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मिर्जापुर

मिर्जापुर: हरेक को उत्कर्ष प्रदान करने वाला अहरौरा कस्बा आज स्वयं पर आंसू बहाने को मजबूर


तारा त्रिपाठी—————अहरौरा  मिर्जापुर

अहरौरा एक प्रचीन कस्बा है। यह चारो ओर से प्राकृतिक सौन्दर्यता से घिरे होने के कारण प्रकृति की गोंद में स्थित है। पूरब तरफ की वादियां अमदर-सुन्दर इसे आच्छादित करते हैं तो पश्चिम तरफ स्थित जरगो बांध इसका पांव पखारता है। उत्तर की ओर लहलहाता  धान का कटोर कहा जाने वाला क्षेत्र इसे जीवन्त बनाता है। दक्षिण तरफ का प्राकृतिक सौंदर्य की पर्वत श्रेणियां, ऊचाई से गिरते झरने व जलप्रपात, अहरौरा को पर्यटक स्थल का रूप प्रदान करता है। अहरौरा बांध जो सिंचाई और बाढ़ नियंत्रण के लिए बनाया गया है, लोगों के लिए एक पर्यटक स्थल से कम नहीं है। बाजार वासियों के लिए सुबह टहलने व स्वास्थ्य लाभ का केन्द्र है। जंंगलों से घिरे ये झरने, जलप्रपात अपने गर्भ में कई रहस्य छुपाये हुए हैं। इसके अन्दर जितना घुसते जायेंगे रहस्य उतना ही गहरा होता जायेगा। कितने संत, महात्मा, तपस्वी इन स्थलों को वर्षों तक अपना तपस्थली बना कर रखा और वे उसमें तल्लीन भी रहे। वे क्या खोये और क्या पाये ये वही जाने किन्तु इन स्थानों पर आज भी जाने पर रोंगटे खड़े हो जाते हैं और इंसान विचरमग्न हो जाता है।
            कहा जाता है कि कभी यहां सवा पहर सोना बरसता था। चारो ओर सम्पन्नता थी। खाने नहाने से इतना बचता था कि अगर इसे बाहर की मण्डियों में न बेचा जाय तो अगले वर्ष की होने वाली आमदनी पेपच मचा देती थी। लोगों के स्वयं का पेट भरता था और वे आये -गये लोगों की सेवा भी प्रचुर मात्रा में कर देते थे। होने वाली आमदनी से स्थानीय मण्डी आबाद रहती थी और देश-विदेश की मण्डियां भी खुशहाल रहतीं थीं। इसके जंगलों से निकलने वाले कत्था, गोंद, इन्दरजौ, पथरचट्टी, नागरमोथा, आवला, हर्रा-बहेर्रा, महुआ आदि इस बाजार के शान थे। जंगल की लकड़ियों में शीशम, सागौन, जामुन आम, बबूल, आबनूस,कोरैया घरों की शोभा भी बढ़ाती थी और रोज़गार से भी क्षेत्र को जोड़े हुए थी। कोरैया की लकड़ी से बनाये जाने वाले खिलौने देश के दिल्ली, मुंबई, कलकत्ता, मद्रास, कनपुर आदि के बाजारों को अपने सिर पर उठाये रहती रही। धान का कटोरा कहे जाने वाले इस क्षेत्र में इतना धान पैदा होता था कि यह क्षेत्र अपने तो अपने राज्य,यह दूसरे राज्य का भी पेट भरने का काम करता था। तेलहन और दलहन की प्रचुरता ने भी इसे खुशहाली प्रदान की।इस मिट्टी में पैदा होने वाला व्यक्ति मिट्टी के बर्तन और खिलौने के इतने बड़े कलाकार रहे कि उनके हांथ से बनाये जाने वाले मिट्टी के खिलौने ऐसे प्रतीत होते कि खिलौना अब बोल देगा कि तब बोल देगा। इससे अच्छा खासा व्यापार भी जीता जागता रहा और बाहर की मण्डियों की शान बढ़ाता रहा। पहाड़ों की पीठ पर बसे ऐसे गांव भी थे जहां के निवासी पत्थर पर नक्कासी में जान फूंक देने थे। वे मंदिरों, मस्जिदों,घरों के बरामदों पर लगे पत्थर पर ऐसे ऐसे नक्कासी किये हैं कि उसे देख कर देखते ही रह जाने का मन करता है। आज