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गाजीपुर : सनातन के प्रहरी, राजनीति के अघोषित भीष्म पितामह थे- पंडित सूर्यदेव शर्मा

युवावस्था से ही पंडित सूर्यदेव शर्मा हिंदू संगठन के कार्य में सक्रिय हो गए थे। उन्होंने हिंदू युवाओं को संगठित करने के उद्देश्य से 'आर्य वीर दल' की स्थापना की, आगे चलकर अखिल भारत हिंदू महासभा के प्रधानमंत्री (प्रधान) पद तक पहुँचे। वे हिंदुत्व के प्रखर चिंतक स्वातंत्र्यवीर सावरकर के घनिष्ठ विश्वासपात्रों में गिने जाते थे - पुण्यतिथि विशेष — 27 अगस्त

 

गाजीपुर । जनपद के मोहम्मदाबाद तहसील अंतर्गत कठउत गांव निवासी पंडित सूर्यदेव शर्मा का निधन 27 अगस्त 2001 को मध्य प्रदेश के दतिया जनपद में हुआ था। उनके निधन पर लोगो ने उस सपूत को खो दिया, जिसने अपना संपूर्ण जीवन सनातन धर्म, हिंदुत्व और राष्ट्रवाद की सेवा में अर्पित कर दिया। पंडित सूर्यदेव शर्मा  एक कट्टर सनातनी और हिंदू राष्ट्रवादी विचारधारा के प्रबल प्रवक्ता  की आज पुण्यतिथि है। उनका जीवन संघर्ष, समर्पण और आध्यात्मिकता का अद्भुत संगम था, जिसने न केवल दतिया-ग्वालियर अंचल की राजनीति को दिशा दी, बल्कि सनातन परंपरा की अलख भी जगाए रखी। युवावस्था से ही सूर्यदेव शर्मा हिंदू संगठन के कार्य में सक्रिय हो गए थे। उन्होंने हिंदू युवाओं को संगठित करने के उद्देश्य से ‘आर्य वीर दल’ की स्थापना की और आगे चलकर अखिल भारत हिंदू महासभा के प्रधानमंत्री (प्रधान) पद तक पहुँचे। वे हिंदुत्व के प्रखर चिंतक स्वातंत्र्यवीर सावरकर के घनिष्ठ विश्वासपात्रों में गिने जाते थे।

सावरकर के विचारों से गहराई से प्रभावित थे।उनके जीवन का एक विवादास्पद और चर्चित अध्याय महात्मा गांधी हत्याकांड से जुड़ा रहा, जिसमें उन्हें नाथूराम गोडसे और नारायण आप्टे को बेरेटा पिस्तौल उपलब्ध कराने के आरोप में सह-अभियुक्त बनाया गया था।

यह प्रसंग उनके जीवन को इतिहास के पन्नों में एक विवादित किंतु उल्लेखनीय स्थान देता है। गोरखपुर स्थित गोरक्षनाथ मठ – जिससे वर्तमान उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का संबंध है – से पंडित सूर्यदेव शर्मा के प्रगाढ़ संबंध रहे।

आध्यात्मिक जिज्ञासा और साधु-संतों के प्रति उनके सम्मान का प्रमाण यह भी है कि उन्होंने पैदल यात्रा करते हुए नेपाल की यात्रा की और वहाँ अनेक संतों और योगियों से भेंट कर आध्यात्मिक ज्ञान अर्जित किया। दतिया के मध्य प्रदेश स्थित श्री पीताम्बरा पीठ से उनका नाता आत्मिक और गहन था। वे पीताम्बरा पीठ के संस्थापक स्वामी जी महाराज के अनन्य शिष्य थे। स्वामी जी महाराज ने 1929 में दतिया में तपस्या हेतु प्रवास किया और आगे चलकर माँ बगलामुखी तथा माँ धूमावती – दस महाविद्याओं में से दो  की स्थापना कर श्री पीताम्बरा पीठ की नींव रखी, जो आज देश के प्रमुख शक्तिपीठों में गिना जाता है। स्वामी जी के आदेश पर ही सूर्यदेव शर्मा ने सक्रिय राजनीति से संन्यास लिया और स्वामी जी के निधन (2 जून 1979) के पश्चात उन्हें पीठ का उत्तरदायित्व सौंपा गया। उन्होंने आजीवन श्री पीताम्बरा पीठ ट्रस्ट के सचिव के रूप में सेवाएँ दीं और पीठ की धार्मिक, सांस्कृतिक एवं प्रशासनिक व्यवस्था को नई ऊँचाई तक पहुँचाया। आज भी यह पीठ न्यास (ट्रस्ट) द्वारा संचालित होता है और वहाँ स्थित संस्कृत पुस्तकालय तथा अनुष्ठान परंपराएँ स्वामी जी और सूर्यदेव शर्मा के अथक प्रयासों की साक्षी हैं। राजनीतिक क्षेत्र में भी पंडित सूर्यदेव शर्मा का कद कम नहीं था। वे ग्वालियर की राजमाता विजयाराजे सिंधिया के राजनीतिक प्रमुख (चीफ) रहे तथा सिंधिया रियासत के प्रमुख सरदार आंग्रे के साथ मिलकर ज्योतिरादित्य सिंधिया के राजनीतिक मार्गदर्शक की भूमिका भी उन्होंने निभाई। वे लोकतंत्र के सच्चे पक्षधर थे और उन्होंने 1962 से 1975 के मध्य दतिया एवं सेवढ़ा से स्वतंत्र प्रत्याशी के रूप में तीन बार चुनाव लड़ा – यह उनकी राजनीतिक प्रतिबद्धता और जनाधार का प्रमाण था। दतिया-ग्वालियर अंचल की राजनीति में पंडित सूर्यदेव शर्मा को आज भी एक अघोषित ‘भीष्म पितामह’ अथवा मार्गदर्शक के रूप में स्मरण किया जाता है, जिनकी सलाह और समर्थन के बिना क्षेत्र की राजनीतिक दिशा तय करना कठिन माना जाता था। धर्म, राजनीति और समाज सेवा के त्रिवेणी संगम जैसे इस व्यक्तित्व ने आजीवन सनातन मूल्यों और लोकतांत्रिक आदर्शों की रक्षा के लिए कार्य किया। उनकी पुण्यतिथि पर, दतिया सहित समूचा क्षेत्र उस युगपुरुष को नमन करता है, जिसने धर्म और राजनीति दोनों क्षेत्रों में अपनी अमिट छाप छोड़ी। उनकी स्मृतियाँ आज भी श्री पीताम्बरा पीठ के प्रांगण में तथा दतिया-ग्वालियर की राजनीतिक विरासत में जीवंत हैं।

रिपोर्ट – डॉ क्षेमेंद्र शर्मा

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