समीक्षा: माटी के संस्कार के जीवंत दस्तावेज हऽ‘‘गांव के थाती’’

✍️डॉ. राणा अवधूत कुमार
भोजपुरी के समर्थवान साहित्यकार राम बहादुर राय जी के नइकी किताब ‘गांव के थाती’ अभी हाले में आइल हऽ। जेकरा के हाल-फिलहाल पढ़नी हऽ, दरअसल ई किताब भोजपुरी में स्मृति आख्यान भा संस्मरण ग्रंथ के रूप में हमनी के सोझा बा, जवना में गांव के माटी आ एकर सभ्यता-संस्कृति के सोंधाइल गमक एकर हरेक अध्याय में महसूस कर सकीना। सांच कहल जाये त भोजपुरी संस्कृति आ ग्रामीण पृष्ठभूमि के केंद्र में रखके लिखल ई किताब सही मायने में एगो थाती बा। जवन आपन शीर्षक के पूरी तरह से चरितार्थ कर रहल बा। एह किताब में राम बहादुर जी अपना गांव आ जीवन के एक-एक बात याद करके, खोजके सुनावत बाड़न। जतना अपना गांव के खोजत बाड़न, ओतने ही अपनहूं के जोहत बाड़न।
एह जोह के क्रम में गांव के संगी-संघाती, खेत-खरिहान, नदी-ताल, स्कूल-मंदिर, झगड़ा-रगड़ा अउर माई-बाबू, चाचा-चाची, नाना-नानी से लेके गोतिया-नइया, हरवाह-चरवाह, बुढ़-पुरान, गवनिहार से लेके रोपनिहार-कटनिहार तक शामिल बा। जीवन में बीतल समय आ कालचक्र में जे इयाद में आइल, जवना से कुछ अनुभव-सीख मिलल, सब एगो कड़ी में गुथात चल गइल बा। एकरा पहिले राम बहादुर राय जी के भोजपुरी में एगो काव्य संग्रह आइल बा, ‘अब गंउओ में शहरिया आ गइल’, एह संग्रह में करीब 72 गो कविता बाड़ी सन। जवन लगभग सब गांव के संस्कार, शहर में फइलल कुव्यवस्था के फोकस करत रचाइल बा।
कुछ एही तरे के गद्य में प्रयास सफल होत नजर आवत बा खास बात बा कि ‘गांव के थाती’ में लेखक आपन गांव-घर के साथे इलाहाबाद अब प्रयागराज में कॉलेज स्तर के शिक्षा के जीवनानुभव आ एह बीच पढ़ाई छोड़के कमाए खातिर दिल्ली, घर छोड़ के जाये के भी अपने संस्मरण में शामिल कइले बानी। दरअसल राम बहादुर राय जी विशुद्ध रूप से एगो गांव-देहात, कर्मजीवी समाज के कवि के रूप में आपन पहचान बनवले बानी। इहां के तमाम रचनन में खेती-किसानी, मेहनत-मजूरी, कामगार या वंचित समाज के समस्या त रहबे करेला, एकरा साथे ओम्मे व्यक्त अभिव्यक्ति कुछ अइसन प्रभावशाली होला कि पाठक के सहज में ही अपना ओरि खींच लेला।
‘गांव के थाती’ के कई अध्याय पढ़त रउआ महसूस करब कि ई घटना रउआ साथे भी भइल बा। लेखके के जगह प अपना के राखि के रउआ ओह दर्द के, ओह टीस के, ओह व्यथा के महसूस करे लागब।
ठेठ गंवई अंदाज में लिखाइल ‘गांव के थाती’ किताब भोजपुरी में संस्मरण विधा में एगो मील के पत्थर साबित होई। गांव के सच्चा तस्वीर राखल आसान ना रहेला। सांच कहल जाव त आत्म संस्मरण या स्मृति आख्यान लिखल जोखिम के काम होला। काहे कि एकरा में लेखक अपना जीवन के खटा-मिठा, गलत-सही अनुभव के साथे अंदर के दर्द के भी सामने परोसे के पड़ेला। बहुत कुछ कहहूं के पड़ेला, कहे के संगे बहुत कुछ छिपावे के भी भरपूर गुंजाइश रहेला। बाकिर किताब पढ़त ई बुझाइल ह कि राम बहादुर जी ईमानदारी के साथे आपन काम कइले बानी।
एगो अउर विशेष बात बा कि ‘गांव के थाती’ में राम बहादुर राय जी खाली गांव-घर, टोला- परोसा, खेत-बधार, परब-त्योहार, लोकरंग-लोक संस्कृति के बात नइखी कइले, जब जहां मौका मिलल, राजनीति-सियासत, वैश्वीकरण, बाजारवाद, जनवादी विचार, जातिवाद, अपसंस्कृति, मशीनीकरण, सांप्रदायिकता, विकास-विनाश से लेके देश के मौजूदा समस्या आ विकृति के ओरि ध्यान आकृष्ट करे के सफल उतजोग कइले बानी। जवन कि ई किताब के नवीन स्वरूप प्रदान कइले के साथे-साथे गांव के कहानियन या इयाद के बीच पाठक के आधुनिक परिवेशो से जोड़े के काम कइले बानी। गंवई पहचान के इयाद दिलावत अब गांव-जवारो में संस्कार-नैतिकता के क्षरण अउर समाज के विभिन्न स्तर पर एम्मे आइल गिरावट प ध्यान दियावे में सफल साबित होइल बाड़े।
कुल मिलाके ई कहल जा सकेला कि राम बहादुर राय जी आपन ‘गांव के थाती’ के बहाने लोगन के गांव के संस्कार-संस्कृति से जोड़े खातिर आ परंपरा के साथे राखके आधुनिकता के अपनावे आ मूल से जुड़े खातिर प्रेरित करत बा ई किताब पढ़ब त रउआ लागी कि ई खाली राम बहादुर जी के गांव के थाती ना ह, हमरो गांव के ह, रउरो गांव के ह, हं ई जब रउआ पढ़ब तबे बुझाई।
ई किताब अमेजन पर भी उपलब्ध बाटे, जदि रउआ भोजपुरी संस्कृति आ गांव-जवार के खुशबू महसूस कइल चाहत बानी त एह किताब के अमेजन से बुक कर सकीना https://www.amazon.in/dp/934801319X