उसी पहाङों पर पत्थर के व्यवसाय ने इतना बड़ा पांव पसार दिया है कि यह क्षेत्र पत्थर का औद्योगिक क्षेत्र बन गया है। स्थानीय ही नहीं बाहर से भी लोग आकर इसी व्यवसाय से अपना रोजी-रोटी कमा रहे हैं। बड़ी-बड़ी मशीने लगाकर पहाड़ों की छाती को तोड़ा जा रहा है। सड़क निर्माण व भवन निर्माण का ये आधार बिन्दु बने हुए हैं। सब्जी की खेती में भी अहरौरा अग्रणी रहा है। जो सब्जियां कभी नहीं उगाई गई उसे उगाया गया और पैदावार भी बढ़ाया गया। सब्जिया यहां के बाजार की ही शोभा नहीं बनी बल्कि बाहर की मण्डियों की भी शोभा बनीं। क्षेत्र खूब फला-फूला। लोग आबाद रहे।
                ऐतिहासिक पृष्टभूमि भी इस क्षेत्र का महान रहा है। यहां राजा चेतसिंह का किला, सम्राट अशोक की लाट, सिक्खों के गुरू गोविंद सिंह का आगमन और भगवान बुद्ध की स्मृतिया इसे ऐतिहासिकता प्रदान करतीं हैं। मौजूदा समय में राजा चेतसिंह का अहरौरा बांध में जीर्ण-शीर्ण अवस्था पड़ा उनका किला यहां उनके कर्म क्षेत्र को बंया करता है। इसी तरह सम्राट अशोक की लाट जो अहरौरा बांध की तलहटी में अब भी स्थित है और वह संरक्षित है ,यह दर्शाता है कि उनका यहां आगमन हुआ और वो लोगों को अपना संदेश दिये। गुरू गोविंद सिंह यहां पधारे ही नहीं बल्कि यहां के गुरूद्वारे में कई दिनों तक रुके तथा पेड़ लगाये व पुस्तक पर हस्ताक्षर भी किये। पुस्तक आज भी दस्तकी साहब में मौजूद हैं और सिक्ख बन्धु उसकी पूजा करते हैं। भगवान बुद्ध की भी स्मृतियां अहरौरा से जुड़ी हुई है। उनके अनुयायी यहां आते है और अशोक लाट के स्थान से मां भण्डारी देवी के पहाड़ पर स्थित स्मृतशेष एक उनकी याद में बने घर तक हर वर्ष जुलूश निकालकर उन्हें याद करते हैं। ऐतिहासिकता को संजोये अहरौरा अपनी पहचान बनाये हुए है।
            धार्मिक दृष्टिकोण से भी इसकी जड़े बहुत मजबूत रही। हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख मुख्य रूप से तीन धर्मों के लोग यहां निवास करते हैं। वे अपने अपने धर्मों के प्रति आस्थावान भी हैं। हर त्यौहार और उससे संबंधित वार्षिकोत्सव भी मनाते हैं। सभी पर्व सौहार्द पूर्वक सम्पन्न भी होते रहे हैं। सब एक दूसरे के पर्व में हिस्सा भी बंटाते रहे। आपसी भाई-चारा भी परवान चढ़ी रही। धार्मिक विचारधारा ने यहां के समाज को एक सूत्र में बांधे रखा।
              साहित्य का भी क्षेत्र कहा जाने वाला अहरौरा ने कई विभूतियों को पैदा किया जिसमें श्री राम सर्राफ, हलचल मिर्जापुरी ,रघुवीर शरण ,रामनाथ, बनवारी, जगदीश प्रेम, सुरेश गाफिल, नरसिंह साहसी,नरेन्द्र मानव,रामबिलास रमन, प्रमोद केशरी अतुल, शुभेन्द्र कुमार जायसवाल आदि जैसे साहित्यकारों ने क्षेत्र को साहित्यिक अमली जामा भी पहनाये। श्री ठाकुर जी के प्रसिद्ध ऐतिहासिक मेले के अवसर पर आयोजित कजली दंगल में यहां के साहित्यकारों की जुगलबंदियां खूब सुनने को मिलती रहीं। फाग भी गाये जाते रहे। गीत व गजल भी खूब सुनने को मिला। आज भी लेखन और कविता के क्षेत्र में इसकी पहचान बनी हुई है। कभी कवि सम्मेलन तो कभी कवि गोष्ठियों का आयोजन होता रहता हैं। थके और उदास मन को राहत महसूस होती रही है। साहित्यकारों ने अहरौरा को खूब सवारा और सजाया। यहां की कजली अपने आपमें नायाब रही।
