
इस आयोजन में जनपद के विभिन्न क्षेत्रों के साथ-साथ पूर्वांचल के अन्य जिलों से भी बड़ी संख्या में बटुकों ने भाग लिया। संयोजक डॉ. एस.सी. तिवारी ने कहा कि सनातन धर्म में वर्णित 16 संस्कारों में उपनयन संस्कार का विशेष महत्व है। यह संस्कार व्यक्ति को ब्रह्मचर्य जीवन में प्रवेश कराता है और उसे अनुशासन, संयम तथा कर्तव्यपरायणता का पाठ सिखाता है। जिलाध्यक्ष ऋषिकेश पाण्डेय ने बताया कि शास्त्रों में यज्ञोपवीत संस्कार के लिए ब्राह्मणों की आयु 8 वर्ष, क्षत्रियों की 11 वर्ष और वैश्य की 16 वर्ष निर्धारित की गई है, इसलिए समय पर इस संस्कार का होना आवश्यक है।पंडित राजेश जी महाराज ने कहा कि वैदिक काल में महिलाओं का भी उपनयन संस्कार होता था, जिन्हें ‘ब्रह्मवादिनी’ कहा जाता था और वे वेदों का अध्ययन करती थीं। कार्यक्रम के अंत में संयोजक रामजी उपाध्याय ने उपस्थित जनसमूह के प्रति आभार व्यक्त किया। इस अवसर पर विजय शंकर तिवारी अमरनाथ मिश्रा जय नारायण द्विवेदी विजय शंकर पांडे जयशंकर दुबे देव भास्कर तिवारी पंडित मुरली मनोहर मिश्रा जयप्रकाश पांडेय रमाकांत तिवारी उमेश कुमार मिश्रा बापू नंदन मिश्रा डॉ लक्ष्मी शंकर दुबे पंकज उपाध्याय प्रणव चतुर्वेदी, एडवोकेट संजीव कुमार द्विवेदी, विजय द्विवेदी राजेश मिश्र, ब्लॉक प्रमुख प्रतिनिधि आद्याशंकर मिश्रा, विजय शंकर पांडे सतीश कुमार पाण्डेय एडवोकेट, नरेंद्र तिवारी, प्रशांत पाण्डेय, शशांक तिवारी, डॉ. अरुण कुमार मिश्र, चन्द्र प्रकाश तिवारी कार्यक्रम का संचालन परिषद के मंत्री संजय कुमार त्रिपाठी ने किया
भिक्षाम देही…….
उपनयन संस्कार के दौरान ब्राह्मण बटुको के द्वारा अपने स्वजनों से विक्षाटन कार्य किया गया। यह भिक्षाटन उस बात का द्योतक हैं कि युवा उन परिस्थितियों के लिए भी तैयार रहे जिससे कठिन दौर में भी अपने को संयमीत रखते हुए धर्म,अर्थ, काम व मोक्ष को प्राप्त किया जा सके। मनुस्मृति में ब्राह्मण वर्ण के आजीविका के निर्धारण करने के लिए कर्मकांड व भिक्षाटन को प्रमुख माना गया हैं। इसके लिए मनुस्मृति में एक श्लोक लिखा गया है *अध्ययन्म अध्यापनम, यजनम याजनम दान प्रति गृहस्य चैव ब्राह्मण नाम कल्पायतम।





