‘फिर चाँद मोहर्रम का नमूदार हुआ है और चाक दिले अहमदे मुख्तार हुआ है’
अकीदत के साथ पटकापुर और शिवाले से निकाला गया दूल्हे का जुलूस, काले कपड़ों में मातम करते हुए चल रहे थे अकीदतमंद, नवाब हैदर अली खाँ का 155 वर्ष पुराना अलम और ताजिये का जुलूस भी निकला
कानपुर। ‘फिर चाँद मोहर्रम का नमूदार हुआ है और चाक दिले अहमदे मुख्तार हुआ है’ नवासे पैगंबरे इस्लाम हज़रत इमाम हुसैन शहीदे आजम शहीदे कर्बला की शहादत की याद में मजलिस, मातम और शहरदातनामों का सिलसिला शुरू हो गया। नवाब हैदर अली खाँ का अलम जुलूस ताजिये के साथ इमाम बारगाह आगामीर मकबरा से निकाला गया। पटकापुर इमाम बारगाह महल और प्रयाग नारायन
शिवाला से नवाब दूल्हा के अलम का जुलूस देर शाम को निकाला गया।
पहली मोहर्रम पर नवासे रसूले आज़म इमाम हुसैन की अज़ीम शहादत की याद में नवाब हैदर अली खाँ का 155 वर्ष पुराना अलम और ताजिये का जुलूस इमाम बारगाह आगामीर मकबरा से रात 10 बजे निकाला गया। जुलूस में नवाब हैदर अब्बास और नवाब अली अब्बास आदि शामिल रहे। जुलूस में दर्जनों काले झंडे और अलम शामिल थे। अकीदत के साथ लोग ताजिया लेकर चल रहे थे। इस दौरान या हुसैन की सदाएं बुलंद हो रही थीं।
यह जुलूस अन्जुमन ए मोहम्मदी मोईन-उल-अज़ा के मातमी दस्ते के द्वारा निकाला गया। अन्जुमन के साहिबेबयाज हसन अब्बास अख्तर सीतापुरी और नौहाख्वानी से कर्बला के 72 प्यासे शहीदों को खिराजे अकीदत पेश कर रहे थे। जुलूस ग्वालटोली बाजार से गुजरता हुआ मछली वाला तिराहा से गश्त करता हुआ इमामबाड़ा नवाब हैदर अली खाँ नवाब कम्पाउण्ड सिविल लाइन्स पहुंचकर समाप्त हुआ।
दूसरी तरफ पहली मोहर्रम पर पटकापुर नवाब दूल्हानगर इमाम बारगाह महल से और प्रयाग नारायन शिवाला से इमाम बारगाह महल तक सोगरवाराना माहौल में जुलूस निकाला गया। इस जुलूस में लोग नंगे पैर काले कपड़े पहने मातम करते हुए चल रहे थे। ये जुलूस 159 वर्ष से नवाब दूल्हा के नाम से उठाया जा रहा है। इस जुलूसे अलम में अन्जुमन रिजविया के साहिबेबयाज नवाब मुमताज, परवेज जैदी और इब्ने हसन बब्लू नौहाख्वानी कर रहे थे। इस दौरान नौहा- “फिर चाँद मोहर्रम का नमूदार हुआ है, और चाक दिले अहदें मुख्तार हुआ है”। ये जुलूस शिवाले से ताज़िया लेकर इमामबाड़ा महल में समाप्त हुआ ।
इन दोनों जुलूसों में नवाब मुमताज, इब्ने हसन (बब्लू), नवाब फरहत हुसैन, शहंशाह हुसैन,निशात अली, हुसैनी फेडरेशन के मीडिया प्रभारी डॉ. जुल्फिकार अली रिजवी, नज़रे आलम, अनवार सज्जादी, कुमैल नमाजी, रानू नकवी, आसिफ अब्बास और सिकन्दर सीतापुरी मौजूद थे। उधर शहर के पाँच हजार इमामबाड़ों में जिकरे शाहदतेन व मजलिसे बरपा हुई। इन मजलिसों को मौलाना तसव्वुर हुसैन, मौलाना बशीर हैदर, मौलाना मोहम्मद मेहंदी, मौलाना फाजिल हुसैन, मौलाना मुनव्वर हुसैन, तालिब हुसैन, मौलाना जीशान हैदर, मौलाना जहीर अब्बास, मौलाना सैयद एहसान हुसैन,मेंहदी अब्बास ने संबोधित करते हुए कर्बला के 72 प्यासे शहीदों की शहादत बयान की। इस दौरान सुरक्षा के भी पुख्ता इंतजाम किए गए थे।
मजलिसों का असल मक़सद हुसैनियत को अपने किरदार में
मौलाना सैयद अहसान हुसैन ने ग्वालटोली, इमामबारगाह हाजी अख़्तर हुसैन रिज़वी में आयोजित मजलिस में अज़ादारी के वास्तविक मक़सद और कर्बला के पैग़ाम पर रौशनी डाली।
मौलाना ने कहा कि इन पाक महफ़िलों और मजलिसों का असल मक़सद हमारे दिलों को मज़बूत करना है। उन्होंने अफ़सोस जताते हुए कहा कि अगर मजलिसों में आने के बाद भी हमारे दिलों में ‘ख़ौफ़-ए-इलाही’ (अल्लाह के डर) के अलावा किसी और का ख़ौफ़ बाकी है तो इसका सीधा मतलब यह है कि हम मजलिसों को सिर्फ रस्मी तौर पर मना रहे हैं। उन्हें अपने चरित्र और किरदार में बसा नहीं रहे हैं। अज़ादारान-ए-मज़लूम के लिए ज़रूरी है कि वे इस पैग़ाम को अपने अमली जीवन में उतारें।”
तारीख़ी वाक़यात का हवाला देते हुए मौलाना ने बताया कि किस तरह 28 रजब सन 60 हिजरी को हालात तेज़ी से बदले, जब यज़ीद जैसा बदकिरदार (बुरे चरित्र वाला) शख़्स तख़्त-ए-हुकूमत पर बैठ गया और इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने उसके ख़िलाफ़ शहादत और बहादुरी का वो बेमिसाल पैग़ाम दिया जो आज भी पूरी इंसानियत का मार्गदर्शन कर रहा है।
मजलिस के अंत में इमाम-ए-ज़माना की ताजील-ए-ज़ुहूर और मुल्क में अमन-ओ-अमान के लिए विशेष दुआएँ मांगी गईं। इस तरह नवासे रसूले आजम हज़रत इमाम हुसैन की बारगाह में नजराने अकीदत पेश किया, मजलिसों में मीर अनीस और मिर्जा दबीर के मरसिये भी पढ़े गए।



