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मिर्जापुर

सिंचाई और बाढ़ नियंत्रण के लिए बना अहरौरा बांध,मछली मारने व खेती किसानी की चढ़ा भेंट


तारा त्रिपाठी (मीरजापुर)।प्राकृतिक सौन्दर्यता की गोंद मे बसा अहरौरा तीन ओर से पहाड़ों से घिरा है।बांध बनने से पहले बरसात का पानी जब रौद्र रुप धारण करता  तो मैदानी क्षेत्र में तवाही मचा देता और बांध के तलहटी के मैदानी क्षेत्र के गांव की फसल ही नहीं घर परिवार को भी ले डूबता ।इसके पानी का तांडव वहां तक होता था जहां तक जाता था। रास्ते के हजारों एकड़ खेत खलिहान व बेलखरा, भगवानपुुर मदारपुर,मदापुर, लकुरा बीबी पोखर, हुसेनपुर, बिक्सी, जफराबाद, डूहीं मनउर, ढेलवासपुर, जमालपुर से लेकर चंदौली तक के सैकड़ों गावों को अपने आगोश में लेकर नष्ट कर देता था। आदमी तो आदमी पशुओं को भी बाढ़ की विभीषिका में अपने जान से हांथ धोना पड़ता था। बर्बादी के ऐसे मंजर को देखते हुए तीन ओर पहाड़ों से घिरे इस स्थल को एक ओर से बांधकर बांध बनाने के निर्णय को धरातल पर उतारे का निर्णय लिया गया। भारत के प्रथम पंचवर्षीय योजना के अन्तर्गत पंoकमला पति त्रिपाठी के सफल प्रयास से 1954 में अहरौरा बांध का निर्माण कराया गया। तीन तरफ पहाड़ों से घिरे इस स्थल को एक तरफ से पाट कर बांध का स्वरूप प्रदान किया गया और पूरब दक्षिण की तरफ पानी छोड़ने के लिए सुलूस तथा पश्चिम उत्तर की तरफ 23फाटक बनाये गये। बांध के ऊपरी छोर पर ठहरने तथा बांध के नियन्त्रण के लिए एक डाक बंगला का भी निर्माण कराया गया।
          बांध के निर्माण का मुख्य उद्देश्य तो सिंचाई और बाढ़ के नियन्त्रण के लिए कराया गया और यह काफी हद तक अपने उद्देश्य में सफल भी रहा। बरसात के समय अचानक होने वाले घनघोर बारिश से उसके आगोश में आने वाले सैकड़ों गावों को राहत मिल गई। समय-समय पर सिंचाई के लिए इसके फाटक खोले जाते और जब सिंचाई का कार्य पूर्ण हो जाता तो इसे बन्द कर दिया जाता। स्थानीय स्तर पर भी बांध के खाली होने पर पट्टे पर दी गई इसकी जमीन पर आस पास के किसान खेती का काम करके अपनी जीविका चलाते हैं। बांध की भूमि पर चना, मटर, सरसो, तीसी, मक्का, बाजरा की खेती के साथ सब्जी उगा कर लाभ कमाने वाले किसान फलते-फूलते हैं। खरबूजा, टमाटर खूब पैदा होता है। सवाल तो यह उठता है कि जब बांध खाली अवस्था में हो तब उसकी जमीन का लाभ उठाया जाए और यही नियम भी बनाया गया है।
          बांध की सम्भरण क्षमता 360 फीट की है। जब जल स्तर 360 के ऊपर जाय उसके पहले ही बांध के फाटक को खोलने की मजबूरी है और ऐसा होता भी है ऐसी दशा में उसके आगोश मेंआने वाले सैकड़ों गांव प्रभावित हो जाते हैं फिर बांध के फाटक बन्द करने और बाढ़ से लोगों को तथा पानी के दबाव से बांध को बचाने की भी कवायद शुरू हो जाती है। कभी भारतीय किसान यूनियन के लोग तो कभी जनप्रतिनिधि तो कभी मंत्री का फरमान अधिकारियों को सांसत मे डाल देता है।
अवर्षण के कारण जब बांध भर नहीं पाता और उसकी अधिकांश जमीनें खाली रह जातीं हैं तो बांध के समीपवर्ती गांंव लतीफपुर, हिनौता, नूरनपुर, फुलवरिया, जमैयतपुर, शीऊर, बेलखरा, भगवानपुुर, श्रीरामपुर, कटरा, बउलिया, पट्टीकलां मानिकपुर, खुथहवा के किसान बांध की खाली जमीन पर खेती कर भारी लाभ उठाते हैं। ठेके पर दिये मछली मारने का काम तो होता ही है ऊपर से समीपवर्ती गांंव के लोग भी मछली मार कर खाते हैं व कमाने का भी काम करते हैं। सिंचाई और बाढ़ नियंत्रण के उद्देश्य बना यह बांध मछली मारने व खेती किसानी की भेंट चढ़ चुका है। अवर्षण और सूखे के कारण पिछले लगभग दस वर्षो से अधिकांश खाली हिस्से पर कृषि कार्य होता रहा और बचे हुए गर्भ के पानी में मछली मारने कार्य होता रहा। किसान और मछली के ठेकेदार ही नहीं अधिकारी भी मालामाल होते रहे। इस बार भारी वर्षा के कारण बांध पूरी तरह भरा ही नहीं बल्कि ओवरफ्लो पर इसे खोलना पड़ा। ऐसे में एक दिन जिलाधिकारी महोदय का अहरौरा बांध पर आगमन हुआ उन्होंने सिंचाई विभाग के अधिकारियों को कई निर्देश दिए ।जाते जवाते उन्होंने कहा कि ओवरफ्लो की स्थिति में ही बांध के फाटक खोला जाए। बांध के जलस्तर को हमेशा बनाए रखा जाए। इन तमाम आदेश के बाद भी बांध का जलस्तर 355-56होने पर भी बांध के फाटक को खोले जाने का औचित्य समझ के परे है। जन चर्चा है कि स्थानीय किसानो व मछली मारने वालों से सांठ-गांठ करके बांध के फाटक खोलकर पानी अनावश्यक रूप से बहाया जा रहा है। अधिकारियों को बांध के उद्देश्य की चिन्ता न होकर बांध खाली करके खेती-किसानी कराने और मछली मरवाने में अधिक रुचि है। यह गहन जांच का विषय है। जांचोंपरान्त दोषी के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की आवश्यकता है।

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