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विचार लेख

संपादकीय विश्लेषण….नक्सलवाद

बंदूक की विचारधारा का 25 मई 1967 से 2026 तक का सफर @-शाश्वत तिवारी

25 मई 1967 ये वो तारीख हैं, जब पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग जिले के एक छोटे से गांव नक्सलबाड़ी में किसानों और पुलिस के बीच हुई हिंसक झड़प ने भारत के इतिहास में एक ऐसे आंदोलन को जन्म दिया, जिसने आने वाले दशकों में देश की आंतरिक सुरक्षा, लोकतांत्रिक व्यवस्था, आदिवासी जीवन, विकास नीति और राजनीतिक विमर्श को गहराई से प्रभावित किया। इसी घटना के कारण इस आंदोलन का नाम पड़ा। आज, जब नक्सलबाड़ी आंदोलन के प्रारंभ को लगभग छह दशक पूरे हो रहे हैं, तब यह आवश्यक हो जाता है कि हम इस आंदोलन को केवल कानून-व्यवस्था की समस्या के रूप में न देखें, बल्कि इसके सामाजिक, आर्थिक, वैचारिक और राजनीतिक आयामों को भी समझें।नक्सलवाद केवल बंदूक उठाने की कहानी नहीं है; यह भारतीय लोकतंत्र के उन प्रश्नों की भी कहानी है, जिनका समाधान लंबे समय तक अधूरा रहा, भूमि सुधार, आदिवासी अधिकार, सामाजिक न्याय, प्रशासनिक उपेक्षा और विकास की असमानता। 1960 के दशक में पश्चिम बंगाल के ग्रामीण क्षेत्रों में भूमि असमानता चरम पर थी। बड़े जमींदारों और महाजनों के पास विशाल भूमि थी, जबकि किसान और आदिवासी समुदाय भूमिहीनता, शोषण और गरीबी से जूझ रहे थे। उस समय चीन की साम्यवादी क्रांति और Chinese Communist Revolution से प्रभावित भारतीय वामपंथ के भीतर एक कट्टरपंथी धड़ा उभर रहा था। इन नेताओं का मानना था कि भारत में संसदीय लोकतंत्र नहीं, बल्कि सशस्त्र क्रांति ही सामाजिक परिवर्तन का मार्ग है।इसी विचारधारा के प्रमुख चेहरों में चारु मजूमदार, कानू सान्याल और जंगल संथाल शामिल थे। 25 मई 1967 को जब पुलिस किसानों को हटाने पहुंची, तब हिंसा भड़क गई और एक पुलिस अधिकारी सहित कई लोग मारे गए। यह घटना प्रतीक बन गई उस विचारधारा की, जो राज्य सत्ता को “शोषक संरचना” मानती थी। नक्सलवाद मूलतः माओवादी विचारधारा से प्रेरित आंदोलन था। इसका आधार चीन के नेता माओ त्से तुंग की “दीर्घकालिक जनयुद्ध” की रणनीति थी। माओवाद का मूल सिद्धांत यह था कि ग्रामीण क्षेत्रों से सशस्त्र संघर्ष शुरू करके राज्य सत्ता को चुनौती दी जाए और अंततः क्रांति के माध्यम से सत्ता पर कब्जा किया जाए।भारत में नक्सलियों ने दावा किया कि लोकतांत्रिक संस्थाएं गरीबों और आदिवासियों को न्याय नहीं दे सकतीं। इसलिए उन्होंने चुनावी राजनीति को “धोखा” और हिंसक क्रांति को “एकमात्र रास्ता” बताया। यहीं से भारत के लोकतंत्र और नक्सलवाद के बीच वैचारिक संघर्ष शुरू हुआ। शुरुआत पश्चिम बंगाल से हुई, लेकिन धीरे-धीरे आंदोलन बिहार, झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र और तेलंगाना तक फैल गया। 1990 और 2000 के दशक में नक्सलवाद ने सबसे अधिक विस्तार किया। उस समय “रेड कॉरिडोर” शब्द प्रचलित हुआ, जो उन क्षेत्रों के लिए इस्तेमाल किया गया जहां नक्सलियों का प्रभाव था। इन इलाकों की एक समान विशेषता थी-आदिवासी बहुल क्षेत्र ,खनिज संपदा से भरपूर भूभाग, गरीबी और अशिक्षा ,प्रशासनिक उपेक्षा ,स्वास्थ्य और शिक्षा की खराब स्थिति नक्सलियों ने इन समस्याओं का लाभ उठाया। उन्होंने स्थानीय असंतोष को “क्रांति” का रूप दिया और युवाओं को हथियार उठाने के लिए प्रेरित किया।क्या केवल गरीबी नक्सलवाद का कारण थी? यह प्रश्न अक्सर पूछा जाता है कि क्या नक्सलवाद केवल गरीबी की उपज था?उत्तर है, नहीं। गरीबी एक कारण थी, लेकिन उससे अधिक महत्वपूर्ण कारण था “राज्य पर अविश्वास”। जब किसी गांव में स्कूल न हो, अस्पताल न हो, सड़क न हो, पुलिस केवल दमन के रूप में दिखाई दे और भ्रष्टाचार व्यवस्था को खोखला कर दे, तब अलगाव की भावना पैदा होती है। नक्सलियों ने इसी असंतोष को अपने पक्ष में इस्तेमाल किया। लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि समय के साथ आंदोलन अपने मूल सामाजिक एजेंडे से भटक गया। प्रारंभिक दौर में नक्सलवाद ने भूमि अधिकार, मजदूर शोषण और आदिवासी सम्मान जैसे मुद्दे उठाए। लेकिन धीरे-धीरे यह आंदोलन हिंसा, वसूली और समानांतर सत्ता की ओर बढ़ गया।

