घर की तलाश में भटकते नायक: ‘धुरंधर’ से ‘गाइड’ और ‘प्यासा’ तक

शाश्वत तिवारी
तमाम उठापटक के बाद धुरंधर का नायक जब अंत में घर लौटता है, तो यह किसी विजेता की वापसी नहीं होती। यह उस आदमी की वापसी है, जिसने अपने हिस्से की सारी कड़वाहट, पराजय और पीड़ाएँ भीतर समेट ली हैं। देहरी पर खड़ी उसकी देह में धूल है, थकान है, और उन सच्चाइयों का बोझ है, जिनसे भागना अब संभव नहीं। वह लौटता तो है, लेकिन ठहर नहीं पाता। क्योंकि लौट आना और ठहर पाना, दो बिल्कुल अलग अवस्थाएँ हैं। घर अब उसके लिए एक भौतिक जगह नहीं, बल्कि एक असहज स्मृति बन चुका है। कुछ लोग घर को छू सकते हैं, उसमें फिर से बस नहीं पाते। यहीं पर निर्देशक आदित्य धर का सिनेमा एक गहरे साझा बिंदु पर आकर जुड़ता है, जहाँ धुरंधर का क्लाइमैक्स अचानक विजय आनंद की गाइड और गुरुदत्त की प्यासा की स्मृतियों से संवाद करने लगता है। अगर धुरंधर का अंत एक असमंजस है, तो गाइड की शुरुआत एक स्पष्ट निर्णय। गाइड में देव आनंद द्वारा निभाया गया राजू, जेल से बाहर आने के बाद घर की ओर नहीं लौटता। यह उसका आवेग नहीं, बल्कि जीवन के तमाम अनुभवों का निचोड़ है। उसने प्रेम, छल, प्रसिद्धि और पतन, सब कुछ जिया है। उसका “घर” अब केवल एक जगह नहीं, एक ऐसा अतीत है, जो उसके लिए असहनीय हो चुका है। राजू का घर न लौटना दरअसल एक गहरी आत्म-स्वीकृति है। वह समझ चुका है कि लौटना केवल भौगोलिक प्रक्रिया नहीं, अपने पुराने स्वरूप में लौटना है, और वह उस स्वरूप को त्याग चुका है। वह भटकते-भटकते एक गाँव पहुँचता है, जहाँ परिस्थितियाँ उसे संत बना देती हैं, लेकिन यह संतत्व बाहरी है, भीतर वह पहले ही एक निर्णय ले चुका होता है। इसके ठीक विपरीत, प्यासा का विजय इस बहस को एक अलग दिशा देता है।
गुरुदत्त द्वारा अभिनीत विजय, एक असफल, उपेक्षित शायर, जब समाज द्वारा अस्वीकार किए जाने के बाद अचानक प्रसिद्धि और सम्मान पाता है, तो वह उसी क्षण उस समाज को ठुकरा देता है। यह कोई भावुक आवेग नहीं, बल्कि गहरी विडंबना से उपजा निर्णय है। जिस समाज ने उसे जीवनभर ठुकराया, वही उसकी “सफलता” पर उसे अपनाने को तैयार हो जाता है। विजय इस छल को पहचानता है और अपने ही लोगों, भाइयों, प्रेमिका, मित्र, सबको छोड़ देता है। वह चुनता है गुलाबो को, एक ऐसी स्त्री, जो समाज के हाशिए पर है, लेकिन भावनाओं में सबसे सच्ची है। वह उसके साथ भीड़, तालियों और मान्यता से दूर चला जाता है। यह भागना नहीं, बल्कि एक सजग और नैतिक चयन है, जहाँ “घर” की परिभाषा बदल जाती है। तीन नायक, तीन दिशाएँ, पर तीनों के भीतर एक ही खोज, एक ही पीड़ा: घर। धुरंधर का नायक लौटकर भी ठहर नहीं पाता, गाइड का राजू लौटता ही नहीं, और प्यासा का विजय घर की परिभाषा ही बदल देता है।इम्तियाज अली की फिल्म जब ‘हैरी मेट सेजल’ में इरशाद कामिल का लिखा एक गीत इस भाव को सटीक शब्द देता है।
“खाली है जो तेरे बिना, मैं वो घर हूँ तेरा…”
यह पंक्ति इन तीनों नायकों की आत्मा में उतरती प्रतीत होती है। आज की दुनिया में कितने ही लोग रोज़ी-रोटी, महत्वाकांक्षा या मजबूरी में अपने घरों से निकलते हैं, और फिर कभी सच में लौट नहीं पाते। समय के साथ घर केवल एक भौतिक स्थान नहीं रहता, बल्कि एक दूर होती स्मृति बन जाता है। ऐसे लोग धीरे-धीरे स्वयं एक “चलते-फिरते खाली घर” में बदल जाते हैं, जहाँ केवल यादें बसती हैं, और भीतर कहीं एक सूना आँगन लगातार गूंजता रहता है। इन तीनों किरदारों के अंत को देख, कहीं भीतर राजू गाइड की वह अनकही स्वीकृति गूंजती है, कि हर वापसी, घर नहीं होती।