               राजनैतिक क्षेत्र में भी अहरौरा की जड़े गहरी ही नहीं मजबूत भी थी। कांग्रेस, भारतीय जनता पार्टी, सोशलिस्ट पार्टी, लोक दल, भारतीय क्रान्ती दल जैसी पार्टियां रहीं अब समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, अपना दल जैसी और पार्टी का भी प्रादुर्भाव हुआ। अहरौरा में सभी पार्टियों के सदस्य रहे। विचार धारायें अलग थी किन्तु सभी में अच्छे संबंध थे। विकास के लिए कोई लड़ाई नहीं थी। गलत चीजों का विरोध हुआ। गलत का आभास होने पर उसे सुधारा जाता था। कहीं पर किसी बात का ईगो नहीं था। यहां पूर्व प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी, अटल बिहारी बाजपेई, वी पी सिंह जैसे नेताओं का आगमन हुआ। इतना ही नहीं हर दल के बड़े नेता डाक्टर राममनोहर लोहिया चौधरी चरण सिंह, जार्ज फर्नांडिस, राजनारायण सिंह, मुलायम सिंह यादव, जगजीवन राम तक जैसे नेताओं का आगमन हुआ। लोग उनके विचारों को सुने। यहां के लोग विभिन्न पार्टियों मेंरहते हुए भी यहां के विकास के नाम पर एक रहे।  अहरौरा को विकास के कई आयाम से जोड़ना चाहते थे। यहां की यही राजनैतिक पहचान थी।
              हरेक को उत्कर्ष प्रदान करने वाला अहरौरा आज तक अपने आप पर इसलिए आंसू बहाने पर मजबूर है क्यों कि इस क्षेत्र ने सभासद बनाया ,चेयरमैन दिया विधायक व सांसद दिया मंत्री तक बनाया इसके बदले में वे मूल धन नहीं बल्कि व्याज भी चुकाये होते तो हरेक क्षेत्र में इसे जितना विकास के आयाम से जोड़े जाने की जरूरत थी, वह उससे कहींअधिक विकास से जुड़ा होता। प्राकृतिक सौन्दर्य का यह इतना बड़ा धनीं है कि यह स्थानीय लोगों को ही अपनी ओर नहीं आकर्षित करता बल्कि यह अन्तर्जनपदीय लोगों को भी अपनी ओर आकर्षित करता है। इसकी सुन्दरता में लोग इतना होश गवां देते हैं या फिर खो जाते हैं कि अपनी जान से भी हांथ धो बैठते हैं। बावजूद इसके भी यहां आने वालों की भीड़ वर्ष दर वर्ष बढ़ती  ही जा रही है। सुरक्षा और विकास के लिए यहां बहुत कुछ करने की आवश्यकता है। पार्किग शुल्क के नाम पर धन उगाही तो की जा रही है किन्तु यहां के आय का उपयोग नहीं हो पा रहा है। अगर इसे फिल्म सेन्टर का रूप दे दिया जाए तो बहुत सी फिल्म हस्तियों का आना-जाना बन जयेगाऔर इसे पर्यटक स्थल भी बानाया जाय तो यह आय का भी साधन बनेगा ।यहां के लोग रोजगार से भी जुड़ जायेगें। इसकी खूबसूरती में चार-चांद लग जायेगा। धान का कटोरा कहे जाने वाले इस क्षेत्र में इससे संबंधित कोई कल कारखाने स्थापित नहीं हुए। जंगली औषधियां शोध के अभाव में पैरों के तले कुचलीं जा रहीं है। जहां ये दवाओं के लिए कारगर साबित हो वहीं ये अस्तित्व हींन बनीं हुईं हैं। रेेल जैसे यातायात के अभाव में यहां की उत्पाद की वस्तुएं बाहर के बाजार भाव का रूप नहीं ले पातीं हैं। इसे यहींऔने-पौने दामों पर बेचना पड़ता है और भारी नुकसान उठाना पड़ता है। अहरौरा के बाद की छोटी-छोटी चट्टियां आज बड़े बाजार में तब्दील हो गई  और हम आज तक वहीं खोड़े हैं जहां पहले खङे रहे। कलाकार चाहे वो पत्थर के हों या लकड़ी के या फिर मिट्टी के खिलौनों के हों उनका मनोबल टूटता जा रहा है। उन्हें न प्रोत्साहन न किसी प्रकार का लाभ दिया जा रहा है। परिणामस्वरूप ये कलाकार इस क्षेत्र से समाप्त होते जा रहे है। नये पैदा होने के नाम पर वे भुखमरी का रोना रोते हैं। उनका का सही मार्गदर्शन न होने से उनमें निराशा है।