सीजेपी के प्रदर्शन को नहीं मिल रही हिंदी अखबारों में जगह
जंतर-मंतर पर चार दिनों से चल रहा है कॉक्रोच जनता पार्टी का प्रदर्शन
कानपुर। कॉक्रोच जनता पार्टी की शुरुआत चीफ जस्टिस सूर्यकांत की एक टिप्पणी से सोशल मीडिया पर हुई। देखते-देखते ही दस करोड़ से अधिक फॉलोवर हो गए। अमेरिका में पढ़ाई करने वाले अभिजीत दीपके ने कॉक्रोच जनता पार्टी का नाम दिया। इसके बाद उन्होंने नीट पेपर लीक के खिलाफ अभियान छेड़ दिया। अमेरिका से सीधे लौटते ही वह जंतर-मंतर में प्रदर्शन पर शामिल हुए। इसमें हजारों की संख्या में छात्र-छात्राएं और सियासी दलों के छात्र संगठन के कार्यकर्ता शामिल हुए। इसके बाद अन्य प्रदेशों में प्रदर्शन किया। 20 जून से अनिश्चितकालीन प्रदर्शन जंतर-मंतर पर चल रहा है लेकिन मुख्य समाचार चैनलों के अलावा राष्ट्रीय कह जाने वाले हिंदी अखबारों ने भी सीजेपी के प्रदर्शन का बायकॉट कर दिया।
सीजेपी के प्रदर्शन का मंगलवार को चौथा दिन है। मंगलवार को हिंदुस्तान, दैनिक जागरण, भास्कर और अमर उजाला ने सिंगल कॉलम में भी खबर नहीं दी है जबकि इस प्रदर्शन में शिक्षा और रोजगार के मुद्दे उठाए जा रहे हैं। सरकार छात्रों के प्रति गंभीर नहीं है। इसीलिए लखनऊ में एक कोचिंग में आग लगने से 15 बच्चों की मौत हो गई। छह जून और 20 जून को भी पर्यावरण विद् सोनम वानचुक भी प्रदर्शन में शामिल रहे। इसके अलावा कई फिल्मी हस्तियां भी कॉक्रोचों को अपना समर्थन दे चुकी हैं। लोग प्रदर्शनकारियों के लिए भोजन और पानी की भी व्यवस्था कर रहे हैं।
पढ़ने-लिखने वाले बच्चे हर घर में हैं। इसलिए कोई सहमत हो या असहमत लेकिन आवाज सबकी बननी चाहिए। यही सही मानो में पत्रकारिता है। 2014 के पहले भी सरकार के पक्ष में खबरें छपती थीं लेकिन अपनी इज्जत बचाकर। अब तो असहमति की कोई जगह मची नहीं है। हर अच्छे-बुरे फैसले को मास्टर स्ट्रोक बता दिया जाता है। सरकार की जवाबदेही खत्म हो गई। पीएम, सीएम और मंत्री तक प्रेस कांफ्रेंस से किनारा करने लगे।
यह सच है कि यह आंदोलन अन्ना जैसा व्यवस्थित नहीं है लेकिन इसकी भी मांग जायज है। वह यही तो मांग कर रहे हैं कि नीट पेपर लीक की जिम्मेदारी लेकर शिक्षा मंत्री इस्तीफा दे दें लेकिन रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह पहले ही कह चुके हैं कि इस सरकार में इस्तीफे नहीं होते हैं। पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी का एप्सटीन फाइल में नाम आया लेकिन इस्तीफा नहीं हुआ।
सीजेपी भी प्रदर्शन कर शिक्षा मंत्री का इस्तीफा मांग रही है लेकिन सरकार कोई सुनवाई नहीं कर रही है। 20 जून से शुरू हुआ यह अनिश्चितकालीन प्रदर्शन देखना है कि कब समाप्त होता है। अब तो भारतीय किसान यूनियन ने भी अपना समर्थन दे दिया है। अभिषेक दीपके ने कहा भी है कि आप लोग अफनी ट्रैक्टर-ट्रॉली के साथ यहां पर पहुंचे।
हिंदी पत्रकारिता के लिए यह शुभ संकेत नहीं
‘200 साल की स्वर्णिम इतिहास वाली हिंदी पत्रकारिता के लिए यह शुभ संकेत नहीं हैं। सत्ता के विरोध में भी प्रदर्शन हो रहा हो तो भी उसे अखबार में जगह देना चाहिए। वह जनता से जुड़े मुद्दे उठा रहे हैं। जनता उसे पढ़ना भी चाहती है’।
महेश शर्मा, वरिष्ठ पत्रकार, कानपुर
अखबारों को पक्ष और विपक्ष को छापना चाहिए
‘सीजेपी के आंदोलन में अन्ना आंदोलन जैसी गंभीरता नहीं है। शुरुआत में कवरेज मिला लेकिन अब नहीं मिल रहा। इसके पीछे अखबारों का आर्थिक हित भी हो सकता है। अखबारों को पक्ष और विपक्ष को छापना चाहिए। उसे जज की भूमिका नहीं निभानी चाहिए।‘
शैलेष अवस्थी, अध्यक्ष ,कानपुर प्रेस क्लब



