मायावती की सक्रियता से पीडीए हो सकता है कमजोर- अशोक कुमार मिश्र

बसपा अध्यक्ष मायावती की सक्रियता से सपा अध्यक्ष अखिलेश का पीडीए कमजोर हो सकता है। 9 अक्टूबर को कांसीराम जी की पुण्य तिथि पर बसपा अध्यक्ष ने लखनऊ में रैली कर राजनीतिक दलों को बता दिया कि अभी भी उत्तर प्रदेश के दलित उनके ही साथ है।
मायावती की रणनीति, अखिलेश के पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) से डी (दलित) एवं ए (अल्पसंख्यक) गायब करना है। उत्तर प्रदेश में इस समय विपक्ष की मुख्य भूमिका में समाजवादी पार्टी है। इसके अध्यक्ष अखिलेश यादव को लगता है कि उन्होंने यदि पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) को अपना बना लिया तो 2027 में उनकी सरकार बन सकती है। उत्तर प्रदेश के राजनीति में मायावती पिछले करीब 10 सालों से निष्क्रिय थी। उनकी इसी निष्क्रियता के कारण पिछले विधानसभा चुनाव में उनको प्रदेश की 403 सीट में से मात्र एक सीट मिली थी। वह भी कहा जाता है कि उमाशंकर सिंह ने अपने काम के बल पर बलिया की रसड़ा विधानसभा सीट जीती थी। मायावती की इसी निष्क्रियता को देखते हुए समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने दलित वोटो पर डोरे डालने शुरू कर दिए थे। उनको लगता है कि यादव मुस्लिम के साथ यदि दलित वोट जुड़ जए तो उनकी सरकार बन सकती है। मायावती ने 9 अक्टूबर को लखनऊ में विशाल रैली कर उनकी यह हवा निकाल दी। यह रैली मान्यवर कांशीराम जी स्मारक स्थल इको गार्डन में हुआ।
इस रैली में बड़ी संख्या में कार्यकर्ता और समर्थक नीली पगड़ी-गमछा, हाथ में नीला झंडा के साथ मौजूद थे। पार्टी की ओर से कहा गया कि यह सिर्फ रैली नहीं, बल्कि पार्टी के पुनरुत्थान की दिशा में एक संकेत है, खासतौर पर 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की दृष्टि से।बहुजन समाज पार्टी एक समय उत्तर प्रदेश में बड़ी ताकत थी, लेकिन पिछली कई विधानसभा एवं लोकसभा चुनावों में उसके प्रदर्शन में गिरावट आई है। इस रैली में यह संकेत मिला कि मायावती संगठन-पुनर्गठन पर जोर दे रही हैं। मायावती को लगता है कि यदि दलित उनके साथ बने रहे तो कुछ अल्पसंख्यक भी उनके साथ जुड़ जाएंगे। उत्तर प्रदेश की सत्तारूढ़ भाजपा भी यही चाहती है कि यहां मुस्लिम व दलित वोट में बटवारा हो व अगली सरकार उसकी ही बने। दिलचस्प बात यह है कि मायावती ने वर्तमान बीजेपी सरकार को आंशिक रूप से धन्यवाद दिया कि बसपा द्वारा बनाये गए स्मारक-उद्यान आदि के रख-रखाव में उनके द्वारा अच्छे कदम उठाये गये हैं। इस तरह उन्होंने संवाद को सियासी विरोधी-ध्रुव पर ही नहीं रखा बल्कि थोड़ा नरम भी किया। 2027 में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की दृष्टि से यह रैली एक ‘शुरुआती कदम’ के रूप में देखा जा रहा है। बसपा ने संगठनात्मक बैठकों-मंडलों की प्रक्रिया तेज कर दी है, तथा “भाइचारा समितियों” जैसे सूक्ष्म लेवल संगठन को पुनर्सक्रिय कर दिया है।
मायावती ने समाजवादी पार्टी व कांग्रेस के प्रति आक्रामक है जबकि भाजपा के प्रति नरम। मायावती “सिंगल पार्टी मोड में” चुनाव लड़ना चाहती हैं। भाजपा भी चाहती है कि मायावती अकेले ही चुनाव लड़े ताकि दलित व अल्पसंख्यक वोट बट सके। मायावती जब तक सक्रिय नहीं होगी, तब तक यह संभव नहीं है। मायावती की सक्रियता ही भाजपा के लिए फायदेमंद है।
उत्तर प्रदेश में सवर्ण वोट भाजपा के साथ है।दलितों में सोनकर व पासी सहित कुछ जातियां उनके साथ है। पिछड़ों में शाक्य, सैनी, कुशवाहा, मौर्य के साथ कुछ अन्य पिछड़ी जातियां भी भाजपा के साथ जुड़े हैं। सरकार में रहते हुए कुछ अन्य पिछड़ों को भी अपना बनाने में भाजपा जुटी है। उत्तर प्रदेश सरकार ने पहली बार वित्तीय वर्ष 2025-26 से सितंबर माह में ही छात्रवृत्ति वितरण का प्रारंभ किया है। पहले चरण में लगभग ₹62.13 करोड़ की धनराशि व्यय कर 2.5 लाख से अधिक अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के कक्षा 9 से 12 तक के छात्रों को लाभान्वित किया जा चुका है। वहीं, द्वितीय चरण में शुक्रवार को ₹126.68 करोड़ की धनराशि व्यय कर 4.83 लाख से अधिक छात्रों को लाभान्वित किया जाएगा। प्रदेश के पिछड़ा वर्ग कल्याण एवं दिव्यांगजन सशक्तिकरण राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) नरेन्द्र कश्यप बताते हैं कि जब प्रदेश का युवा शिक्षित होगा तभी विकसित भारत-विकसित उत्तर प्रदेश के ‘शताब्दी संकल्प-2047’ को साकार किया जा सकेगा। राज्य सरकार का लक्ष्य है कि कोई भी प्रतिभाशाली छात्र आर्थिक अभाव के कारण शिक्षा से वंचित न रहे। प्रदेश सरकार ने वंचित एवं कमजोर आय वर्ग के छात्रों के शैक्षिक उन्नयन हेतु छात्रवृत्ति और शुल्क प्रतिपूर्ति की प्रक्रिया को तेज, पारदर्शी और पूर्णतः डिजिटल बनाया है। इसी के तहत वित्तीय वर्ष 2025-26 में पहली बार सितंबर माह से ही छात्रवृत्ति वितरण प्रारंभ किया गया है।
वर्ष 2016-17 में पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग का बजट ₹1295 करोड़ था, जिसे बढ़ाकर वर्तमान वित्तीय वर्ष 2025-26 में ₹3124.45 करोड़ कर दिया गया है। यानी यह 2.5 गुना से अधिक वृद्धि है। केवल छात्रवृत्ति एवं शुल्क प्रतिपूर्ति योजनाओं के बजट में भी उल्लेखनीय बढ़ोत्तरी की गई है। वर्ष 2016-17 में यह ₹1092.36 करोड़ था, जो अब बढ़कर ₹2825 करोड़ हो गया है। छात्रवृत्ति का वितरण अब पूरी तरह ऑनलाइन व डीबीटी के माध्यम से आधार-संलग्न बैंक खातों में किया जा रहा है, जिससे प्रक्रिया में पारदर्शिता और त्वरितता दोनों बढ़ी हैं।भारतीय जनता पार्टी की रणनीति है कि दलित वोट बसपा को मिले तथा पिछड़े व अल्पसंख्यक वोट में बंटवारा हो, जिससे उसकी सरकार बन सके।




