टूटे नेजे से लड़ते हुए शहीद हो गए थे हजरत अब्बास
चार साल की भतीजी सकीना के लिए मश्क से पानी लेने गए थे हजरत अब्बास
कानपुर। मोहर्रम की 8 तारीख पर ग्वालटोली इमामबारगाह करम रसूल अंसार अली से अन्जुमन जाफरिया ने हजरते अब्बास का मन्नती अलम का जुलूस हजरत इमाम हुसैन के छोटे भाई हजरते अब्बास अलमबरदार की याद में अकीदत से रात्रि 10 बजे उठाया। जुलूस में हजरते अब्बास के तीन अलम जिन पर मन्नती मेवों के सेहरे बांधे गए थे।
जुलूस से पहले इमाम बारगाह की मजलिस में मौलाना नुसरत आबिदी ने कहा कि हजरते अब्बास अपनी प्यासी भतीजी जिसकी उम्र केवल 4 साल थी जनाबे सकीना के लिए पानी लेने हजरत इमाम हुसैन की इजाजत से नहरे फुरात पर गए थे। आपके पहुंचने पर यजीदी फौजों में ऐसी हैबत तारी हुई कि उनमें भगदड़ मच गई। हजरत अब्बास ने मश्क में नहर से पानी भरा क्योंकि हजरत अब्बास को इमाम हुसैन ने लड़ने की इजाजत नहीं दी थी इसलिए तलवार भी नहीं दी थीं। बचाव के लिए एक टूटा हुआ नेजा दिया था। जैसे ही पानी की मश्क भरकर हज़रत अब्बास हुसैनी खेमे की ओर बढ़ रहे थे। इसी बीच भागी हुई यजीदी फौजें करीब आ गईं। हजरत अब्बास ने अपने टूटे हुए नेजे से बहुत देर तक मुकाबला किया। इसी बीच एक तीर मश्क पर आकर लगा और मश्क का सारा पानी बह गया। अन्त में जख्मी होकर हज़रत अब्बास घोड़े से जमीन पर आए इमाम हुसैन को आवाज दी। इमाम पहुंचे तो हजरत अब्यास के दोनों हाथ कट चुके थे एक तीर आंख पर लगा था। इमाम ने आंख का तीर खींचा। इसी बीच हज़रत अब्बास ने इमाम से वसीयत की कि मेरी लाश को खेमे में न ले जाइएगा। मैं अपनी 4 साल की भतीजी सकीना से शर्मिन्दा हूँ कि मैं उस तक पानी नहीं पहुंचा सका। यह कहते ही हजरत अब्बास शहीद हो गए। यह बयान सुनकर मजलिस में बैठे लोग ज़ारो कतार रोने लगे। मजलिस के उपरान्त जुलूस मकबरा हुसैनी मैदान पहुंचा। वहां पर अजादारों ने मातम किया। जुलूस में अंजुमन के साहवेबयाज इरफान अली, रेहान कानपुरी ,रिजवान, बिलाल, सैफ अली ने नौहाख्वानी की।
जुलूस के आगे घुड़सवार पुलिस चल रही थी। जुलूस में कई अलम और सजा हुआ जुलजिनाह (इमाम हुसैन का घोड़ा) भी था और ऊंट पर अमारी सजी थी और जुलूस में दर्जनों अलम और काले झण्डे थे। जुलूस में नवाब अली अब्बास, ताज कानपुरी, इम्तियाज हुसैन, हाजी नसीर हसन रिज़वी, अंसार अली, इमरान अली रिंकू, यूनुस रजा विक्की, डा. जुल्फिकार अली रिजवी, अहमद अब्बास,एजाज़ अली, इंतिज़ार अली, आसिफ अब्बास, नजरे आलम, अनवार सज्जादी हसनैन अकबर, मो० मुन्तजिर, तालिब हुसैन, फिरोज हुसैन, आरिफ अब्बास रिज़वी, अदीब आजमी, डॉ अली फ़रज़ान, डा. अयाज़ हैदर रिज़वी, अफसर हुसैन , नवाब गुलफ़ाम, नवाब ज़ीशान ख़ान, नवाब नक़ी अली, नवाब अलीशान, नवाब बाकर अली, नवाब रफ़ीक़ अली, जवाज़ हैदर रिज़वी, इस्माइल आशी रिज़वी और शकील जाफ़री, कुमैल नमाजी ताज मिर्जा, फुरकान हैदर रिज़वी,एहसान हुसैन इम्तियाज़ अली,अख़्तर अली छोटे मिया आदि मौजूद थे ।
शहर में कुरैशी बिरादरी ने अलम का जुलूस निकाला
कानपुर। शहर में कुरैशी बिरादरी ने नई सड़क से 124 साल पुराना अलम का जुलूस उठाया। जुलूस का नेतृत्व हाजी परवेज कुरैशी, साहिबे आलम कुरैशी, गुलजार अहमद कुरैशी, मो० यासीन कुरैशी, नियाज अहमद कुरैशी, अजमत अली अशरफी कर रहे थे। यह जुलूस अपने कदीमी रास्तों से होता हुआ देर रात नई सड़क पहुंचकर समाप्त हुआ। जुलूस में दर्जनों अलम, सैकड़ों सब्ज हिलाली परचम और दर्जनों ऊंट भी थे।
जुलूस जिधर से भी गुजरा अकीदतमन्दों ने शर्बत, चाय व पानी से इस्तकबाल किया। महिलाओं ने अपने घरों से ही अलम और ताजिये के दर्शन किए। रैपिड एक्शन फोर्स तथा स्थानीय पुलिस भारी संख्या में जुलूस के साथ-साथ थी। यह जुलूस अपने कदीमी रास्तों से गश्त के बाद नई सड़क सुनहरी मस्जिद के पास समाप्त हुआ।
दूसरी तरफ नगर के पांच हजार इमामबाड़ों में शिया और सुन्नी अकीदतमंदो की ओर से शहीदे आजम हजरत इमाम हुसैन की कुर्बानी की याद में मजलिसों मातम का सिलसिला देर रात तक चल रहा है। मुस्लिम बहुल्य क्षेत्रों में जगह-जगह इमाम चौक पर शहदतनामे हो रहे थे और खिचड़ा बांटा जा रहा था। फातिहाख्वानी और कुरानख्वानी के जरिये हजरत इमाम हसैन और कर्बला के 72 शहीदों का खिराजे अकीदत पेश किया जा रहा था।


