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संयुक्त राष्ट्र अभी भी 1945 पर अटका हुआ, सुधार की जरूरतः जयशंकर

नई दिल्ली।विदेश मंत्री डॉ. एस जयशंकर ने 16 अक्टूबर को यहां आयोजित संयुक्त राष्ट्र सैन्य योगदान देने वाले देशों के सम्मेलन (यूएनटीसीसी) में हिस्सा लिया। इस दौरान विदेश मंत्री ने एक बार फिर संयुक्त राष्ट्र में सुधार की मांग करते हुए कहा कि आज का संयुक्त राष्ट्र भी 1945 के समय को दर्शाता है। उन्होंने कहा कि यूएन को विकासशील देशों की आवाज बुलंद करनी चाहिए और इस पर ही यूएन की विश्वसनीयता टिकी है। 15 अक्टूबर को शुरू हुए इस तीन दिवसीय सम्मेलन में 32 सैन्य योगदानकर्ता देशों के वरिष्ठ सैन्य नेतृत्व के साथ ही संयुक्त राष्ट्र के वरिष्ठ अधिकारी भी शामिल हुए हैं।सम्मेलन को संबोधित करने के बाद विदेश मंत्री ने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर लिखा नई दिल्ली में संयुक्त राष्ट्र सैन्य योगदान देने वाले देशों के प्रमुखों के सम्मेलन को संबोधित करते हुए मुझे खुशी हो रही है। संघर्षों की बदलती प्रकृति और बदलती भू-राजनीतिक गतिशीलता के कारण शांति स्थापना की बढ़ती मांगों पर बात की। वैश्विक शांति स्थापना के लिए एक नए दृष्टिकोण को आकार देने हेतु सामूहिक, रचनात्मक और सर्वसम्मति से कार्य करने की भारत की प्रतिबद्धता को रेखांकित किया।विदेश मंत्रालय के बयान के अनुसार इस दौरान जयशंकर ने कहा संयुक्त राष्ट्र आज भी 1945 की वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित करता है, 2025 की नहीं। 80 वर्ष एक लंबी समयावधि है और इस दौरान संयुक्त राष्ट्र के सदस्यों की संख्या वास्तव में चौगुनी हो गई है। दूसरी बात, जो संस्थाएं बदलाव करने में विफल रहती हैं, उनके अप्रासंगिक होने का खतरा रहता है।

संयुक्त राष्ट्र के प्रभावी बनाने के लिए इसे सुधारना होगा, इसे अधिक समावेशी, लोकतांत्रिक, सहभागी और आज की दुनिया का प्रतिनिधि बनाना होगा।जयशंकर ने शांति अभियानों को लेकर सामूहिक विचार के लिए कुछ चिंताएं जाहिर करते हुए कहा शांति अभियानों के अधिदेश तैयार करते समय सैन्य योगदानकर्ता देशों के साथ-साथ मेजबान देशों से भी परामर्श किया जाना चाहिए। शांति अभियान तभी प्रभावी हो सकता है, जब अधिदेश मिशनों को आवंटित संसाधनों के अनुरूप हों। ये अधिदेश हमेशा यथार्थवादी और स्पष्ट होने चाहिए। नागरिकों की सुरक्षा की प्राथमिक जिम्मेदारी अभी भी मेजबान देश की है। भारत शांति अभियानों की परिचालन क्षमता को बढ़ाने के लिए एक प्रौद्योगिकी प्रदर्शक बनने के लिए तैयार है। रणनीतिक संचार की जरूरतों को पूरा करने के लिए, हमें गलत सूचनाओं और भ्रामक सूचनाओं का मुकाबला करने का प्रयास करना चाहिए। सर्वोपरि महत्व शांति सैनिकों की सुरक्षा और संरक्षा पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए।
(रिपोर्ट. शाश्वत तिवारी)

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