कविता
नारी शक्ति रूप अपार – कंचन कुमारी

नारी केवल नाम नहीं, है साहस की पहचान,
धूप में जलकर भी रखे,अपने चेहरे पर मुस्कान..!
झुकती है तो प्रेम से ,उठती है तो शान,
यूं ही उसको दुर्गा नहीं,कहता है सारा जहान..!
नारी केवल देह नहीं, शक्ति का रूप अपार,
धूप जले संसार मे,वह रहे उजियार..!
सहनशीलता सागर सी,साहस पर्वत-धार,
यूं ही उसको दुर्गा नहीं कहता है सारा संसार..!
जो नारी का मान करे,”कंचन” वही सच्चा इंसान,
उसके चरणों मे ही बसता, है जग का सम्मान..!