आज के परिप्रेक्ष्य में ऐतिहासिक चीजों को हम बचा लें इतना ही बहुत है जब कि इसे आच्छादित करने की जरूरत है ताकि आने वाली पीढ़ी इससे शिक्षा ले ।इससे बड़ी लकीर खींचने की बात सोंच सके। धार्मिकता ने हमें बहुत कुछ दिया। हमे संस्कार, सभ्यता, संस्कृति, व्यवहार, रहने सहने की विधा, भाई-चारा सब कुछ दिया किन्तु आज धर्म जिस रास्ते पर चल रहा है उससे अच्छे की आशा नहीं की जा सकती है। धर्म तो हमेशा जोड़ने का काम किया है और आज हम टूट रहे हैं। यह रोजगार परक होता जा रहा है। जहां धर्म में प्रकाश देखते वहां हमें अंधेरा दिखाई दे रहा है।यह राजनीतिक भलाई के लिए की जाती थी ।अच्छी बात अगर विरोधियों से भी मिल जाती थी तो उसे स्वीकार कर लिया जाता था। आज विरोध का अर्थ शत्रुता से हो गया है। राजनीति स्वार्थ की भेंट चढ़ चुकी है। अहरौरा में बड़े से बड़े राजनीतिज्ञ आये ।यहां से जो कुछ लेना था लिये किन्तु इसे जो देना चाहिए आज तक नहीं दिये इसलिए भी यह आंसू बहाने को मजबूर है। तहसील, ब्लाक बनाने के वादे तो अब तकिया कलाम की श्रेणी में आ गया है। विकास मिलने को कौन कहे बची-खुची अहरौरा की उपलब्धियां भी हांथ से छीनी जा रहीं है। सड़क नाली के निर्माण चहेतों तक ।साफ-सफाई का कोई जबाव देय नहीं। सुरक्षा इंतजाम ढाक के तीन पात। धन उगाही चरम सीमा पर। शिक्षा के क्षेत्र में दिनों दिन गिरावट। एक लाख तनख्वाह पाने वाले कोचिंग सेन्टर चलाने व वोटर लिस्ट बनाने में मशगूल। प्राईवेट स्कूलों में शिक्षकों का शोषण। हम अच्छी शिक्षा की कैसे आशा कर सकते हैं। पढ़े-लिखे सड़क पर घूमने को मजबूर। नौकरियों के नाम पर लाठी। सुनने वाला ही बहरा। भला हम विकास और प्रकाश की आशा कैसे कर सकते है। चिकित्सा के क्षेत्र में मिला सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र कोई आधुनिक तकनीक से नहीं जुड़ सका। हर दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति ट्रामा सेन्टर वाराणसी की ही भेंट चढ़ता है। प्रथमिक उपचार तो इतना भरोसेमंद ही नहीं है कि मरीज को वाराणसी के अस्पताल तक भेज सके। अक्सर रीफर मरीज रास्ते में ही दम तोड़ता मिलता है। ढींढोरा पीटना, शब्जबाग दिखाना सत्तासीनों का फैसन है।
            नैतिकता का घोर पतन। सामाजिक सौन्दर्य समाप्त। नि:स्वार्थ सेवा का लोप। सहयोग में हांथ बंटाने की प्रवृत्ति धराशाई। ऐसे वातावरण में हम आंसू बहाने को मजबूर नहीं होगे तो क्या होगे?अब इस क्षेत्र के आंसू पोछने वालों की जरूरत है।देखिए यह अवसर हमें कब प्राप्त होता है। फिलहाल अहरौरा अपने विकास से दिन प्रति दिन पिछड़ता ही जा रहा है।

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