नक्सलियों ने:स्कूल भवन उड़ाए ,सड़क निर्माण रोका ,रेल लाइनें क्षतिग्रस्त कीं ,पंचायत प्रतिनिधियों की हत्या की आदिवासियों को “सूचना देने” के शक में मारा,सुरक्षा बलों पर घातक हमले किए । इस हिंसा का सबसे बड़ा शिकार वही गरीब और आदिवासी समुदाय बने, जिनके नाम पर आंदोलन शुरू हुआ था। सबसे बड़ा हमला और सुरक्षा चुनौती, भारत में नक्सली हिंसा ने हजारों लोगों की जान ली। दंतेवाड़ा नक्सली हमला में 76 सीआरपीएफ जवानों की हत्या ने पूरे देश को झकझोर दिया। इसके अलावा: झीरम घाटी हमला (2013) सुकमा हमले ,पुलिस और अर्धसैनिक बलों पर लगातार घात – इन घटनाओं ने दिखाया कि नक्सलवाद केवल वैचारिक आंदोलन नहीं, बल्कि गंभीर सुरक्षा चुनौती बन चुका था। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने नक्सलवाद को “देश की सबसे बड़ी आंतरिक सुरक्षा चुनौती” कहा था।सरकार ने नक्सलवाद से निपटने के लिए दोहरी रणनीति अपनाई: सुरक्षा अभियान ,विकास और पुनर्वास ,सुरक्षा अभियान ,केंद्रीय अर्धसैनिक बलों की तैनाती ,आधुनिक हथियार और ड्रोन निगरानी, खुफिया नेटवर्क मजबूत करना ,नक्सली ठिकानों पर अभियान ,विकास आधारित रणनीति ,सड़क और मोबाइल नेटवर्क, आदिवासी क्षेत्रों में स्कूल और स्वास्थ्य केंद्र ,वन अधिकार कानून ,कौशल विकास योजनाएं, आत्मसमर्पण और पुनर्वास नीति ,पिछले कुछ वर्षों में नक्सली घटनाओं में कमी आई है। कई जिलों में नक्सली प्रभाव घटा है। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या केवल सैन्य कार्रवाई से समस्या समाप्त हो सकती है?

