Slide 1
Slide 1
मौसम

अगस्त-सितंबर की बारिश बदल सकती है पूरे साल की तस्वीर

बीते कुछ हफ्तों में दक्षिण-पश्चिम मॉनसून ने तेजी दिखाई है। अच्छी बारिश से आगे खरीफ बुवाई को रफ्तार मिलने की उम्मीद है। एसेट मैनेजमेंट कंपनी बजाज एसेट मैनेजमेंट कंपनी ने अपनी ताजा रिपोर्ट में कहा है कि मॉनसून ने रफ्तार पकड़ी है लेकिन बारिश के क्षेत्रवार असमान वितरण के चलते अब भी उसका लॉन्ग टर्म एवरेज 16 फीसदी कम है। मॉनसून के बाकी महीनों का प्रदर्शन ही कृषि उत्पादन और महंगाई पर इसके असर को तय करेगा। अगर अगस्त और सितंबर में भी बारिश की रफ्तार बनी रहती है, तो कमजोर मॉनसून को लेकर चिंता काफी हद तक खत्म हो सकती है और 2026 को कमजोर नहीं, बल्कि देर से शुरू होकर सुधरने वाला मॉनसून वर्ष माना जाएगा।

रिपोर्ट के मुताबिक, सप्लाई से जुड़ी अस्थायी दिक्कतों के चलते निकट भविष्य में खाने-पीने की वस्तुओं की पर दबाव बना रह सकता है। हालांकि, बारिश में सुधार, पर्याप्त खाद्यान्न भंडार, मजबूत ग्रामीण मांग और अनुकूल ब्याज दरों का माहौल इस जोखिम को बड़े आर्थिक संकट में बदलने से रोक सकता है। रिपोर्ट बताती है कि इस साल की तस्वीर फिलहाल पहले से ज्यादा सकारात्मक नजर आ रही है। जून के आखिरी सप्ताह और पूरे जुलाई में बारिश में तेज सुधार हुआ। जलाशयों में पानी का स्तर संतोषजनक है और ज्यादातर नदी बेसिनों में जलस्तर दीर्घकालिक औसत के आसपास या उससे ऊपर है। ऐतिहासिक आंकड़ों पर नजर डालें तो मॉनसून की शुरुआती स्थिति से पूरे सीजन का नतीजा तय नहीं होता। जून 2026 पिछले 100 वर्षों के सबसे सूखे जून महीनों में शामिल रहा, लेकिन अर्थव्यवस्था पर वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि जुलाई, अगस्त और सितंबर में बारिश कैसी रहती है। उदाहरण के तौर पर 1926 में मानसून की शुरुआत बेहद कमजोर रही थी, लेकिन जुलाई से सितंबर के बीच बारिश में जोरदार सुधार हुआ और पूरे सीजन में बारिश सामान्य से 11 फीसदी ज्यादा रही। रिपोर्ट के अनुसार, एक बार मॉनसून के कमजोर रहने की तुलना में लगातार दो साल कमजोर मॉनसून का असर कृषि आय, ग्रामीण खपत और आर्थिक वृद्धि पर कहीं अधिक गंभीर होता है। धकमजोर मॉनसून का सबसे पहला असर कृषि उत्पादन पर पड़ता है। इससे किसानों की आय घटती है और ग्रामीण इलाकों में खपत धीमी पड़ जाती है। इसका असर ट्रैक्टर, दोपहिया वाहन, उर्वरक और रोजमर्रा के उपभोक्ता सामान जैसे ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जुड़े क्षेत्रों पर भी दिखाई देता है।
ग्रामीण मांग में कमी का असर आगे चलकर आर्थिक वृद्धि, खाद्य महंगाई (खाने-पीने के वस्तुओं की महंगाई) और कंपनियों की कमाई पर भी पड़ता है। साल 2009 में कमजोर मॉनसून के कारण कृषि उत्पादन और ग्रामीण खपत दोनों प्रभावित हुए थे। वहीं 2014 और 2015 में लगातार दो साल कमजोर मॉनसून ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर लंबे समय तक दबाव बनाए रखा।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button