भगवान शंकर ने ही गुरु के रूप में शंकराचार्य का रूप धरण किया: अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती

चमोली। ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामिश्री: अविमुक्तेश्वरानंद: सरस्वती ‘1008’ महाराज ने कहा कि शरणागत को कभी नहीं छोड़ना चाहिए। सनातन धर्म में शरणागत की रक्षा जरूरी है।पूज्य शंकराचार्य ने ज्योतिर्मठ में आयोजित धर्मसभा में ज्योतिर्मठ के प्रथम गुरु तोटकाचार्य के बारे में बताते हुए कहा कि जटा वाले शंकर को तो आपने देखा होगा लेकिन मुंडित सिर वाले शंकर को कभी नहीं देखा होगा। मुंंडित सिर वाले शंकर ही आदि गुरु शंकराचार्य हैं।वेद में कहा गया शंकर ने ही गुरु के रूप में शंकराचार्य का रूप धारण किया।वह जब धरती पर अवतरित हुए तो चार वेद साथ लेकर आए और वह भी चलाएमान मूर्ति के रूप में उनके चार शिष्य ही ४ वेद हैं।अपने 9 दिवसीय ज्योतिर्मठ प्रवास पर पधारे शंकराचार्य महाराज ने सत्संग में उक्त बातें कहीं।शंकराचार्य पादुकापूजन सपत्नीक अभिषेक बहुगुणा ने की।सभा में उपस्थित रहे सर्वश्री विष्णुप्रियानन्द ब्रह्मचारी,शिवानन्द उनियाल,शिवानन्द महाराज,मनोज भट्ट,जगदीश उनियाल,महिमानन्द उनियाल,वैभव सकलानी,दीपेन्द्र नायक,राहुल साहू आदि उपस्थित रहे।
रिपोर्ट- संजय पाण्डेय




