कानपुरः नाजुक दौर से गुजर रहे हैं मुस्लिमः मुशाहिदी
"जश्न-ए-ग़ौसुल वरा और हमारी ज़िम्मेदारी" कार्यक्रम में जताई गई चिंता, मसलक को भुलाकर एक साथ बैठने पर दिया जोर
कानपुर। ‘उलमा व अहले सुन्नत मुशावरती बोर्ड‘ के तहत “जश्न-ए-ग़ौसुल वरा और हमारी ज़िम्मेदारी” कार्यक्रम में शहर काज़ी मौलाना मुश्ताक़ अहमद मुशाहिदी ने कहा कि मुस्लिम आज इतिहास के बहुत नाज़ुक दौर से गुज़र रहे हैं। ऐसे हालात में अपने ईमान का चिराग जलाए रखने के लिए हमें जो भी रास्ता मिलता है, वह इन्हीं सूफ़ियों और बुज़ुर्गों से मिलता है।
शहर काज़ी ने अपनी तकरीर में कहा कि मौजूदा हालात में कम से कम एक सोच (मसलक) के लोगों को अपने आपसी मतभेद भुलाकर एक साथ बैठना होगा। साथ ही ऐसे लोगों से बचना होगा जो सरकारी गुटों से अपने फ़ायदे के लिए मदद लेते हैं। आज ज़रूरत इस बात की है कि हम नबी (पैगंबर), उनकी औलाद, चारों ख़लीफ़ाओं और धर्म के बुज़ुर्गों के बताने और समझाने के तरीक़े को अपनाएं और आम लोगों को उनकी सीख (तालीम) से जोड़ें।
कार्यक्रम में बोर्ड के सचिव (सेक्रेटरी) हाजी मोहम्मद सलीस ने कहा कि एक तरफ़ इस्लाम से नफ़रत करने वाले अपनी साज़िशों में लगे हैं, तो दूसरी तरफ़ हम आपस में ही लड़ रहे हैं। आप देख रहे हैं कि आज के दौर में एक ख़ास समूह एक ख़ास सोच के साथ इस देश को ढालने में लगा है। वे हमारी नई पीढ़ी को अपने धर्म और संस्कृति में मिलाकर देशभक्ति के नाम पर हमारी ज़िंदगी से अल्लाह की एक होने की सोच (तौहीद), नबी पर भरोसा (रिसालत) और आख़िरत (क़यामत का दिन) के यक़ीन को ख़त्म कर देना चाहते हैं।
उन्होंने आगे कहा कि ऐसे हालात में हमें समझदारी से काम लेना होगा। आम मुसलमानों, ख़ास लोगों, उलमा और इमामों—सभी का ध्यान इन ख़तरों की तरफ़ खींचना होगा। कुछ ख़तरे ऐसे हैं जिन्हें कम पढ़े-लिखे लोग भी समझ लेते हैं, जैसे दंगे, जान-माल का नुक़सान, ग़रीबी और बेरोज़गारी। लेकिन कुछ ख़तरे ऐसे होते हैं जिन्हें सिर्फ़ वही लोग समझ पाते हैं जिन्हें ईश्वर ने सही समझ और धर्म की फ़िक्र दी है। वे इन छुपे हुए ख़तरों को महसूस करते हैं, जिसे सोचकर उनकी रातों की नींद उड़ जाती है।
लेकिन अगर ये ज़िम्मेदार लोग दिल की आवाज़ और समाज की ज़रूरत को छोड़कर अपने निजी फ़ायदे, दिखावे, नाम कमाने और ताक़त पाने के लालच में पड़ जाएं, तो पूरे समाज की किस्मत पर तबाही की मोहर लग जाती है। हमें इस्लाम के ख़िलाफ़ उठने वाली हर साज़िश और ग़लत विचारों का डटकर सामना करना होगा, तभी हम शेख़ मुहीउद्दीन अब्दुल क़ादिर जीलानी के सच्चे चाहने वाले कहलाएंगे।
आख़िर में दुआ और फ़ातिहा के साथ कार्यक्रम ख़त्म हुआ। इस मौक़े पर मुख्य रूप से मौलाना सैफ़ुल हशमत, सैयद अयाज़ अली एडवोकेट, सैयद मोहम्मद अतहर क़ादरी और सैयद शहंशाह आलम मौजूद रहे।



