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धर्म

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को हाईकोर्ट से राहत

कानून, आस्था और लोकतंत्र की कसौटी

इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की गिरफ्तारी पर अंतरिम रोक का आदेश केवल एक व्यक्ति को मिली राहत नहीं है, बल्कि यह भारतीय लोकतंत्र में न्यायपालिका की भूमिका, नागरिक स्वतंत्रता और धार्मिक-समाजिक विमर्श की सीमाओं पर गंभीर बहस का अवसर भी है। जब कोई धार्मिक संत कानूनी कार्रवाई के दायरे में आता है और न्यायालय हस्तक्षेप करता है, तब मामला सिर्फ आरोप-प्रत्यारोप का नहीं रह जाता, वह संवैधानिक संतुलन की परीक्षा बन जाता है। इस संदर्भ में इलाहाबाद हाईकोर्ट का आदेश यह संदेश देता है कि कानून सबके लिए एक समान है, चाहे वह साधु-संत हों या आम नागरिक और समानता का अर्थ केवल दंड नहीं, बल्कि समान प्रक्रिया भी है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय का यह निर्णय मूलतः ‘प्रक्रिया’ को ‘दंड’ से ऊपर रखने का संकेत है। भारतीय न्याय व्यवस्था का आधारभूत सिद्धांत है कि किसी भी व्यक्ति को दोष सिद्ध होने से पहले अपराधी नहीं माना जा सकता। यदि न्यायालय को प्रथमदृष्टया यह प्रतीत होता है कि गिरफ्तारी की कार्रवाई में प्रक्रिया का उल्लंघन हुआ है, या जांच निष्पक्षता की कसौटी पर खरा नहीं उतर रही, तो वह अंतरिम राहत दे सकता है।यह राहत अंतिम निर्णय नहीं होती, बल्कि यह सुनिश्चित करने का माध्यम होती है कि न्यायिक प्रक्रिया के दौरान किसी के मौलिक अधिकारों का अनावश्यक हनन न हो। यही कारण है कि अदालतें अक्सर कहती हैं, “जेल अपवाद है, जमानत नियम।”

यह मामला तीन प्रमुख संदेश देता है- कानून की प्रक्रिया सर्वोपरि है, न्यायपालिका नागरिक स्वतंत्रता की संरक्षक है और धार्मिक नेतृत्व को भी संवैधानिक दायरे में रहकर आचरण करना चाहिए। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद देश के प्रमुख धार्मिक व्यक्तित्वों में गिने जाते हैं। वे केवल आध्यात्मिक मंचों तक सीमित नहीं रहे, बल्कि कई सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर मुखर रहे हैं। ऐसे में उनके विरुद्ध कोई भी कानूनी कार्रवाई स्वतः ही सार्वजनिक विमर्श का विषय बन जाती है। भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में धर्म और राजनीति के बीच की रेखा अक्सर धुंधली हो जाती है। धार्मिक नेताओं के वक्तव्य लाखों अनुयायियों को प्रभावित करते हैं, और राजनीतिक दल भी ऐसे प्रभावों से अछूते नहीं रहते। इसलिए जब किसी धर्मगुरु पर कार्रवाई होती है, तो उसके कानूनी पहलू के साथ-साथ सामाजिक-राजनीतिक निहितार्थ भी सामने आते हैं। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19 नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है। किंतु यह स्वतंत्रता निरपेक्ष नहीं है। सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और राज्य की सुरक्षा जैसे आधारों पर इस पर युक्तिसंगत प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। यदि किसी बयान या गतिविधि को प्रशासन कानून-व्यवस्था के लिए खतरा मानता है, तो वह कार्रवाई कर सकता है, परंतु वही कार्रवाई न्यायिक समीक्षा के दायरे में भी आती है। यहीं न्यायपालिका संतुलन स्थापित करती है, क्या कथित अपराध इतना गंभीर था कि तत्काल गिरफ्तारी आवश्यक थी? क्या नोटिस देकर पूछताछ संभव थी? क्या आरोपी के भागने या साक्ष्य नष्ट करने की आशंका थी? यदि इन प्रश्नों के उत्तर संतोषजनक नहीं होते, तो गिरफ्तारी पर रोक स्वाभाविक है। विगत वर्षों में कई संवेदनशील मामलों में उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय ने नागरिक स्वतंत्रताओं की रक्षा में सक्रिय भूमिका निभाई है। इससे न्यायपालिका पर जनता का विश्वास बढ़ा है। जब कार्यपालिका की कार्रवाई पर सवाल उठते हैं, तब न्यायालय एक ‘संवैधानिक संरक्षक’ की भूमिका निभाता है। इस तरह के धार्मिक विषयों को लेकर मीडिया की बड़ी अहम भूमिका होती है। इन धार्मिक भावनाओं वाले, संवेदनशील विषयों को लेकर मीडिया को चाहिए कि वह इस मामले को सनसनीखेज बनाने के बजाय तथ्यात्मक और संतुलित दृष्टिकोण से प्रस्तुत करे। धार्मिक भावनाओं को भड़काने या राजनीतिक लाभ-हानि के चश्मे से देखने से समाज में अनावश्यक ध्रुवीकरण बढ़ सकता है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट का अंतरिम आदेश अंतिम फैसला नहीं है। अंतिम निर्णय तथ्यों, साक्ष्यों और कानूनी दलीलों के आधार पर होगा। लेकिन यह आदेश हमें याद दिलाता है कि भारतीय लोकतंत्र में अभी भी संस्थाएँ सक्रिय और सजग हैं।भारत एक ऐसा राष्ट्र है जहाँ आस्था और संविधान साथ-साथ चलते हैं। यदि आस्था को कानून से ऊपर रखा जाएगा, तो अराजकता फैलेगी और यदि कानून को आस्था के प्रति असंवेदनशील बनाया जाएगा, तो सामाजिक असंतोष बढ़ेगा। इसलिए संतुलन आवश्यक है। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को मिली यह राहत उसी संतुलन की एक कड़ी है। यह न तो किसी की पूर्ण विजय है, न किसी की पराजय, यह केवल न्यायिक प्रक्रिया की एक अवस्था है।लोकतंत्र की असली शक्ति यही है कि यहाँ अंतिम निर्णय अदालत में होता है, सड़कों पर नहीं।

लेखक -@ शाश्वत तिवारी 

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