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International News यूएन में बोला भारत – बिना स्पष्ट रणनीति वाले शांति मिशन संसाधनों की बर्बादी

न्यूयॉर्क। संयुक्त राष्ट्र के मंच पर शांति स्थापना अभियानों के सभी पहलुओं की व्यापक समीक्षा पर आयोजित वार्षिक बहस के दौरान भारत ने अपनी वैश्विक कूटनीतिक और सैन्य ताकत का पुरजोर प्रदर्शन किया। संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी मिशन के सैन्य सलाहकार, कर्नल तरुणेंद्र प्रताप सिंह ने इस महत्वपूर्ण सत्र में भारत का पक्ष रखा। उन्होंने वैश्विक शांति के लिए भारत के ऐतिहासिक योगदान को रेखांकित करने के साथ-साथ शांति मिशनों की विश्वसनीयता और उनके औचित्य को लेकर बेहद खरी-खरी बातें कहीं।
यूएन में भारत के स्थायी मिशन के अनुसार, अपने संबोधन की शुरुआत में कर्नल तरुणेंद्र ने दुनिया भर में शांति स्थापित करने के प्रयास में अपने प्राणों की आहुति देने वाले शहीद शांति सैनिकों (ब्लू हेलमेट्स) को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की। भारत के विशाल योगदान का प्रामाणिक ब्यौरा देते हुए उन्होंने बताया कि भारत अब तक 50 शांति अभियानों में 3,00,000 से अधिक सैनिकों की तैनाती कर चुका है, जो इसे वैश्विक स्तर पर सबसे बड़ा सैन्य योगदानकर्ता देशों में से एक बनाता है। उन्होंने बेहद भावुक क्षण में यह भी रेखांकित किया कि इन अभियानों के दौरान 184 भारतीय शांति सैनिकों ने अपना सर्वोच्च बलिदान दिया है, जो वैश्विक शांति के प्रति भारत की जमीनी प्रतिबद्धता का प्रमाण है।

सैन्य सलाहकार ने शांति सैनिकों की सुरक्षा का मुद्दा उठाते हुए बेहद कड़ा रुख अपनाया। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि शांति सैनिकों पर हमला करने वाले तत्वों को वैश्विक स्तर पर जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए। कर्नल तरुणेंद्र ने याद दिलाया कि इस दिशा में भारत का रुख कितना स्पष्ट रहा है, जो संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) के प्रस्ताव 2589 को पारित कराने में भारत के सफल और दृढ़ नेतृत्व से साफ झलकता है। यह प्रस्ताव शांति सैनिकों के खिलाफ होने वाले अपराधों की जवाबदेही तय करने पर केंद्रित है।

इसके साथ ही कर्नल तरुणेंद्र ने संयुक्त राष्ट्र के मौजूदा शांति मिशनों के क्रियान्वयन को अधिक व्यावहारिक बनाने की वकालत की। उन्होंने कहा कि इन अभियानों को तार्किक और तर्कसंगत बनाना आज के समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। उनका स्पष्ट मानना था कि ऐसे अभियान जिनका कोई ठोस परिचालन आधार या स्पष्ट रणनीतिक परिणाम न हो, वे केवल बहुमूल्य संसाधनों की बर्बादी करते हैं। इतना ही नहीं, बिना किसी ठोस आधार के लंबे समय तक चलने वाले ये मिशन संयुक्त राष्ट्र के शांति स्थापना अभियानों की साख और उसकी विश्वसनीयता को भी गंभीर रूप से कम करते हैं।
(रिपोर्ट. शाश्वत तिवारी)

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