लोकतंत्र की सबसे बड़ी परीक्षा

नक्सलवाद ने भारतीय लोकतंत्र के सामने एक गहरा प्रश्न रखा: क्या लोकतंत्र उन लोगों तक पहुंच पाया, जो सबसे अधिक वंचित थे? यदि लोकतंत्र केवल शहरों तक सीमित रहे और जंगलों में रहने वाले समुदाय खुद को व्यवस्था से अलग महसूस करें, तो उग्रवाद के लिए जमीन बनती है। इसीलिए नक्सलवाद के समाधान का अर्थ केवल हथियारबंद समूहों को समाप्त करना नहीं है; बल्कि उन कारणों को भी समाप्त करना है, जिनसे असंतोष पैदा होता है।

आदिवासी समाज की त्रासदी

नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में सबसे अधिक पीड़ा आदिवासी समाज ने झेली। एक ओर नक्सली उन्हें “क्रांति” के नाम पर इस्तेमाल करते रहे, दूसरी ओर विकास परियोजनाओं और खनन के कारण विस्थापन का डर बना रहा। एक राज्य की और दूसरी नक्सलियों की।उनकी वास्तविक समस्याएं थीं: जमीन के अधिकार ,वन संसाधनों पर नियंत्रण ,शिक्षा और स्वास्थ्य, सांस्कृतिक पहचान, रोजगार,यदि इन मुद्दों का संवेदनशील समाधान नहीं होगा, तो केवल सैन्य सफलता स्थायी शांति नहीं ला पाएगी। हाल के वर्षों में सरकार के आंकड़े बताते हैं कि नक्सली हिंसा में उल्लेखनीय कमी आई है। कई शीर्ष नक्सली मारे गए या गिरफ्तार हुए हैं। कई कैडर आत्मसमर्पण कर चुके हैं। तकनीक, सड़क निर्माण और प्रशासनिक पहुंच बढ़ने से नक्सलियों का प्रभाव सीमित हुआ है। लेकिन विचारधाराएं केवल बंदूक से समाप्त नहीं होतीं। जब तक सामाजिक असमानता, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और स्थानीय असंतोष मौजूद रहेंगे, तब तक किसी न किसी रूप में उग्रवाद की जमीन बनी रहेगी। 1967 में कुछ युवाओं ने यह मान लिया था कि बंदूक से समाज बदल जाएगा।लेकिन इतिहास ने दिखाया कि हिंसा अंततः विनाश ही लाती है। भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में परिवर्तन का सबसे प्रभावी माध्यम लोकतंत्र, संवाद और संवैधानिक व्यवस्था ही हो सकता है।आज देश के युवाओं को यह समझने की आवश्यकता है कि क्रांति का अर्थ केवल सत्ता के खिलाफ हथियार उठाना नहीं है।सच्ची क्रांति शिक्षा, नवाचार, सामाजिक सुधार और लोकतांत्रिक भागीदारी से आती है।

नक्सलबाड़ी से मिला सबक

विकास का अभाव सुरक्षा संकट बन सकता है। लोकतंत्र को अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाना आवश्यक है। आदिवासी और ग्रामीण क्षेत्रों की उपेक्षा खतरनाक हो सकती है। हिंसा कभी स्थायी समाधान नहीं देती। राज्य को केवल कठोर नहीं, संवेदनशील भी होना चाहिए। आज जब नक्सलबाड़ी आंदोलन की शुरुआत को लगभग 59 वर्ष हो चुके हैं, तब यह स्पष्ट दिखता है कि नक्सलवाद ने भारत को जितना नुकसान पहुंचाया, उससे कहीं अधिक पीड़ा उन गरीबों और आदिवासियों को मिली जिनके नाम पर यह आंदोलन शुरू हुआ था। यह भी सत्य है कि व्यवस्था की विफलताओं ने इस आंदोलन को जन्म दिया। लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि हिंसा ने समाधान नहीं दिया। भारत का लोकतंत्र अपूर्ण हो सकता है, धीमा हो सकता है, उसमें अनेक कमियां हो सकती हैं, लेकिन परिवर्तन की सबसे बड़ी संभावना इसी व्यवस्था में है।नक्सलबाड़ी की घटना हमें याद दिलाती है कि यदि समाज के किसी हिस्से को लंबे समय तक उपेक्षित छोड़ दिया जाए, तो असंतोष विस्फोट बन सकता है। इसलिए भारत को केवल नक्सलवाद समाप्त करने की नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण विकास, संवेदनशील शासन और भरोसेमंद लोकतंत्र बनाने की आवश्यकता है।क्योंकि अंततः किसी भी राष्ट्र की स्थिरता बंदूक से नहीं, बल्कि नागरिकों के विश्वास से तय होती है।

(लेखक: राजनीतिक विश्लेषक एवं यूपी के वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार)

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