ईमान, सब्र, कुर्बानी और हक के लिए डट जाने का संदेश देता है मोहर्रम
मोहर्रम से होता है इस्लामी हिजरी के नए साल का आगाज विशेष सम्मान और पवित्रता वाले हैं महीनों में है मोहर्रम इमाम हुसैन और उनके जानिसारों ने शहादत दे दी लेकिन दीन के उसूलों पर कोई समझौता नहीं किया
कानपुर/फतेहपुर। मोहर्रमुल हराम के साथ ही इस्लामी हिजरी के नए साल का आगाज हो गया। इस महीने की इस्लाम में बहुत फजीलत है। हजरत इमाम हुसैन और उनके 72 जानिसारों की कर्बला में शहादत से पहले तमाम वाक्यात इस महीने में हुए थे। दस मोहर्रम को यौमे आशूरा कहा जाता है। इस बारे में मौलाना आमिर मियां सफवी मिस्बाही ने बताया कि यह महीना हमें नए साल के आगाज का अहसास नहीं कराता बल्कि ईमान, सब्र, कुर्बानी और हक के लिए डट जाने का संदेश देता है।
उन्होंने ने बताया कि अल्लाह ने कुरान में फरमाया कि कुछ महीने उसकी बारगाह में विशेष सम्मान और पवित्रता वाले हैं जिनमें मोहर्रम भी है। रसूले पाक ने फरमाया कि हजरत हसन और हजरत हुसैन उम्मत नौजवानों के सरदार हैं। यह सिर्फ़ एक फ़ज़ीलत नहीं, बल्कि उम्मते मुस्लिमा के लिए यह संदेश भी है कि अहले बैत से मुहब्बत ईमान का हिस्सा है। हज़रत इमाम हसन और हज़रत इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हुमा नबी-ए-करीम के नवासे हैं, जिनसे मोहब्बत करना दरअसल रसूलुल्लाह से मोहब्बत करना है। करबला की सरज़मीन पर इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हु ने अपने घराने और साथियों के साथ जो कुर्बानी पेश की, उसका मक़सद सत्ता या दुनिया हासिल करना नहीं था, बल्कि दीन-ए-इस्लाम की हिफ़ाज़त, इंसाफ़ की स्थापना और ज़ुल्म के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद करना था। जब यज़ीदी ताक़तें हक़ को दबाने पर आमादा थीं, तब इमाम हुसैन ने अपने ख़ून से यह साबित कर दिया कि मुसलमान सिर तो कटा सकता है, मगर ज़ालिम के सामने अपना ज़मीर नहीं बेच सकता।
मौलाना ने कहा कि करबला हमें सिखाती है कि हक़ की राह आसान नहीं होती, लेकिन अल्लाह के नेक बंदे मुश्किलों और मुसीबतों के बावजूद सच्चाई का दामन नहीं छोड़ते। इमाम हुसैन और उनके वफ़ादार साथियों ने भूख, प्यास और तमाम तकलीफ़ों को बर्दाश्त किया, मगर दीन के उसूलों पर कोई समझौता नहीं किया। मोहर्रम की शुरुआत पर हमें यह अहद करना चाहिए कि हम अपने दिलों में अहले बैत की मोहब्बत को और मज़बूत करेंगे, उनके किरदार को अपनी ज़िंदगी में अपनाएंगे और समाज में अमन, भाईचारे, इंसाफ़ और इंसानियत को बढ़ावा देंगे। करबला का पैग़ाम किसी एक तबके या समुदाय के लिए नहीं, बल्कि पूरी इंसानियत के लिए है। आइए, हम मोहर्रम के इस मुबारक और अज़मत वाले महीने में अपने ईमान को ताज़ा करें, नबी-ए-करीम, हज़रत इमाम हसन, हज़रत इमाम हुसैन और शोहदाए करबला से अपनी मुहब्बत का इज़हार करें तथा उनके बताए हुए रास्ते पर चलने का संकल्प लें।



