
गुरुपूर्णिमा पर पातालपुरी मठ ने मिटा दिये सारे भेद, जहां राम हैं, वहां कोई भेद नहीं
सुशील कुमार मिश्र/ वाराणसी। कहीं धर्म पूछकर आतंकी गोली मार रहे हैं, जाति के नाम पर उपद्रव किये जा रहे हैं, वहीं काशी ने इस नफरत के माहौल में फिर से प्रेम, शांति और रिश्तों की एकता का संदेश पूरी दुनियां को दिया। काशी स्थित रामानन्दी सम्प्रदाय के प्राचीन पातालपुरी मठ में भारत के सांस्कृतिक एकता की खूबसूरत तस्वीर दिखाई दी। जब मुस्लिम महिलाएं पातालपुरी मठ के पीठाधीश्वर जगद्गुरु बालक देवाचार्य जी महाराज की आरती उतारी और तिलक लगाकर स्वागत सम्मान किया। मुस्लिम बन्धुओं ने जगद्गुरु को रामनामी अंगवस्त्रम् ओढ़ाकर सम्मानित किया। धर्म जाति से ऊपर उठकर अपने गुरु के प्रति सम्मान व्यक्त करने का सबसे बड़ा त्योहार है गुरुपूर्णिमा। यह गुरु और शिष्य के रिश्ते को मजबूत करने वाला है। पातालपुरी मठ भारत की महान गुरु परम्परा का गवाह बना। सैकड़ों की संख्या में मुस्लिमों ने गुरुदीक्षा लेकर देश के लिए जीने की शपथ ली। भगवान राम के रास्ते पर चलकर ही देश और परिवार के लिए त्याग किया जा सकता है। यही जगद्गुरु का संदेश है।दीक्षा पाकर शहाबुद्दीन तिवारी, मुजम्मिल, फिरोज, अफरोज, सुल्तान, नगीना, शमशुनिशा बहुत खुश थे। शहाबुद्दीन तिवारी ने कहा कि हमारे पूर्वज रामपंथी थे, इसी मठ के अनुयायी थे। भले ही हमारी पूजा पद्धति बदल गयी है लेकिन हमारे पूर्वज, परम्परा, रक्त और संस्कृति नहीं बदल सकती।
जो लोग नफरत फैलाएं, लेकिन हम तो उसी गुरु के पास जाएंगे जो हमारे जीवन को बदल सके। हम शांति चाहते हैं। नफरत को खत्म करके प्रेम को फैलाने वाला ही असली गुरु है।नौशाद अहमद दूबे ने कहा कि गुरु पीठ के प्रति श्रद्धा व्यक्त करना भारतीय संस्कृति का हिस्सा है। ज्ञान तो गुरु से ही मिलेगा, जिसके पास ज्ञान है फिर वहां भेद नहीं हो सकता।मुस्लिम महिला फाउण्डेशन की राष्ट्रीय अध्यक्ष नाज़नीन अंसारी ने कहा कि राम के रास्ते पर चलकर ही विश्व में शांति आ सकती है। गुरु के बिना राम तक नहीं पहुंचा जा सकता है। गुरु ही अंधकार से निकालकर प्रकाश की ओर ले जा सकता है। जगद्गुरु बालक देवाचार्य जी महाराज ने आदिवासी समाज के बच्चों को दीक्षित कर संस्कृति के प्रसार की जिम्मेदारी सौंपी। मुस्लिम समाज के लोगों को भी कहा भारत की महान संस्कृति को दुनियां के कोने-कोने तक पहुंचाएं और अपने पूर्वजों से जुड़े।




