(हास्य व्यंग) आदमी से बडे़ आदमी त कुकुरे नू बा : लेखक राम बहादुर राय

आदमी ही आदमी से दूर जा रहल बा
सोचऽ ई आदमी अब कहां जा रहल बा।
आदमी से बड़े आदमी त कुकुरे नू बा
ई कुकुरे आदमी के सवांग बन रहल बा।
आदमी अपना के सभ्ये आदमी कहता
तबो वृद्धाश्रम में ही ठूंसल जा रहल बा।
आदमी जेतने ही आधुनिक बन रहल बा
ओतने ही कु आदमी बनत जा रहल बा।
अपने फैसन में त ए .सी.में रहि रहल बा
बूढ़-पुरनियन के रोवें नू दागि रहल बा।
हई देखऽ तमासा अब का हो रहल बा
आदमी ना , कुकुरे के सेवा हो रहल बा।
जाड़ा – पाला में आदमी नइखे पूछात
देखऽ कुकुरे आछो-आछो हो रहल बा।
माई – बाप कोना में साटल जा रहल बा
कुकुरे कार, गोदी में ढ़ोवल जा रहल बा।
अब त कुकुरने के कोट पहिरावल जात बा
घर के बूढ़ के डांटि के रखल जा रहल बा।
ए भैया ई कइसन जमाना आ गइल बा
आदमी कुकुरो से भी नीचे जा रहल बा।
तबो ई आदमी आधुनिके कहा रहल बा
बुझाता कि लोग पसु से नीचे जा रहल बा।
अब त कुकुरो मिलि के रहे लागल बाड़न
बुझाता ई आदमी भी कुकुर हो गइल बा।
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9102331513




